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अर्थव्यवस्था में सुधार की कोशिश

06/09/2019

अर्थव्यवस्था में सुधार की कोशिश

विनय के पाठक

इन दिनों आर्थिक मंदी को लेकर चर्चा का बाजार गर्म है। इसलिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि क्या देश वास्तव में आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहा है या अर्थव्यवस्था में आई मौजूदा नरमी निरंतर होने वाले आर्थिक चक्रीय परिवर्तन का एक हिस्सा है? बैंकों का महाविलय और बैंकों में 55,250 करोड़ रुपये की पूंजी डालने की घोषणा निश्चय ही आर्थिक सुधार की बड़ी पहल है।

र्थव्यवस्था हमेशा ही उतार- चढ़ाव वाली चक्रीय व्यवस्था में गतिमान रहती है। जब इस चक्रीय व्यवस्था में नरमी कम और तेजी अधिक हो जाती है, तो वह तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में नजर आती है। लेकिन चक्रीय अर्थव्यवस्था में यदि नरमी अधिक और तेजी कम होने का दौर बन जाए तो अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ती नजर आने लगती है। इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया के तमाम देश मंदी की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। खासकर वैश्विक जीडीपी की विकास दर में भी नरमी के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ओर से जारी आकलन के मुताबिक 2019-20 में वैश्विक जीडीपी की विकास दर गिरकर 2.9 फीसदी तक पहुंच सकती है। वैश्विक मंदी का असर दुनिया के हर देश पर पड़ना निश्चित है। स्वाभाविक रूप से भारत भी इस ग्लोबल रिसेशन से अछूता नहीं रहने वाला है। भारत में भी इसके संकेत साफ तौर पर नजर आने लगे हैं और इसी वजह से आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया है कि 2007 से लेकर 2009 तक चली मंदी का दौर एक बार फिर लौटने वाला है। अगर आर्थिक मंदी की बात करें, तो 1930 की आर्थिक मंदी के बाद दुनिया भर का सबसे बड़ा आर्थिक संकट 2007 में शुरू हुआ था। आलोचकों का मत है कि 2007 से लेकर 2009 का दौर गुजरने के बाद 2019 में आर्थिक संकट का एक और दौर शुरू हो सकता है। भारत में आॅटोमोबाइल सेक्टर, रियल एस्टेट सेक्टर, आईटी सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में लगातार गिरावट के संकेत मिल रहे हैं। इसके अलावा भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मौसम की प्रतिकूलता की वजह से कृषि उत्पादन में भी तुलनात्मक तौर पर कमी आने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में कुछ विशेषज्ञों की ओर से आशंका जताई जा रही है कि भारत का आर्थिक परिदृश्य आने वाले दिनों में नकारात्मक संकेत देने वाला हो सकता है।

अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति 2009 से लेकर 2014 के बीच बिना सोचे समझे दिए गए कर्ज का नतीजा है। इस दौरान बिना पूरी जांच परख के दिए गए कर्जों की वजह से बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता गया और कर्ज देने की बैंकों की क्षमता बुरी तरह से प्रभावित हुई। – डॉ. राजीव कुमार, नीति आयोग के उपाध्यक्ष

सबसे अच्छी बात तो ये है कि केंद्र सरकार ने दुनिया भर में जारी मंदी के इस रुख को भांपते ही इससे निपटने के उपायों पर विचार करना शुरू कर दिया है। – परमेश्वर ओबेराय, अर्थशास्त्री

दीर्घकालिक नहीं है मंदी
भारतीय रिजर्व बैंक की 2018-19 के लिए 28 अगस्त को जारी की गई सालाना रिपोर्ट पर गौर करें, तो स्थिति इतनी विकट नजर नहीं आती, जितने की आशंका जताई जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी माना है कि देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती का रुख बना है। रिपोर्ट में विकास दर में भी कमी आने की आशंका जताई गई है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि पहले के अनुमानों के विपरीत विकास दर घटकर 6.9 फीसदी के स्तर पर पहुंच सकती है। जबकि शुरू में उम्मीद की जा रही थी कि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.2 से लेकर 7.4 फीसदी तक रह सकती है। केंद्रीय बैंक ने यद्यपि अर्थव्यवस्था में सुस्ती के मौजूदा दौर को चक्रीय गिरावट का दौर माना है और दुनिया के अन्य विकासशील देशों में जारी संरचनात्मक सुस्ती की आशंका को नकार दिया है। लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि जीडीपी पर असर डालने वाले कई सेक्टर में अभी नरमी का माहौल बना हुआ है। इसी नरमी की वजह से विकास दर के अनुमानों को भी घटाना पड़ा है। ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है, इसे जानना और परखना सबसे अधिक जरूरी है। अर्थशास्त्री परमेश्वर ओबेराय का ाानना है कि अच्छी बात तो ये है कि केंद्र सरकार ने दुनिया भर में जारी मंदी के इस रुख को भांपते ही इससे निपटने के उपायों पर विचार करना शुरू कर दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ दिन पहले ही अर्थव्यवस्था की गति को तेज करने के लिए कई उपायों की घोषणा की। इन घोषणाओं को यदि मिनी बजट कहा जाए, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अच्छी बात ये है कि वित्त मंत्री ने भी अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति की गंभीरता को स्वीकार किया और इस बात पर जोर दिया कि समस्याओं का हल किस तरह किया जाना चाहिए। किसी भी समस्या का हल तभी निकाला जा सकता है, जब सबसे पहले इस बात को स्वीकार किया जाए कि सच में कोई समस्या है। अमूमन राजनीतिक वजहों से सरकारें इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होती कि अर्थव्यवस्था में नरमी का दौर चल रहा है या चलने की आशंका है। ऐसे में आर्थिक परेशानी बढ़ती जाती है और जब तक कोई उपाय सोचा जाता है, तब तक समस्या काफी विकराल रूप ले चुकी होती है।

शुरू हुई सुधार की कोशिश
केंद्र सरकार ने न केवल समय रहते आर्थिक नरमी के संकेतों को स्वीकार किया, बल्कि जिन वजहों से देश में निराशा का माहौल बनता दिख रहा था, उसे दुरुस्त करने की दिशा में काम करना भी शुरू कर दिया। इस साल पेश किए गए बजट के कई फैसलों में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बदलाव करने का ऐलान किया। ऐसे फैसलों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) पर लगाये गये सरचार्ज की वापसी तथा निवेश पर होने वाले फायदे यानी कैपिटल गेन पर बढ़ाए गए सरचार्ज को वापस लेना भी शामिल है। इसके अलावा छोटे और मंझोले उद्योगों के पेंडिंग पड़े जीएसटी रिफंड का भुगतान 30 दिन में करने की बात कही गई। साथ ही इस बात का भी ऐलान किया गया कि आगे से सारे जीएसटी रिफंड का भुगतान 60 दिनों के अंदर कर दिया जाएगा। अपनी इन घोषणाओं से सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने में अहम भूमिका निभाने वाले निवेशकों और कारोबारियों की नाराजगी दूर करने के साथ ही उन्हें उत्साहित करने का काम भी किया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसके साथ ही नकदी संकट और कैश μलो क्राइसिस से निपटने के लिए बैंकों के पूंजी मद में 70 हजार करोड़ रुपये डालने का भी ऐलान किया। सरकार के इस कदम से कारोबारी माहौल में बनी नरमी को खत्म करने में तो मदद मिलेगी ही, साथ ही बाजार में पैसे की उपलब्धता भी बढ़ेगी, जिससे खरीदारी बढ़ेगी और उत्पादन भी बढ़ेगा। वित्त मंत्री की इन घोषणाओं को देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री की इन घोषणाओं का असर तत्काल नजर आने लगेगा। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपये की राशि मिल जाएगी तो वे कर्ज बांटने में अधिक तेजी और तत्परता दिखाएंगे। लेकिन कर्ज भी तभी बांटा जा सकता है, जब बैंक के पास कर्ज लेने के लिए कोई आए। कर्ज लेने के लिए बैंक के पास कोई भी कारोबारी तभी जाएगा, जब उसके उत्पाद बाजार में अपेक्षित मात्रा में बिक रहे हों। मतलब साफ है कि जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे उत्पादन भी बढ़ेगा और उसी के अनुरूप कारोबारियों को पूंजी की जरूरत पड़ेगी। मांग बढ़ाने का काम हमेशा लंबा वक्त लेता है। ऐसे में तत्काल राहत के लिए अटकी हुई सड़क और रेलवे की परियोजनाओं को रμतार देने के साथ ही ढांचागत क्षेत्र को और दृढ़ बढ़ाने की दिशा में तत्काल पहल करने की जरूरत है, जिससे जमीनी स्तर पर मांग बढ़े और अर्थव्यवस्था अपनी पुरानी रμतार पर लौट सके।

नीतिगत फैसले से बढ़ा संकट
जानकारों का कहना है कि वैश्विक जीडीपी की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा रμतार से चल रही भारतीय अर्थव्यवस्था पुरानी सरकारों के नीतिगत फैसले का भी शिकार हुई है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार की मानें, तो अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति 2009 से लेकर 2014 के बीच बिना सोचे समझे दिए गए कर्ज का नतीजा है। इस दौरान बिना पूरी जांच परख के दिए गए कर्जों की वजह से बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता गया और कर्ज देने की बैंकों की क्षमता बुरी तरह से प्रभावित हुई। बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम होने पर गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) ने इसकी भरपाई करने की कोशिश की। इससे उनके कर्ज में लगभग 25 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। लेकिन गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का ढांचा इतना सुदृढ़ नहीं था कि वे कर्ज में इतनी बढ़ोतरी का ठीक तरीके से प्रबंधन कर सकतीं। ऐसे में कुछ बड़ी कंपनियों के सामने भुगतान में डिफॉल्ट की स्थिति बन गई। जिससे अर्थव्यवस्था की रμतार पर नकारात्मक असर पड़ा। डॉ. राजीव कुमार का कहना है कि सरकार को ऐसे कदम उठाने की जरूरत है जिससे निजी क्षेत्र की कंपनियों की आशंका दूर हो और वे निवेश के लिए प्रोत्साहित हो सकें। साथ ही निजी क्षेत्र में भरोसा उत्पन्न करना भी जरूरी है। राजीव कुमार की मानें तो निजी क्षेत्र के भीतर कोई भी कर्ज देने के लिए तैयार नहीं है। हर कारोबारी नकदी को अपने पास सुरक्षित रखने की कोशिश में है। इसलिए कोई भी नकदी को बाहर निकालने के लिए तैयार नहीं है। राजीव कुमार का कहना काफी हद तक सही है, क्योंकि देश में जिस तरह से कैश μलो क्राइसिस बना है उसकी एक बड़ी वजह जोखिम की आशंका से कारोबारियों द्वारा नकदी के प्रवाह को ठप कर देना भी है। अच्छी बात ये है कि जब देश में पूंजी की तत्काल आवश्यकता है, उस समय भारतीय रिजर्व बैंक ने सरकार को लाभांश, सरप्लस और कंटीन्जेंसी फंड के रूप में 1.76 लाख करोड़ रुपये ट्रांसफर करने का फैसला किया है। फंड ट्रांसफर का ये मुद्दा भी लंबे समय से चर्चा का विषय बना हुआ था और इसको लेकर जिम्मेदार अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों की राय अलग अलग थी। लेकिन विमल जालान समिति की सिफारिशों के बाद आरबीआई के सेंट्रल बोर्ड ने इस राशि को सरकार को ट्रांसफर करने का फैसला किया है। नकदी के संकट के इस दौर में जब मांग में ठहराव की स्थिति आ गई है, तो आरबीआई से मिलने वाली राशि ढांचागत क्षेत्र को गति देने में अहम भूमिका निभा सकती है। इससे बैंकों के पुनर्पूंजीकरण में भी सरकार को बड़ी मदद मिल सकती है।

हालात ज्यादा खराब नहीं
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व अधिकारी और अर्थशास्त्री पी. रमन्ना का मानना है कि बैंकिंग और गैर बैंकिंग क्षेत्रों को मजबूत कर बुनियादी ढांचे में बड़ी वृद्धि करना तथा कराधान, श्रम कानून और अन्य कानूनी सुधारों के क्रियान्वयन के जरिए हालात में सुधार किया जा सकता है। इन उपायों से ही निजी क्षेत्र में भरोसा बनाया जा सकता है। साथ ही घरेलू मांग और उत्पादन में बढ़ोतरी भी की जा सकती है। भारत की अर्थव्यवस्था पर राजकोषीय घाटा और मानसून चक्र का भी काफी असर पड़ता है। अच्छी बात ये है कि राजकोषीय घाटा और चालू घाटा दोनों ही अपने निचले स्तर पर हैं। इसलिए वैश्विक मंदी के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में दृढ़ता बनी हुई है। अगर यही दृढ़ता बरकरार रही तथा इसमें थोड़ा और सुधार के प्रयास किए गए, तो अर्थव्यवस्था को फिर से तेजी की ओर उन्मुख किया जा सकता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश बनाने का लक्ष्य तय किया है। फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.68 ट्रिलियन डॉलर का है और मौजूदा विकास दर की रμतार को देखते हुए इस वित्त वर्ष के अंत तक इसके 3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद की जा रही है। लेकिन अगर देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है, तो इसके लिए विकास दर की गति को और बढ़ाना जरूरी है। अर्थशास्त्रियों का मत है कि कम से कम आठ फीसदी का विकास दर हासिल करके ही देश अगले 5 सालों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसमें इस बात पर भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि विश्व बैंक द्वारा 2018 के आंकड़ों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के मामले में भारत की रैंकिंग पांच से घटाकर सात कर दी गई है। यह खबर निराशाजनक जरूर है, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि वर्ल्ड रैंकिंग घटने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है। भारत की रैंकिंग घटी सिर्फ इस वजह से है क्योंकि ब्रिटेन और फ्रांस ने अपनी अर्थव्यवस्था का आकार ज्यादा बढ़ा लिया। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार जहां एक साल में 0.02 ट्रिलियन डॉलर बढ़ा, वहीं ब्रिटेन और फ्रांस में ये बढ़ोतरी 0.1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की रही। जाहिर है कि भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है, लेकिन जरूरत इसे और तेज करने की है। ऐसा करके ही देश को आने वाले सालों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था भी बनाया जा सकता है और आर्थिक मंदी की किसी भी आशंका को टाला जा सकता है।


 
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