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(आलेख) अलवर कांड से बेनकाब हुआ कांग्रेस का दलित विरोधी चेहरा

14/05/2019

सियाराम पांडेय शांत
लवर के थाना गाजी क्षेत्र में दलित महिला से सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने राजनीतिक वादियों में तूफान ला दिया है। यह राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह  इस प्रकरण के सामने आते ही तत्परता से कार्रवाई करती। लेकिन उसने पीड़िता के हितों से ज्यादा अपने राजनीतिक हितों की रक्षा की। जब तक राजस्थान में  25 लोकसभा सीटों पर मतदान हो नहीं गया, तब तक वह मामले पर पर्दा डाले रही। अब जब प्रधानमंत्री ने इस प्रकरण को उठा दिया है तो अशोक गहलोत उन पर राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं। उन्हें समझना होगा कि राजनीति तो तभी होती है, जब राजनीति का मौका दिया जाए। अपनी जिम्मेदारी गहलोत गंभीरता से नहीं निभाएंगे तो क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या किसी और को इस मामले में मौन साध लेना चाहिए? अगर उन्होंने ऐसा कदाचित किया तो फिर पीड़ितों का कोई पुरसाहाल ही नहीं होगा। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की चुप्पी तो एक खास किस्म की अराजकता को जन्म देगी। क्या यही संविधान और लोकतन्त्र की रक्षा का सही मार्ग है? अलवर में यह घटना 26 अप्रैल को हुई थी। लेकिन राज्य सरकार के दबाव में पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई इसलिए नहीं की, क्योंकि उसका असर लोकसभा चुनाव पर पड़ सकता था। पुलिस ने जान-बूझकर प्रकरण को तब तक दबाए रखा जब तक पहले और पांचवें चरण की क्रमशः 13 और 12 सीटों पर मतदान नहीं हो गए। गहलोत की कुशलता से भले ही राजस्थान की किसी भी सीट पर इस घटना का राजनीतिक दुष्प्रभाव नहीं पड़ा। लेकिन बाकी बचे सातवें और अंतिम चरण के चुनाव पर इसका असर पड़ना तय है। इस घटना से कांग्रेस के दलित हितैषी होने पर सवाल खड़ा होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिनों उत्तरप्रदेश की एक चुनावी सभा में कहा था कि बसपा प्रमुख मायावती अगर वाकई दलित हितैषी हैं तो उन्हें राजस्थान सरकार से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। मायावती ने उल्टे प्रधानमंत्री से ही दलित छात्र रोहित बेमुला कांड में प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांग लिया। यही नहीं, उन्होंने उससे भी आगे जाकर एक बड़ी बात कह दी कि नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक स्वार्थवश अपनी पत्नी को छोड़ दिया है। ऐसे में उनसे महिलाओं के सम्मान की अपेक्षा नहीं की जा सकती। भाजपा नेताओं की पत्नियां भी अपने पतियों को नरेन्द्र मोदी के पास भेजने से डरती हैं कि कहीं वे उनसे उनकी पत्नियों को न छुड़वा दें। हालांकि उनके इस बयान पर भाजपा ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अरुण जेटली ने कहा कि 'मायावती सार्वजनिक जीवन में रहने लायक नहीं हैं। प्रधानमंत्री का पद तो बहुत दूर की बात है।' 
अलवर की घटना से इतना तो साबित हो गया है कि कांग्रेस के लिए कुर्सी ज्यादा प्रिय है। दलितों खासकर महिलाओं की सुरक्षा उसके लिए बहुत मायने नहीं रखती। मायावती के लिए तो दलित बस वोटबैंक हैं जिसे वह अपने हाथ की कठपुतली बनाए रखना चाहती हैं। वे खुद तो दलितों के यहां जाती नहीं और अगर कोई दूसरा चला जाए तो उसे खरी-खोटी सुनाने का एक भी मौका अपने हाथ से नहीं जाने देतीं। अशोक गहलोत कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले में राजनीति कर रहे हैं। ऐसी घटनाएं जब भाजपा शासित राज्यों में होती हैं तब तो वे मौन रहते हैं। इस घटना को बेवजह तूल दे रहे हैं। राज्य सरकार इस मामले में लापरवाह पुलिसकर्मियों को दंडित भी कर चुकी है। मायावती द्वारा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर समर्थन वापसी की चेतावनी को सही ठहराते हुए गहलोत ने कहा कि उन्होंने समर्थन वापस लेने की बात कही है, वापस तो नहीं लिया है। मुख्यमंत्री की यह दलील बेहद पिलपिला और घटिया है। वह यह नहीं बताते कि आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई में देर क्यों की गई। वह यह भी नहीं कहते कि इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में क्यों नहीं भेजा जाना चाहिए। इससे कांग्रेस के घाघपन का परिचय मिलता है। सारी संवैधानिक संस्थाओं के प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा निर्देशित होने का आरोप लगाने से पूर्व गहलोत को अपने गिरेबान में भी जरा झांक लेना चाहिए। अलवर के थाना गाजी पुलिस इलाके में हुई इस घटना को राजनीतिक रंग देकर वह अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। माना कि नरेंद्र मोदी और भाजपा चुनाव जीतने के लिए इस मामले को तरजीह दे रहे हैं। लेकिन गहलोत सरकार ने तो अपराध पर पर्दा डालने का जघन्य प्रयास किया है। यह घटना तो देशभर की महिलाओं का अपमान है। पुलिस प्रशासन के रवैये से गहलोत सरकार की महिला विरोधी सोच ही उजागर हुई है। सरकार अपने दायित्व तो निभा नहीं पाई, दूसरे दल को नैतिकता का पाठ पढ़ा रही है। देश में औसतन रोज बलात्कार की शताधिक घटनाएं होती हैं और पुलिस दोषियों पर कार्रवाई करने की बजाय सरकार के हित के संरक्षण को ज्यादा तरजीह देती है। यह स्थिति यह बताने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस और बसपा के दलित हित का दावा खोखला है। राजनीतिक हितों को जनहित से ऊपर रखना तो लोकतंत्र की विशेषता नहीं है। संविधान इसकी इजाजत किसी भी राजनीतिक दल को नहीं देता। लोकतंत्र और संविधान को खतरे में बताने वाले दलों को यह तो समझना ही होगा कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए त्याग और तितिक्षा की जरूरत होती है। स्वार्थ और लोभ तो उसकी जड़ में मट्ठा ही डालते हैं। अगर सरकारें अपने हिस्से का दायित्व ही निष्ठा से निभा दें तो विपक्ष को राजनीतिक विरोध के मुद्दे ही न मिलें। लेकिन कांग्रेस को महिलाओं के अपमान में ज्यादा आनंद आ रहा है। उसके रोटी बेलने का पुरुषार्थ कम,चूड़ियां खनकाने की मानसिकता के ज्यादा दीदार उसे होते हैं। काश, कांग्रेस अपने संकुचित दृष्टिबोध से बाहर आ पाती। आलोचनाओं को सकारात्मक रूप में ले पाती।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)