लेख

कभी गलत नहीं होता लोगों का सामूहिक फैसला

के. पी. सिंह 
राजनीति का एक सूत्र वाक्य है जनता कभी गलत नहीं होती। व्यक्तिगत तौर पर लोग गलत और मूल्यहीन हो सकते हैं लेकिन लोगों का सामूहिक विवेक और निर्णय मूल्य पक्षधरता को व्यक्त करता है।
निश्चित रूप से चार्वाकवादी इस युग में मौलिक आध्यात्मिक भावनाएं लोगों के अंदर घुटकर मर चुकी हैं। जिनका संबंध संयम और त्याग जैसे मूल्यों से है। इसके बावजूद लालच और स्वार्थ की पराकाष्ठा के इस युग में भी सामूहिक फैसले बड़ी सोच के अनुरूप ही हो रहे हैं। लोकतंत्र सामूहिक फैसले पर आधारित व्यवस्था है। इसलिए सर्वोत्तम है।
2019 का जो जनादेश है उसके पीछे ईवीएम की गड़बड़ी के संदेह का निवारण कुछ लोगों में अभी तक नहीं हुआ है। इन पंक्तियों के लेखक के लिए भी जनादेश अकल्पनीय है। लेकिन यह सत्य है कि उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में जहां गठबंधन बनने के बाद पिछड़ा और दलित वोट बैंक के विपरीत दिशा में ध्रुवीकरण के अनुमान लगाये जा रहे थे, हमने मतदान के समय देखा तो स्थितियां उल्टी मिलीं। जातियों के थोक के थोक हमें भाजपा की ओर जाते दिखाई दिये। इसलिए जब कुछ एग्जिट पोल भाजपा को 300 प्लस मिलने की भविष्यवाणी कर रहे थे तो हमने कहा था कि यह भी हो सकता है। लेकिन भाजपा को 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं का समर्थन मिलेगा यह किसी भी अंदाज से परे था। यहां तक कि भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी इतने छप्परफाड़ समर्थन की उम्मीद नहीं थी।
मोदी की ब्रांडिंग और अमित शाह के मैनेजमेंट को इसका श्रेय देकर पल्ला झाड़ लेना अन्याय होगा। यह बात जब कही जाती है तो ध्वनित यह होता है कि लोगों को भुलावे में डालकर उनका समर्थन ले लिया गया है। लेकिन यह नहीं भूला जाना चाहिए कि ब्रांडिंग और मैनेजमेंट तब फलित होता है जब लोगों में उसी दिशा में जाने की स्वतः स्फूर्त इच्छा हो।
बिहार में प्रशांत किशोर नीतीश के लिए इस कारण कामयाब हो गये थे क्योंकि उस समय उनके और लालू के गठबंधन के लिए शोषित उपेक्षित जनता में स्वाभाविक समर्पण देखा जा रहा था। प्रशांत किशोर की तरकीबों ने उसे बल और वेग प्रदान किया। लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के लिए कांग्रेस ने जब उनकी सेवाएं अनुबंधित की तो वे कोई करिश्मा नहीं दिखा सके। 
वर्ण व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति से जो नेतृत्व उपजा उसने किसी नैतिकता से यहां तक कि लोकतंत्र से भी कोई सरोकार नहीं रखा। जिन लोगों ने उम्मीद की थी कि वर्ण व्यवस्था बेअसर होने से अधिक मानवीय और नैतिक व्यवस्था कायम होगी वे सामाजिक न्याय की राजनीति के नेताओं के निरंकुश आचरण से हतप्रभ थे। अराजकता की घनघोर बियावान इनके चलते लोकतंत्र में अंधेरे की तरह पसर गया था। लेकिन ये नेता किसी भी लोकलाज से बेफिक्र रहे, क्योंकि उन्होंने अपनी समर्थक पूरी जमात की सोच को हठधर्मिता में तब्दील कर दिया था। हाल-फिलहाल अस्मिता की राजनीति से देश ऊपर हो सकता है, इसकी कल्पना असंभव हो गई थी।
दूसरी ओर इसी राजनीति के चलते तथाकथित धार्मिक किताबें फेल हुईं। जिनमें वर्ण के आधार पर किसी को पद और सम्मान के लिए अयोग्य घोषित करने हेतु लिखा गया था 
बहरहाल, मोदी ने एक बड़ी लाइन खींची है जिसकी जरूरत सामाजिक न्याय की राजनीति की सार्थक तार्किक परिणति के लिए थी। इसी के चलते यह संभव हुआ कि राष्ट्रीय गौरव के नाम पर अस्मिता की राजनीति को तिलांजलि देकर सभी उनके पक्ष में खड़े हो गये। सवाल मोदी का नहीं, लेकिन यह प्रवृत्ति देश, समाज और लोकतंत्र के हित में है। दरअसल सामाजिक न्याय एक प्रक्रिया है, साधन है, साध्य नहीं। साध्य तो इससे कहीं व्यापक है। मोदी की यह जीत भारतीय राजनीति में गुणात्मक परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु साबित हो सकती है।
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को जब लोगों ने दिल खोलकर सिर पर बैठाया था, तब भी एक नये आगाज की उम्मीद संजोयी गई थी। लेकिन केजरीवाल इसका निर्वाह नहीं कर पाये। सवाल यह है कि क्या मोदी अब इसका निर्वाह कर पाएंगे? वक्त बताएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभी अवतार के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए आज के दिन इसका विवेचन 'बर्र के छत्ते' में हाथ डालने का जोखिम मोल लेने के बराबर है। लेकिन लोकतंत्र बिना समालोचना के नहीं चल सकता। इसलिए अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे।
उम्मीदवारी से लेकर सरकार में रखे जाने वाले चेहरों के चयन तक में जिस जवाबदेही का परिचय देने की जरूरत है अभी उसके मुताबिक काम नहीं किया गया है। कई ऐसे सांसदों को रिपीट कर दिया गया लोग जिनके पूरी तरह खिलाफ थे। सांसद, विधायक बनने का अवसर भी उनको दिया जाना चाहिए जिनमें खुद भी लोगों के लिए कुछ करने का जज्बा हो। ऐसे ही जिस क्षेत्र का जो विशेषज्ञ है उसे उसी क्षेत्र के विभाग का मंत्री बनाया जाना चाहिए, तभी सरकार की परफारमेंस अच्छी हो सकती है। निवर्तमान मंत्रिमंडल में इस मामले में बेहद मनमानी बरती गई।
नरेंद्र मोदी विपक्षी खेमे में कारपोरेट के प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित हैं इसके ज्वलंत उदाहरण भी सामने आते रहते हैं। लेकिन यह भी सही है कि गुजरात में तीन बार मुख्यमंत्री रहने और प्रधानमंत्री के रूप में एक कार्यकाल पूरा कर लेने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने कहीं कोई न तो खुद संपत्ति बनाई न ही अपने परिवार को बनाने दी। इससे इन आरोपों की अचूक काट होती रही। अपनी इस मिसाल को व्यापक नैतिक पुनरुत्थान के अभियान का हिस्सा बनाने के लिए उन्हें अपने सांसदों और विधायकों के भ्रष्ट आचरण को लेकर भी सख्ती दिखानी होगी जिसे लेकर बेशक अभी तक बेपरवाही बरती गई है। उत्तर प्रदेश में सरकार के गठन के तत्काल बाद ही वृंदावन में आयोजित संघ की समन्वय बैठक में नये-नवेले पार्टी के विधायकों की धनलिप्सा पर गरमा-गरम चर्चा हुई थी। वह नरेंद्र मोदी के कानों तक भी निश्चित रूप से पहुंची होगी। इसके बावजूद उन पर कोई लगाम नहीं लगाई गई। इससे पार्टी में अराजक स्थिति का निर्माण होता है। इसका प्रतिबिंब लोकसभा चुनाव में अधिकांश स्थानों पर विधायकों द्वारा अपनी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ भितरघात के रूप में नजर आ चुका है।
निजीकरण की सीमा पर विचार की जरूरत
निजीकरण की भी एक लक्ष्मण रेखा होना चाहिए। जरूरत है कि इस पर मंथन किया जाए। पहले भी फायदे वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को निजी हाथों में बेचने की आलोचना होती रही थी। पता नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी फीडबैक के कारण ही अरुण शौरी को दिल्ली से ही दूर कर दिया था या शौरी कारपोरेट की अंदरूनी जंग की भेंट चढ़ गये, कुछ कहा नहीं जा सकता।
शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्र का क्या फिर से सरकारीकरण किया जाना चाहिए? इस पर भी विचार हो। भाजपा संस्कृति की दुहाई देती है। लेकिन तथाकथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बेहतर पढ़ाई की बजाय कल्चर और मैनर पर ज्यादा ध्यान देकर ऐसी नस्ल तैयार की जा रही है जो आगे चलकर इण्डिया बनाम भारत की खाई को ज्यादा चौड़ा करने का काम करेगी। क्या संस्कृति के ध्वजावाहक दल के नेता होने के नाते प्रधानमंत्री ऐसी शिक्षा के दमन-शमन पर भी कोई काम करेंगे?
सरकारी क्षेत्र को जानबूझ कर विफल साबित करने की कोशिश हुई है। नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर अंकुश की इच्छा शक्ति मोदी सरकार भी नहीं दिखा पाई है। इसके कारण सरकारी सेवाएं चरमरा गई हैं। आम जनता मौलिक अधिकारों से वंचित हो रही है। टेक्नोलॉजी से भ्रष्टाचार का अंत करने का दम भरकर भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों को दण्डित कराने की जिम्मेदारी से सरकार भाग नहीं सकती। दूसरी ओर इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि जिन सेवाओं का निजीकरण कर दिया गया है उनकी हालत पहले से और ज्यादा गई-गुजरी हो गई हैं। सही बात यह है कि निजी क्षेत्र में लोगों का शोषण सरकारी क्षेत्र से भी ज्यादा हो रहा है।
इतिहास के प्रेतों से लड़ने के उन्माद की जिन्दगी क्षणिक
इतिहास के प्रेतों से लड़ने का उन्माद उफान की तरह क्षणिक साबित हो सकता है। काल पुरुष ने दूसरे कार्यकाल का अधिकारी बनाकर प्रधानमंत्री को ऐसा अवसर मुहैया कराया है जिससे वे स्वच्छ और आदर्श समाज के निर्माण की कल्पना को जमीन पर साकार करके दिखा सकते हैं। महत्वाकांक्षा के अलावा उन्हें कोई तृष्णा भी नहीं है। उनमें पहल करने का साहस भी है। इसलिए लोगों को उनसे उम्मीद भी ज्यादा होना चाहिए।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।) 
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