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(आलेख) भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है परिवार

14/05/2019

(विश्व परिवार दिवस, 15 मई पर विशेष )

डॉ. हितेश व्यास
'गृहस्थाश्रम' शब्द सुनते ही लगाता है कि ये क्या सदियों पुरानी बातें हम आज के इन्टरनेट के जमाने में लेकर बैठ गए। जहां दो लोगों की नहीं पटती, वहां फेमिली को कौन संभाले? लेकिन स्वामी विवेकानंद और पांडुरंग शास्त्री आठवले ने कहा है, 'भारत के पास दुनिया को देने लायक दो ही चीजें हैं, एक 'मूर्तिपूजा' और दूसरा कुटुंब जीवन यानि 'गृहस्थाश्रम'। वैसे भी हिन्दुस्तानी संस्कृति और विदेशी संस्कृति में जमीन-आसमान का फर्क है। यह बात मनोज कुमार की फिल्म, 'पूरब और पश्चिम' में अच्छी तरह से दर्शाया गया है। फिल्म की याद को ताजा करें, तो कहां हमारे मां-बाप को प्यार करती वैदिक संस्कृति और कहां मॉम-डैड के साथ सिगरेट और दारू पीने वाले बच्चों वाली संस्कृति। पत्नी को सिर्फ एडजस्टेबल वुमन और सिर्फ मनोरंजन का साधन मानने वाला पति...! हमें तो हमारे ऋषि मुनियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिन्होंने हमें अलग-अलग शास्त्रों और काल की बातें प्रदर्शित करके हमारी 'कुटुंब संस्था' और गृहस्थ जीवन को उज्ज्वल बनाने का मूलमंत्र दिया।
गृहस्थाश्रम क्या है? हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है कि सुख-दुःख, चिंता, निराशा, जवानी या बुढ़ापा कोई भी अवस्था में जो स्थिर रहता है वही सच्ची गृहस्थी है। हमारे शास्त्रों के मुताबिक यह कोई धार्मिक प्रकिया नहीं है जो किया और खत्म हो गया। ऋषि-मुनियों के मुताबिक यह ऐसा संस्कार है जो केवल इंसान को अच्छा ही नहीं बनाता बल्कि उसके दोषों को दूर करता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमें संस्कारों की प्रक्रिया दी है। हमारे समाज के लिए हमें सोलह संस्कार दिए हैं। जो भारतीय संस्कृति की परिकल्पना है, उसमें से एक है गृहस्थाश्रम। 
परिवार क्या है? जहां माता-पिता, पति-पत्नी, भाई- बहन और बच्चे एक घर में एक छत के नीचे मिलकर रहते हों उसे परिवार कहते हैं। ऐसा घर जहां पर पत्नी अपने पति की राह देख रही हो, ऑफिस जाते वक्त बाय-बाय कहने वाले बच्चे हों, देर से आये या गलत बात पर टोकने वाले बुजुर्ग हों, ऐसे घर की कल्पना हर भारतीय करता है। अगर ऐसा घर न हो, संस्कार न हो तो वो घर नहीं मकान कहलाता है। 
चाणक्य ने अपनी 'चाणक्य नीति' में गृहस्थाश्रम का सुंदर वर्णन करते हुए कहा है कि,
             सानंदं सदनं सुता: च सुधिय: कान्ता प्रियं भाषते, गृहस्थाश्रम
             सन्मित्र सुधनं स्वयोशितिरती: आज्ञापरा: सेवका:।
             आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नप्रान्ने गृहे
             साधोः संगम उपासते ह्री सततं धन्यो गृहस्थाश्रम:।। 
       अर्थात, आनन्ददायी घर, सुंदर और आज्ञाकारी संतान, प्रिय वाणी बोलने वाली पत्नी, सही तरीके से घर में आया धन, आज्ञाकारी सेवक, अतिथियों का सत्कार, शिव-पूजन यानि ज्ञान और कल्याण का पूजन यानि प्रभुभक्ति, मीठा भोजन और साधु वृतिवाले लोगों का निरंतर संपर्क यह सब जहां मिले तो एक अच्छा गृहस्थाश्रम कहलाता है।
पांडुरंग शास्त्री आठवले कहते हैं, जिस घर में मातृदेवो भव:,पितृदेवो भव:, आचार्यदेवो भव:, अतिथिदेव भव:, सत्यंम वद, धर्मं कर, जैसी धार्मिक बातों का अमल होता हो उसे सही मायने में घर कहा जाता है। ऐसे ही लोगों का गृहस्थाश्रम सही मायने में धन्य कहलाता है। ऐसे ही घरों में भगवान को भी आकर रहने का मन होता है। 
पूरब हो या पश्चिम, सभी संस्कृतियों का एक अहम सवाल है, हमारे बच्चे हमारा नहीं मानते हैं, हमारी सुनते नहीं हैं और बच्चे कहते हैं हमारे मां-बाप हम पर अपने पुराने खयालात लादने की कोशिश करते हैं जो हमें गंवारा नहीं। मां-बाप को हमारी कोई बात सही नहीं लगती, उल्टी लगती है। वो तो आज के प्रवाह की उल्टी दिशा में ही चलते हैं जबकि हम उससे कदम मिलाने की कोशिश करने का प्रयास करते हैं जो उनको मंजूर  नहीं है। यह समस्या केवल एक ही घर की नहीं है। ये कहानी हर घर की है। ऐसा होना भारत में इसलिए स्वाभाविक है क्योंकि यहीं ज्यादा सत्संग या संस्कार हैं और यही सच्चे और एक अच्छे गृहस्थाश्रम की जड़ी-बूटी है। 
महाभारत में पाण्डवों के वनवास काल की एक बहुत ही ह्रदय को छूने वाला वाकया है 'बकासुर वध'। जब फेमिली में से एक सदस्य को ईश्वर के पास जाना (निधन होना) होता है। बाप कहता है, मैंने तो दुनिया जी ली है, मैं जाता हूं। मां कहती है बाप के बगैर बच्चे दुखी हो जाएंगे, इसलिए मैं जाती हूं। तब बेटा कहता है आप दोनों रहेंगे तो दूसरे बेटे भी आ सकेंगे। इसलिए मैं जाता हूं। जवान बेटे के रहते मां-बाप का निधन हो, अच्छा नहीं लगता। इसलिए आप दोनों रहिए। मैं ही जाता हूं। कहने का तात्पर्य यह कि एक-दूसरे के लिए मरने के लिए जहां हर कोई तैयार है। आप सलामत रहो, यही भावना जिस घर में है, उसे ही सही मायने में परिवार कहा जाता है।     
 भारतीय संस्कृति में भगवान राम और श्रीकृष्ण एक आदर्श और लोकप्रिय पात्र हैं। इनके चरित्रों का दर्शन हम अलग-अलग तरीके से करते रहते हैं। उनके गृहस्थ जीवन में कहीं भी मां-बाप का अनादर, भाई-भाई के बीच का झगड़ा, पति-पत्नी के बीच मनमुटाव कहीं भी देखने या सुनने को नहीं मिलता। तो फिर हम सब भागवत और रामायण के ग्रंथों को सुनने वाले हमारा जीवन जीते-जीते हमारी फेमिली लाइफ में क्यों इन सारी बातों का ध्यान नहीं रख पाते हैं? 
15 मई को फेमिली डे (परिवार दिवस) मनाने से अच्छी फेमिली नहीं बन जाती। सच में तो यह दिन मनाने के बहाने अगर एक घंटा भी भारतीय संस्कृति और उसके संस्कारों के बारे में सोचा जाए तो सही मायने में वो यादगार फेमिली डे होगा, क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति में हमारे ऋषि-मुनियों ने ऐसे ही आदर्श चरित्र हमारे लिये रखे हैं, जिससे हम भी वैसा बनने का प्रयास करें। उन रास्तों पर चलने के लिए प्रयत्नशील रहें। हम ऐसा करने का प्रयास करें कि सबको बता सकें कि मेरा घर एक मंदिर है। मंदिर उसका ही घर बन सकता है जिनका गृहस्थाश्रम उत्कृष्ट हो। इतिहास और संस्कृति सिर्फ सुनने या पढ़ने के लिए ही नहीं है, बल्कि समझने और जीवन में उतारने के लिए है। विडंबना है कि हमारे समाज में स्वस्थ बच्चा और सुंदर महिला के लिए प्रतियोगिता होती है पर, सुंदर स्वस्थ परिवार की कोई प्रतियोगिता नहीं है, जिसकी हमें वास्तव में जरूरत है। 
(लेखक टिप्पणीकार हैं।) 


 
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