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सजा के बावजूद लिट्टे समर्थक तेवर बरकरार

06/08/2019

सजा के बावजूद लिट्टे समर्थक तेवर बरकरार


मिलनाडु की राजनीति में ‘पार्लियामेंट के टाइगर’ के रूप में मशहूर एमडीएमके महासचिव वाइको जिस समय दक्षिण के इस महत्वपूर्ण राज्य से देश की सर्वोच्च पंचायत के उपरी सदन में दाखिल होने की कोशिश कर रहे थे, ठीक उसी वक्त उनके खिलाफ एक फैसला आ गया। चेन्नई की एक विशेष अदालत ने साल 2009 के एक मामले में उन्हें एक साल की कैद और दस हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुना दी। सजा सुनाए जाने के बाद वाइको के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता पी विल्सन ने जनप्रतिनिधि कानून समेत तमाम कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा था कि वाइको के राज्यसभा चुनाव लड़ने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। वैसे भी विशेष अदालत ने वाइको की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सजा के आदेश पर एक महीने के लिए रोक लगा दी। वाइको ने जैसे घबराना नहीं सीखा है। राजनय के स्थापित मूल्यों के मुताबिक उन्हें भारतीय राज व्यवस्था की अवमानना का दोषी माना जा सकता है। लेकिन सजा सुनाए जाने के बाद उन्होंने अपने उस भाषण पर कोई अफसोस नहीं जताया, जिसके लिए उन्हें सजा हुई है।

राजीव गांधी की हत्या के बाद पूरा देश भले ही श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों लिट्टे के खिलाफ हो गया, लेकिन वाइको की विचारधारा नहीं बदली। वाइको पर एक दौर में श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों से पैसा मिलने के आरोप लगे।

चेन्नई में जारी एक बयान में वाइको ने कहा, ‘‘मैं श्रीलंका में तमिलों की हत्या और लिट्टे के समर्थन में बोलने पर अदालत द्वारा दी गई एक साल की सजा को खुशी-खुशी स्वीकार करता हूं।’’वाइको को श्रीलंका में अलग तमिल राज्य की मांग करने वाले लिट्टे का समर्थक माना जाता है। उन्होंने संसद सदस्य रहते हुए भी लिट्टे के समर्थन में अभियान जारी रखा। जिस मामले में उन्हें सजा सुनाई गई है, वह मामला तमिलनाडु सरकार ने साल 2009 में दर्ज किया था। अभियोजन के मुताबिक, 15 जुलाई 2009 को वाइको की श्रीलंकाई मुद्दे पर आधारित किताब ‘आई एक्यूस’ के तमिल संस्करण ‘कुटरम सत्तुगिरेन’ का विमोचन हुआ था। इस दौरान वाइको का भाषण लिट्टे पर भारत सरकार के रुख के खिलाफ था। अभियोजन पक्ष का कहना था कि वाइको के इस भाषण से उन पर राजद्रोह का अपराध बनता है। हालांकि एमडीएमके प्रमुख की तरफ से अदालत में दी गई दलीलों में कहा गया था कि यह किताब श्रीलंकाई मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके द्वारा भेजे गये पत्रों का संकलन है। बहरहाल, जब विशेष अदालत ने वाइको को राजद्रोह के मामले में दोषी ठहराया तो वाइको ने यह कहने में देर नहीं लगाई कि उन्होंने किसी प्रकार की नरमी बरते जाने की कभी अपील नहीं की।

द्रविड़ मुनेत्र कषगम से अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरूआत करने वाले वाइको कानून के होनहार विद्यार्थी रहे हैं। आपातकाल का विरोध करने पर वे गिरμतार कर लिए गये। साल 1978 में उन्होंने करुणानिधि की छत्रछाया में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और उन्हें पार्टी ने राज्यसभा भेजा। फिर 1994 में एमडीएमके पार्टी बनाने वाले वाइको ज्यादातर द्रविड़ मुनेत्र कषगम से ही समझौता करते रहे। साल 1986-87 में हिंदी विरोधी आंदोलन में जेल जाने वाले ये नेता केरल की मांग बन रहे मुल्लापेरियार बांध के साथ पांबर व शिरूवानी में बन रहे बांधों के विरोधी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के समर्थक होने के बावजूद सरकार की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो और सेतु समुद्रम परियोजना के विरोधी उन्होंने तूतीकोरिन स्टरलाइट परियोजना के खिलाफ भी मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।राजीव गांधी की हत्या के बाद पूरा देश भले ही श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों लिट्टे के खिलाफ हो गया, लेकिन वाइको की विचारधारा नहीं बदली।

वाइको पर एक दौर में श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों से पैसा मिलने के आरोप लगे। उन्होंने श्रीलंका के तमिल बहुल इलाके का दौरा भी किया। यही वजह है कि जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार में आतंकवाद के खिलाफ सख्त पोटा कानून के पहले राजनीतिक बंदी वाइको ही रहे। उन्हें 2002 और अप्रैल 2017 को देश द्रोह के आरोप में गिरμतार किया गया। वाइको मानते हैं कि तमिल विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई उनकी अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है। लंबे समय बाद वह फिर से संसद में आ रहे हैं। वाइको भले ही सजायाμता हैं, उनकी सजा पर उपरी अदालत क्या फैसला लेती है, यह तो भविष्य की बात है। लेकिन यह तय है कि संसद में उनकी लिट्टे समर्थक आवाज गूंजती रहेगी और कांग्रेस का पसीना छुड़ाती रहेगी। भारतीय विदेश नीति तो खैर परेशान होगी ही।


 
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