चुनौती को अवसर में बदलने का सही मौका.....


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चुनौती को अवसर में बदलने का सही मौका


जब कोरोना चीन में कहर बरपा रहा था, उसी समय से प्रधानमंत्री मोदी ने इससे निपटने की योजनाएं बनानी शुरू कर दी थी। लेकिन चीन ने आधी बात बताई और आधी छुपा ली इससे तैयारी में थोड़ी कमी रह गई।

आर. के. सिन्हा

मैंअक्सर अपने लेखों में इस बात की जिक्र करता ही रहता हूँ कि चुनौती और अवसर एक दुधारी तलवार की तरह है। जहां कहीं भी आपके सामने चुनौतियां खड़ी होंगी उसमें बहुत बड़ा अवसर भी छिपा मिलेगा, जिसे यदि ढूंढ कर निकाल लें और उपयोग कर लें तो अवसर में बदलने में वक्त नहीं लगेगा। इसी प्रकार जहां कहीं भी अवसर आता है तो उसमें भी कुछ चुनौतियां भी छिपी होती है। कोरोना की चुनौती जो विश्व के सामने आयी,पूरा विश्व इसका सामना करने के लिए तैयार नहीं था। पिछले 100 वर्षों में ऐसा बड़ा खतरा विश्व के सामने आया भी नहीं था। वैसे प्रथम विश्व युद्ध के बाद बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में स्पेनिश फ्लू नाम की एक महामारी जरूर आयी थी। लेकिन,यह कोरोना जैसी भयंकर नहीं थी। उस महामारी का नाम स्पेनिश फ्लू इसलिए दिया गया क्योंकि पहले स्पेन की मीडिया ने ही इसका खुलासा किया था और इसकी सच्चाई विश्व के सामने रखी थी।

कोरोना की महामारी स्वाभाविक है या मानव निर्मित है,इस पर अभी बहस जारी है। लेकिन यह जरूर है कि यह महामारी बहुत ही विकट है। यह मात्र किसी संक्रमित व्यक्ति के नजदीक जाने से हो सकती है। छूने तक की बात ही नहीं है। अगर एक मीटर के अंदर के फासले में गये और अगर संक्रमित व्यक्ति छींका या खांसा तो उसके छींक या खांसी के जो सूक्ष्म कण हैं, वह भी कोरोना महामारी के विषाणु आपके शरीर में ला सकते हैं और आप भी इस बीमारी से ग्रसित हो सकते हैं। एक छोटा सा विषाणु जिसे दूरबीन से भी देख नहीं सकते, पूरे विश्व को तबाह कर दिया है।

कोरोना को लेकर चीन ने आधी बात बताई और आधी बात छुपा ली। चीन ने सर्दी, खांसी, बुखार आदि इसके प्रारंभिक लक्षण बताये। स्वांस की बीमारी के लक्षण बताये। लेकिन, यह नहीं बताया कि संक्रमित व्यक्ति में यह लक्षण दो हफ्ते बाद भी दिख सकता है। इसके कारण थोड़ी भूल भारत में और अन्य  देशों में भी हुई। क्योंकि, जो व्यक्ति उन दिनों विदेशों से आये भारत सरकार ने सबका परीक्षण कराया था। सर्दी, खांसी, बुखार के लक्षण वाले यात्री को एकातंवास करवाना शुरू भी कर दिया था।  किन्तु, जिनको कोई लक्षण ही नहीं था उनको घर जाने दिया गया। यह तो किसी को पता ही नहीं था कि 14  दिनों के बाद भी ये लक्षण आ सकते हैं। इसके कारण ही तमिलनाडु, मुम्बई, गुजरात, दिल्ली और पंजाब में यह संक्रमण काफी तेजी से फैला। क्योंकि, वहां के लाखों लोग विदेशों में रहते हैं और वे तथा उनके परिवार के सदस्य विदेश आते-जाते रहते हैं।

एक बात और यह हुई कि तबलीगी जमात के कार्यक्रम में सैकड़ों लोग इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड आदि देशों से थे जहां कोरोना महामारी पहले से फैली हुई थी। वहां से आये कई संक्रमित व्यक्ति उस मरकज में शामिल हुए थे। सभी सूचनाएं और सावधानियों के बाद भी मरकज ने इसकी कोई परवाह नहीं की जिसके वजह से भी कोरोना के संक्रमित मरीजों में बहुत बड़ा इजाफा हुआ। दिल्ली की मरकज के बाद जमात के तबलीगी जहां-जहां गये अपने साथ संक्रमण भी ले गये और इस तरह संक्रमण फैलाया। लेकिन, इन सारी उलटी-सीधी परिस्थितियों के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने मन ही मन यह तो सोच लिया था कि जब इटली, स्पेन और अमेरिका जैसे देशों में ऐसी स्थिति हो रही है जहां कि मेडिकल सुविधाएं इतनी अच्छी है जिनकी बराबरी हम कर ही नहीं सकते, तब तो इस महामारी को रोकने के लिए सम्पूर्ण तालाबंदी (लॉकडाउन) किये बिना इस महामारी का सामना किया ही नहीं जा सकता। क्योंकि, इस महामारी में एक अच्छी बात है कि आप इसे आमंत्रित नहीं करेंगे तो यह अपने आप तो आपके पास कदापि नहीं जायेगा ।

विपक्षी नेता चिल्ला रहे थे कि ज्यादा से ज्यादा लोगों का टेस्ट करवाया जाये। सुझाव तो बहुत अच्छा था। लेकिन जब महामारी का अता-पता ही नहीं था उस समय तो हमारे यहां टेस्टिंग किट कहां से होती। उस समय हमारे यहां एक भी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्यूपमेंट (पीपीई) देश में एक भी नहीं बन रहा था। संक्रमण को 95 प्रतिशत रोकने में सक्षम एन 95 फेस मॉस्क भी हमारे यहां बहुत कम बनता था। अत: प्रधानमंत्री ने सम्पूर्ण तालाबंदी (लॉकडाउन) का रास्ता अपनाया। हालांकि, तालाबंदी भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। भारत जैसे विशाल देश में यह हो पाना शायद संभव भी नहीं था। जहां इतनी बड़ी आबादी हो, आबादी का घनत्व इतना घना हो, जहां इतनी बड़ी संख्या में लोग अर्धशिक्षित या अशिक्षित हों, यहां यह संभव नहीं था। फिर भी प्रशासन और पुलिस दक्षता के कारण कम से कम 90 से 95 प्रतिशत तालाबंदी तो जरूर ही सफल हुआ जिसके कारण ही आज भारत इतनी बड़ी आबादी होते हुए भी विश्व भर में कोरोना संक्रमण से सबसे कम क्षति उठाने वाले देश के रूप में उभरा है।

बहरहाल, प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में बहुत ही प्रेरक और दिलचस्प बातें कहीं। उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ी चुनौती है। लड़ाई लम्बी चलेगी तो अब लॉकडाउन-4 यानि 18 मई के बाद होने वाले तालाबंदी का स्वरूप भी अलग होगा। कहने का अर्थ यह था कि अब हम सावधानी के साथ अपने काम पर लौटेंगे। लेकिन, लापरवाहियां भी बर्दाश्त नहीं की जायेगी। इस चुनौती को अवसर में बदलने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत योजना’ की शुरुआत की जा रही है। इस योजना को धरातल पर उतारने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक भारतीय नागरिक पर 15,384 रुपये का बैठेगा। इतना बड़ा आर्थिक पैकेज आज तक देश में कभी भी किसी भी प्रधानमंत्री ने देने के बारे में सोचा तक नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में सिर्फ किसान, मजदूर, छोटे कारोबारियों की ही चर्चा नहीं की बल्कि रेहड़ी वाले, ठेले वाले, पशु पालकों, सब्जी उगाने वाले, कामगारों और उद्योगपतियों की भी चर्चा की। यह बहुत बड़ा पैकेज है इसमें देश की आर्थिक उन्नति का बहुत बड़ा रास्ता खुलेगा। प्रधानमंत्री ने दो-तीन उदाहरण देकर अपनी बातों को बताने की कोशिश की कि वे क्यों समझते हैं कि हम इस चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं।

सबसे पहली बात तो प्रधानमंत्री ने यह बताया कि दृढ़ संकल्प शक्ति के साथ यदि कोई भी काम किया जाये तो सफलता सुनिश्चित होती है। उन्होंने बताया कि जिस दिन देश में तालाबंदी शुरू किया गया उस दिन भारत में एक भी पीपीई नहीं बनता था और एन 95 फेश मॉस्क भी इक्के दुक्के लोग ही बनाते थे। यह भी थोड़ी मात्रा में ही। आज की स्थिति यह है कि आज भारत इन दोनों उत्पादों को बनाने के मामले में न केवल सक्षम हो गया है, बल्कि निर्यात करने के लिए भी तैयार खड़ा है। आज देश में प्रति दिन 2 लाख पीपीई और 2 लाख एन 95 ग्रेड के फेश मॉस्क बनने शुरू हो गये हैं।

दूसरा उदाहरण प्रधानमंत्री ने गुजरात के भुज का दिया। 2002 में भुज पूरी तरह विध्वंस हो गया था। ऐसा भूकम्प, इतनी जानमाल की क्षति जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । चूंकि, उन दिनों मैं स्वयं कई संस्थानों के साथ जुड़ा हुआ था जो भुज के राहत कार्य से जुड़े थे, मैं बराबर भुज जाया करता था। जो भुज की स्थिति थी वह बहुत ही भयानक थी। वहां कुछ बचा ही नहीं था। आज आप जामनगर चले जायें। भुज के किसी भी क्षेत्र में चले जाये जो भूकंप प्रभावित था, तो उससे अच्छा व्यवस्थित गांव, कस्बा और शहर आपको देश में कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आज भुज सर्वांगीण प्रगति कर रहा है। पूरा कच्छ क्षेत्र ही प्रगति कर रहा है। वहां चुनौती को अवसर में बदला गया है। इसलिए यदि प्रधानमंत्री ने ये उदाहरण दिये तो उसके पीछे बहुत ही मजबूत कारण हैं। प्रधामनंत्री ने एक और अच्छी बात कही है। उन्होंने कहा कि इस महान संकट में हमारी लोकल सप्लाई चेन जो थी हमारे स्थानीय छोटे-मोटे कारोबारी जो थे, उन्होंने ही हमारी जिंदगी की रक्षा की। उन्होंने ही हमें अन्न पहुंचाये, फल पहुंचाया, सब्जी, दूध एवं अन्य सामग्री भी। इसलिए प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें लोकल पर भेकल होना होगा। यानि हमें सिर्फ बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों का पैरवीकार बनने के बजाय स्थानीय निर्माता और स्थानीय उत्पादक, स्थानीय आपूर्ति कर्ता पर ही ज्यादा विश्वास करना होगा। उनका सम्मान करना होगा। यह एक बहुत बड़ी बात है। क्योंकि, हर कोई जो आज एक बहुत बड़ा ब्रांड बनकर उभरा हुआ है एक दिन उसकी भी शुरुआत एक छोटे से रूप में ही हुई थी। लेकिन, उनके देशों ने उनका अपने ‘लोकल’ पर ‘वोकल’ होकर उन ब्रांडों का प्रचार किया और वे विश्व में फैल गये तो हम अपने ब्रांडों के लिये यही क्यों नहीं कर सकते हैं।  वक्त आ गया है कि अब हम सभी मिलकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़े। भविष्य हमारा है। 21वीं सदी भारत की है और भारत विश्व का नेतृत्व करने के लिए उठ खड़ा हुआ है।

लेखक: पूर्व राज्यसभा सांसद और हिन्दुस्थान समाचार समूह के अध्यक्ष हैं।

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