लेख

कब बुझेगी उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग

19/05/2019

प्रमोद भार्गव
चुनावी शोर में वैसे तो सभी बुनियादी मुद्दे गौण रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड के जंगलों में पिछले एक पखवाड़े से लगी भयानक आग को नजरअंदाज करना पर्यावरण विनाश को खुली छूट देना है। वैसे भी किसी राजनीतिक दल ने अपने घोषणा-पत्र में इसे मुद्दा नहीं बनाया है। जाहिर है, पर्यावरण के संरक्षण की चिंता हमारे नेताओं को नहीं है। इसकी चिंता उन वनाधिकारियों को भी नहीं है, जिनकी आजीविका जंगल और वनप्राणियों की सुरक्षा पर निर्भर है।
उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक की जवाबदेही बनती है कि वे गर्मियों में जंगल पर चौकस निगाह रखें। लेकिन वहां के वनसंरक्षक जयराज ठंडक लेने विदेश की सैर कर रहे हैं। उनकी विदेश यात्रा पर उत्तराखंड के वन मंत्री हरक सिंह रावत ने नाराजगी जताई है, लेकिन रावत उन्हें कोई दंड दे पाएंगे यह कहना मुश्किल है।
जंगल में आग लगना एक सामान्य घटना है। लेकिन इस बार आग हरिद्वार के मनसादेवी मंदिर और शिवालिक पर्वत की पहाड़ियों से लेकर उत्तरकाशी से सटे जंगल बसूंगा परिक्षेत्र तक सुलग रही है। इस आग को सुलगता छोड़ राज्य के वन संरक्षक विदेश दौरे पर निकल गए। इससे पता चलता है कि हमारे अधिकारी कितने लापरवाह और बेफिक्र हैं। इस समय उत्तराखंड में 216 स्थानों पर धधक रही आग ने 200 हेक्टेयर वन संपदा नष्ट कर दी है। 50 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। आग कब बुझेगी, बताना मुश्किल है। छोटे वनकर्मी ग्रामीणों की मदद से आग पर काबू पाने में लगे हैं। बीते 15 साल से हर साल उत्तराखंड में औसतन 3000 हेक्टेयर वन जलकर राख हो रहे हैं। दरअसल यहां के जंगलों में वन विभाग की मिलीभगत से लकड़ी माफिया सक्रिय हैं। वन विभाग के डिपो में ढाई लाख टन चीड़ के पेड़ों के लट्ठे रखे हैं। विभाग इनकी नीलामी पिछले एक साल में नहीं कर पाया है। लकड़ी तस्कर इन डिपो से चोरी की गई लकड़ी पर पर्दा डालने के लिए जंगलों में आग लगा देते हैं। वैसे भी चीड़ की लकड़ी इतनी तीव्र ज्वलनशील होती है कि इसे आग से बचाने के लिए विभाग को गर्मियों में पानी का छिड़काव करना पड़ता है।
उत्तराखंड का भौगोलिक क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 64.79 प्रतिशत, यानी 34,651 वर्ग किमी वन क्षेत्र हैं। इनमें से 24,414.40 वर्ग किमी क्षेत्र वन विभाग के अधीन हैं। इसमें से करीब 24,260.78 वर्ग किमी क्षेत्र आरक्षित वनों की श्रेणी में हैं। बाकी बचे जंगल वन पंचायतों के नियंत्रण में हैं। 
चीड़ के जंगल और लैंटाना की झाड़ियां आग को फैलाने में सबसे ज्यादा कारगर हैं। दरअसल, चीड़ के पत्तों में एक विशेष किस्म का ज्वलनशील पदार्थ होता है। इसकी पत्तियां पतझड़ के मौसम में आग में घी का काम करती हैं। गर्मियों में पत्तियां जब सूख जाती हैं तो इनकी ज्वलनशीलता और बढ़ जाती है। इसी तरह लैंटाना की झाड़ियां आग को भड़काने का काम करती हैं। करीब 40 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में ये झाड़ियां फैली हुई हैं। चीड़ और लैंटाना भारतीय मूल के पेड़ नहीं हैं। भारत आए आंग्रेजों ने जब पहाड़ों पर आशियाने बनाए, तब उन्हें बर्फ से आच्छादित पहाड़ियां अच्छी नहीं लगीं। इसलिए वे ब्रिटेन के बर्फीले क्षेत्र में उगने वाले पेड़ चीड़ की प्रजाति के पौधों को भारत ले आए और बर्फीली पहाड़ियों के बीच खाली पड़ी भूमि में रोप दिए। इन पेड़ों को जंगली जीव व मवेशी नहीं खाते हैं। इसलिए अनुकूल प्राकृतिक वातावरण पाकर ये तेजी से फलने-फूलने लगे।
इसी तरह लैंटाना भारत के दलदली और बंजर भूमि में पौधारोपण के लिए लाया गया था। यह भारत के किसी काम तो नहीं आया, लेकिन देश की लाखों हेक्टेयर भूमि में फैलकर, लाखों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि जरूर लील गया। आग लगने से उपजाऊ भूमि में दरारें पड़ने से कटाव शुरू हो जाता है। ये दोनों प्रजातियां ऐसी हैं, जो अपनी छाया में किसी अन्य पेड़-पौधे को पनपने नहीं देती हैं। चीड़ की एक खासियत यह भी है कि जब इसमें आग लगती है तो इसकी पत्तियां ही नष्ट होती हैं। तना और डालियों को ज्यादा नुकसान नहीं होता। पानी बरसने पर ये फिर से हरे हो जाते हैं। कमोवेश यही स्थिति लैंटाना की रहती है। चीड़ और लैंटाना को उत्तराखंड से नष्ट करने के लिए कई मर्तबा सामाजिक संगठन आंदोलन कर चुके हैं, लेकिन सार्थक नतीजे नहीं निकले। अलबत्ता इनके पत्तों से लगी आग से बचने के लिए चमोली जिले के उपरेवल गांव के लोगों ने जरूर चीड़ के पेड़ की जगह हिमालयी मूल के पेड़ लगाना शुरू कर दिए। जब ये पेड़ बड़े हो गए तो इस गांव में 20 साल से आग नहीं लगी। इसके बाद करीब एक सैकड़ा से अधिक ग्रामवासियों ने इसी तरीके को अपना लिया। इन पेड़ों में पीपल, देवदार, अखरोट और काफल के वृक्ष लगाए गए हैं। यदि वन-विभाग ऐसे उपाय करता तो आज उत्तराखंड के जंगलों की यह दुर्दशा नहीं होती।
जंगल में आग लगने के कई कारण होते हैं। जब पहाड़ टूटते हैं, चट्टानें खिसकने लगती हैं, तो अक्सर घर्षण से आग लग जाती है। तेज हवाएं चलने पर जब बांस परस्पर टकराते हैं तो इस टकराव से पैदा होने वाले घर्षण से भी आग लग जाती है। बिजली गिरना भी आग लगने के कारणों में शामिल है। ये कारण प्राकृतिक हैं। इन पर विराम लगाना नामुमकिन है। लेकिन मानवजनित जिन कारणों से आग लगती है, वे खतरनाक हैं। इसमें वन-संपदा के दोहन से मुनाफा कमाने की होड़ शामिल है। भू-माफिया, लकड़ी माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों के गठजोड़ इस आपदा के फलने-फूलने में सहायक हैं। राज्य सरकारों ने आजकल विकास का पैमाना भी आर्थिक उपलब्धि को माना हुआ है।  इसलिए सरकारें पर्यावरणीय क्षति को नजरअंदाज करती हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड सरकार ने 2013 में हुए केदारनाथ हादसे से कोई सबक नहीं लिया। नतीजतन जंगलों में आग लगने का सिलसिला जारी है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)