लेख

गठबंधन हमारी राजनीतिक संस्कृति

20/05/2019

 राकेश राणा
भारतीय राजनीति विरोधाभासों के बीच अपनी विशिष्टता इस दृष्टि से भी रखती है कि भारतीय समाज और लोकतंत्र को समझने-समझाने के परम्परागत औजार पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए कभी उसे सामंतशाही की जकड़न बताकर बचने की कोशिश होती है तो कभी भारतीय राजनीति का संक्रमण काल कहकर खारिज करने का प्रयास रहता है, जबकि असल सवाल भारतीय समाज के स्वभाव से जुड़ा है। विविधताओं में एकता की जो विशेषता हमारे समाज की है उसके चलते राजनीति को संक्रमण से उभरकर समन्वय की ओर बढ़ना ही होगा। इससे इतर भारत में राजनीति वो सम्मान नहीं प्राप्त कर पाएगी जो उसे करना चाहिए। यही वजह है भारतीय समाज में राजनीति एक गरिमामय स्थान सामान्य जनों के दिल-दिमाग में नहीं बना पायी। भारत भिन्न-भिन्न फूलों का गुलदस्ता है। यह विविधताओं का देश है। इन विविधताओं के वैविघ्य के साथ जब राजनीति समन्वयात्मक दृष्टि का संबोधन सामाजिक प्रश्नों को केन्द्र में रखकर करेगी वही राष्ट्रीय राजनीति बनेगी। जिसकी आज तक हमें दरकार है। स्वतंत्र भारत का कोई चुनाव ऐसा नहीं रहा है जब राजनीति चुनावी समीकरणों, व्याकरणों और गठबंधन के नये-नये समीकरणों के लिए ना भटकी हो। हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताएं गठबंधनों के प्रेरक स्रोत हैं। परस्पर मेल-जोल हमारा स्वभाव है। जो राजनीतिक दल इस स्वभाव के साथ रहेंगे उनकी चुनावी वैतरणी पार होती रहेगी। जो इसके विरुद्ध अभ्यास करेंगे, हाशिए पर पहुंच जाएंगे। जब तक गठबंधन सामाजिक स्तर पर राजनीतिक समीकरणों को बनाने-बिगाड़ने में सम्पन्न होते रहे, राजनीतिक दायरों तक पहुंचने से उन्हें रोके रखा गया। आपातकाल आ गया और बहुत-सी दीवारें ढह गईं। परिणामत: राजनीति खुले मैदान-सी बिछ गई। राजनीतिक गठबंधन नई शक्ल अख्तियार करने लगे। राजनीतिक दलों का जन्म, उद्भव, विकास, विस्तार और देश की राजनीति का बदलता मिजाज विविधताओं के गठबंधनों द्वारा सामाजिक-राजनीतिक सवालों के संबोधन को समझने से ही समझ आएगा।
गठबंधन भारत की राजनीतिक संस्कृति है। भारतीय समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक दर्रों को भरने की राजनीतिक शैली है। इनके बिना समग्रता की अभिव्यकित हो ही नहीं सकती है। समरुपता की राजनीति पीट-पीट कर बाबाजी कहलाने वाली बात होगी। गठबंधन विविधताओं को संबोधित करने की प्रभावी और सरलतम शैली है। भारतीय राष्ट्रीय राजनीति की आत्मा है। कोई एक दल पूर्ण बहुमत के साथ सर्वशक्तिमान बनने का मंसूबा पाल भी ले तो भारत की आत्मा को मारकर ही पूरा कर पाएगा। समकालीन भारतीय राजनीति में चुनाव से पहले और चुनाव के बाद के गठबंधन का एक लंबा सिलसिला है। देश की तथाकथित दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को अपना अखिल भारतीय प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए गठबंधनों की शरण में बार-बार जाना पड़ता है। किसी को एनडीए के नये नाम से अवतरित होना पड़ता है तो कोई यूपीए के यूनिक आइडिया के साथ परम्परागत अभ्यास करता दिखता है। मौजूदा लोकसभा से पूर्व की निरन्तर सात लोकसभा गठबंधन के साथ गठित होती रही है। बेशक 2014 के चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला था पर वैसा गठबंधन की राजनीति के कारण ही संभव हो पाया था। चालीस से भी अधिक दलों की धमाचौकड़ी के साथ राष्ट्रीय होने की कोशिशें भारतीय राजनीति की मूलभूत विशेषताओं को और अधिक उदभाषित करती दिखती है। गठबंधन से चुनाव-क्षेत्र के स्तर पर वोट शेयर के एकत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। यह संभावना चुनाव-पूर्व गठबंधन से और भी बढ़ जाती है। 1989 के बाद से भाजपा के विस्तार में वैचारिक प्रतिबद्धता का योगदान कम, उसकी गठबंघन की राजनीति का इसमें बड़ा हाथ है। कांग्रेस की कामयाबी का राज भी गठबंधन ही है। लम्बे समय तक तो वह सामाजिक गठजोड़ों के सहारे ही सत्ता में बनी रही। बाद में राजनीतिक गठबंधनों के लिए देशभर में प्रयोग करने पड़े।
भारतीय राजनीति की सफलता-विफलता इस बात पर निर्भर करेंगी कि भविष्य का भारतीय राजनीतिक नेतृत्व कितनी दूरदृष्टि रखता है। भारतीय समाज को लेकर उसकी समझ कितनी सुलझी हुई है। कितनी परिपक्वता से वह समाज, राजनीति और आर्थिक विकास में संतुलन साध पाता है। नई संस्थाओं, आधुनिक विचारों और परम्परागत मूल्यों का सम्मिश्रण ही भारत की राजनीतिक व्यवस्था में है। दल गठबंधन शैली, जाति की राजनीति को समर्थन और वह राजनीतिक परिपक्वता जो इन दोनों से प्राप्त हुई है वह हमारी राजनीतिक संस्कृति को बनाती है। गठबंधन भारतीय राजनीति का मुख्य लक्षण है। इसी कारण गठबंधन की राजनीति शासन के लिए एक महत्वपूर्ण नीति केंद्र और राज्य दोनों ही स्तरों पर स्थापित हो चुकी है। 
दुनिया एक सफल, सक्षम और सशक्त लोकतंत्र के रुप में भारतीय नेतृत्व का लोहा मानती है। उसको सम्मान की दृष्टि से देखती है। हम अपने आसपास के लिए ही नहीं पूरे विश्व के लिए एक 'मॉडल डेमोक्रेसी' हैं। हम पंच परमेश्वर के सामाजिक लोकतंत्र को युगों-युगों से जी रहे हैं। विवेकपूर्ण निर्णयों के नागरिक बोध को आम भारतीय मतदाता राजनीतिक लोकतंत्र की अपरिहार्य पूर्व-अपेक्षाओं के बगैर जीता है। आधुनिक राजनीतिक चिंतक यह समझने में आज तक अटके हुए हैं कि जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, सम्प्रदायवाद, भाई-भतीजावाद, अशिक्षा, गरीबी, बेकारी, छूआछुत, शोषण, दमन, सामंती मानसिकता, गांव-शहर का फर्क और विसंगतियों तथा विषमताओं के आग्रह, धर्म की दृढ़ वर्जनाएं, महिला-पुरुष का कठोर श्रम विभाजन एवं असहनीय आर्थिक गैर-बराबरी के बावजूद लोकतांत्रिक अभ्यासों को चुनाव-दर-चुनाव शानदार करतबों के साथ एक आम भारतीय दुनिया के लिए मॉडल मतदाता बन रहा है। वह बहुत ही शांत प्रतिक्रियाओं के साथ बड़े बदलावों को दर्ज करा रहा है। अपने विवेक और राजनीजिक समझदारी से चौंकानेवाले निर्णय प्रस्तुत करता है। प्री-पोल, एक्जिट पोल और पोस्ट पोल सबकी पोल खोलकर रख देता है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य ने भारतीय नेतृत्व को नये रंग-रुप में उभरती नयी विश्व-व्यवस्था के बीच गंभीर लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां सौंपी हैं। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भारत का नेतृत्व बखूबी और सफलतम फलश्रुतियों के साथ सियासत के सानिध्य में अपनी तालमेल की क्षमता के साथ गठबंधनों से बांधे अपने समाज को नयी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाने में सक्षम बनाएगा। भारतीय लोकतंत्र को मजबूत पहचान दिलाएगा।
(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं।)