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‘गोशालाएं अब सिर्फ सेवा नहीं, रोजगार भी’

18/08/2019

‘गोशालाएं अब सिर्फ सेवा नहीं, रोजगार भी’


व्यापार के साथ समाज सेवा कैसे की जाती है, इसकी मिशाल हैं पेशे से व्यापारी गिरीश जयंतीलाल शाह। सम्भवत: समाज के प्रति सेवा भाव का ही परिणाम है कि भारत सरकार ने उन्हें जीव-जंतु कल्याण बोर्ड में सदस्य नामित किया है। वे मानते हैं कि बोर्ड के पास ऐसे असीमित अधिकार हैं जिनसे ‘चींटी से हाथी तक’ के संरक्षण के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य किया जा सकता है। बहरहाल, शाह को बोर्ड सदस्य के रूप में नहीं, उनके किए समाज सेवा के कारण अधिक पहचान मिली है। गिरीश शाह के नेतृत्व में ‘समस्त महाजन’ नामक ट्रस्ट बनाया गया। इस ट्रस्ट के माध्यम से गिरीश शाह लोगों को पर्यावरण, जल संरक्षण, गोसेवा के प्रति जागरूक कर रहे हैं। साथ ही गोशाला चलाने वाले संस्थानों व लोगों को इसके माध्यम से आर्थिक मदद दी जा रही है। सामाजिक कार्यों के लिए ट्रस्ट और शाह को कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा समस्त महाजन ट्रस्ट को ‘प्रियदर्शनी वृक्ष मित्र अवार्ड’ प्रदान किया गया। वर्ष 2012 में जीव दया, करुणा एवं कल्याण की दिशा में प्रशंसनीय कार्य करने के लिए ‘जीव रत्न अवॉर्ड’ मिला। इसी क्रम में वर्ष 2016 में वाटर हार्वेेस्टिंग के लिए पानी फाउंडेशन के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार ‘सत्यमेव जयते वाटर कप अवार्ड’ से ट्रस्ट को सम्मानित किया गया। ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे कार्यों पर उसके मैनेजिंग ट्रस्टी गिरीश जयंतीलाल शाह से यथावत संवाददाता की विस्तृत बातचीत के संपादित अंश :

देशभर की गोशालाएं आत्मनिर्भर हों, इसके लिए ट्रस्ट गोबर से गमले बनाने, गो मूत्र से औषधियों के निर्माण आदि का प्रशिक्षण देता है। तकनीक का सहारा लेकर गोबर को मशीन से एक आकार देकर गौ-काष्ठ तैयार किए जाने की भी ट्रेनिंग दी जाती है।

वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा समस्त महाजन ट्रस्ट को ‘प्रियदर्शनी वृक्ष मित्र अवार्ड’ प्रदान किया गया। वर्ष 2012 में जीव दया, करुणा एवं कल्याण की दिशा में प्रशंसनीय कार्य करने के लिए ‘जीव रत्न अवॉर्ड’ मिला। इसी क्रम में वर्ष 2016 में वाटर हार्वेेस्टिंग के लिए पानी फाउंडेशन के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार ‘सत्यमेव जयते वाटर कप अवार्ड’ से ट्रस्ट को सम्मानित किया गया। ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे कार्यों पर उसके मैनेजिंग ट्रस्टी गिरीश जयंतीलाल शाह से यथावत संवाददाता की विस्तृत बातचीत के संपादित अंश :

‘समस्त महाजन’ट्रस्ट कब बना और इस ट्रस्ट के माध्यम से कैसे लोगों की मदद करते हैं?

जैन परिवार से ताल्लुक होने के कारण वर्ष 1982 से ही नवसारी के गुरुकुल में आना जाना लगा रहा। वहीं से समाज सेवा की प्रेरणा अपने गुरु पन्यास चन्द्रशेखर विजय जी महाराज से मिली। गुरु जी ने पहले पारिवारिक व्यापार पर ध्यान देन की सलाह दी। चीनी व्यापार व हीरे का व्यापार करता रहा लेकिन समाज सेवा की भावना प्रबल रही। इसको देखते हुए गुरु महाराज ने वर्ष 1996 में गोसेवा के क्षेत्र में काम करने का आदेश दिया। उन्हीं के आदेश से ‘समस्त महाजन ट्रस्ट’ बनाया और गो सेवा का कार्य शुरू किया।

गोशालाओं को आप कैसे मदद पहुंचाते हैं?

हम अपने ट्रस्ट के माध्यम से देशभर के तीन हजार गोशालाओं से सीधे जुड़कर उनको आर्थिक मदद दे रहे हैं। इन गोशालाओं को चलाने वाले लोगों को आर्थिक मदद के साथसाथ् ा गोशाला प्रबंधन के बारे में भी बताते हैं। इसके लिए गोशाला प्रबंधकों की ट्रेनिंग की व्यवस्था की जाती है। गोशाला को कैसे लाभकारी बनाया जाए, इस बात पर ट्रस्ट विशेष जोर देता है। इसके लिए देशभर में प्रशिक्षण शिविर आयोजित कराए जाते हैं और गोशाला प्रबंधन को रियायती दरों पर ट्रस्ट द्वारा तकनीक व मशीनें मुहैया कराई जाती हैं।

तीन हजार गोशालोओं को आर्थिक मदद कैसे देते हैं?

ये पैसा ट्रस्ट कहां से अर्जित करता है? पैसे का इंतजाम ट्रस्ट के सदस्य ही करते हैं। जब आप अच्छे काम करो तो रास्ते खुद निकल आते हैं। जब किसी को हम ट्रस्टी बनाते हैं तो उससे 1 करोड़ 11 लाख रुपये की सहायता राशि ली जाती है। इसके अतिरिक्त हर ट्रस्टी प्रत्येक साल पांच लाख रुपये जमा करता है। ट्रस्ट के एग्जीक्यूटिव मेंबर भी 2 लाख 50 हजार रुपये सालाना सहयोग देते हैं। कभी-कभी ट्रस्ट को विभिन्न परियोजनाओं पर राज्य सरकारों द्वारा भी फंड मिलता है। इन पैसों से गोशालाओं को आर्थिक मदद दी जाती है।

क्या गोशालाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाई जा सकती हैं?

गोशालाओं को आर्थिक मदद ही इस लिए दी जाती है, जिससे वे संसाधन और प्रशिक्षण प्राप्त कर आत्मनिर्भर हो सकें। गुजरात के भाभर में एक गोशाला है, जहां 10 हजार गायों का पालन पोषण किया जा रहा है। यह गोशाला अपना पूरा खर्च खुद प्रबंध कर लेता है। अपने अस्पताल और 32 एंबुलेंस के जरिए करीब 300 किलोमीटर के क्षेत्र में दूसरों को भी मदद करता है। इस व्यवस्था को अन्य गोशाला प्रबंधकों को भी देखना चाहिए। देशभर की गोशालाएं आत्मनिर्भर हों, इसके लिए ट्रस्ट गोबर से गमले बनाने, गो मूत्र से औषधियों के निर्माण आदि का प्रशिक्षण देता है। तकनीक का सहारा लेकर गोबर को मशीन से एक आकार देकर गौ-काष्ठ तैयार किए जाने की भी ट्रेनिंग दी जाती है। गोशालाओं को ट्रस्ट द्वारा मशीन उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके अलवा देसी गाय के गोबर के उपलों को भी आॅनलाइन व खुले बाजारों में बेचने का इंतजाम कराया जाता है। इससे गोशाला चलाने के लिए आराम से धन एकत्र हो जाता है।

गोशालाओं को चारा उपलब्ध करना एक बड़ी चुनौती है। इससे कैसे निपटते हैं?

हर गोशाला के पास अपनी जमीन होती है, साथ ही जिस क्षेत्र में गोशालाएं चलाई जाती हैं वहां भी सरकारी जमीन होती ही हैं। ऐसे में उस जमीन पर भी शासन-प्रशासन से बात करके हरा चारा उगाया जा सकता है। इसके अलावा उस जमीन पर पौधारोपण व जल संरक्षण के लिए तलाब का निर्माण भी कराया जा सकता है। ऐसे प्रयोग भी ट्रस्ट ने किए हैं और सफल रहे हैं। हरे चारे की कुछ ऐसी देसी प्रजातियां हैं जो बहुत कम पानी खर्च कर हर महीने तैयार की जा सकती हैं। ट्रस्ट ऐसे ही हरे चारे की प्रजातियों की रोपाई कराता है। इसमें पानी की खपत कम हो, इसके लिए स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई की व्यवस्था होती है।

समस्त महाजन ट्रस्ट और किन-किन क्षेत्रों में काम करता है और कैसे?

ट्रस्ट पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास, पशु कल्याण, गो संरक्षण व जल संरक्षण पर काम करता है। ट्रस्ट का उद्देश्य है कि भारत में पुन: पारंपरिक खेती के तौर तरीके शुरु किए जाएं व गोवंश पर आधारित ऋषि-कृषि परंपरा के जरिए सभी जीव-जंतुओं का संरक्षण किया जाए। इसी सोच के साथ ट्रस्ट काम कर रहा है। ट्रस्ट द्वारा तालाबों के निर्माण कराए जा रहे हैं। पशुओं को हरे चारे की कमी न हो, इसके लिए अधिक उत्पादन वाली घासों का रोपण कराया जा रहा है। चारागाहों के विकास के लिए लोगों को प्रेरित किया जा रहा है। हम लोकप्रिय देसी पेड़ पौधे तथा झाड़ियों के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। इसके लिए ट्रस्ट द्वारा पौधों को बचाए रखने के लिए लोहे के ट्री गार्ड भी किसानों व ग्रामीणों में बांटे जा रहे हैं। खास बात यह है कि ग्रामीण इसमें स्वयं कुछ राशि लगाते हैं, जिससे इस काम में उनकी रुचि बनी रहती है।

राजस्थान के बाड़मेर जिले में आप के ट्रस्ट ने 25 गांवों को गोद लिया है। यहां किस तरह के कार्य कर रहें आप लोग?

सूखे व अकाल से पीड़ित ये गांव बाड़मेर के सीमावर्ती क्षेत्र के हैं। यहां जल संरक्षण, पारंपरिक खेती, पौधरोपण, शिक्षा, युवाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण सहित कई तरह के कार्य कराए जा रहे हैं। यहां सूखे की मार से पानी की कमी भी है। इसके चलते पशुओं के लिए हरे चारे तक का इंतजाम नहीं हो पाता था। अब ट्रस्ट की ओर से नये गोशालाओं का निर्माण कराया जा रहा है। जल संरणक्ष के लिए तालाबों का निर्माण व पौध रोपण किए जाने की योजना है। कम पानी में तैयार होने वाले हरे चारे की रोपाई कराई जा रही है। इन गांवों में गोरक्षा व जल संरक्षण के लिए अभी तक 1.76 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। यहां ग्रामीणों को तालाब खोदने व मौसम के अनुकूल जिस प्रकार के पौधे यहां लगाए जा सकते हैं, उनको लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।


 
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