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मिग को लेकर वायुसेना प्रमुख की चिन्ता वाजिब

08/09/2019

योगेश कुमार गोयल

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बी एस धनोआ ने वायुसेना के बेड़े में शामिल 44 साल पुराने मिग लड़ाकू विमानों को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि हमारी वायुसेना जितने पुराने मिग विमानों को उड़ा रही है, उतनी पुरानी तो कोई कार भी नहीं चलाता। वायुसेना प्रमुख ने दिल्ली में 'भारतीय वायुसेना का स्वदेशीकरण और आधुनिकीकरण योजना' विषयक एक सेमिनार में यह बात कही थी। धनोआ ने कहा कि दुनिया को अपनी हवाई ताकत दिखाने के लिए हमें अभी और आधुनिक लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है। रक्षामंत्री की मौजूदगी में वायुसेना प्रमुख के इस कथन के निहितार्थ समझना मुश्किल नहीं है। मिग विमानों का निर्माता देश रूस भी अब मिग-21 विमानों का उपयोग नहीं कर रहा है। लेकिन भारत इन विमानों को अभी तक उड़ा रहा है, क्योंकि हमारे यहां इनके कलपुर्जे बदलने और मरम्मत की सुविधा है।
भारत का सोवियत संघ के साथ वर्ष 1961 में मिग-21 विमानों के लिए सौदा हुआ था और भारतीय वायुसेना को 1964 में पहला सुपरसोनिक मिग-21 विमान प्राप्त हुआ था। भारत ने रूस से 872 मिग विमान खरीदे थे, जिनमें से अधिकांश क्रैश हो चुके हैं। हालांकि इन विमानों ने 1971 की लड़ाई से लेकर कारगिल युद्ध सहित कई विपरीत परिस्थितियों में अपना लोहा मनवाया। इसी साल फरवरी माह में पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराकर इसने अपनी सफलता की कहानियों में एक और अध्याय जोड़ दिया है। मिग-21 हल्का सिंगल पायलट लड़ाकू विमान है, जो अधिकतम 2230 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से करीब 18 हजार मीटर की ऊंचाई तक उड़ सकता है। लंबे अरसे तक मिग-21 लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना की शान रहे हैं। ये विमान अब इतने पुराने हो चुके हैं कि पिछले चार दशकों में हम 872 में से आधे से भी ज्यादा मिग-21 विमान दुर्घटनाओं में गंवा चुके हैं। यही कारण है कि चार दशक से ज्यादा पुराने इन मिग विमानों को बदलने की मांग लंबे समय से हो रही है। वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों की कमी के चलते इनकी सेवाएं लेते रहना वायुसेना की मजबूरी रही है। हालांकि अब निर्णय लिया जा चुका है कि मिग-21 विमानों को इसी साल दिसम्बर में वायुसेना के लड़ाकू विमानों के बेड़े से बाहर कर दिया जाए। वायुसेना का कहना है कि मिग बाइसन विमानों को छोड़कर 2030 तक चरणबद्ध तरीके से अन्य सभी मिग विमानों को भी हटाया जाएगा।
पिछले कुछ दशकों में हुए मिग हादसों और उससे वायुसेना को हुए भारी-भरकम नुकसान की बात करें तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1971 से 2012 के बीच 482 मिग विमानों की दुर्घटना में 171 फाइटर पायलट, 39 आम नागरिक, 8 सैन्यकर्मी तथा विमान चालक दल के एक सदस्य की मौत हुई। केन्द्र सरकार द्वारा मार्च 2016 में संसद में जानकारी दी गई थी कि वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारतीय वायुसेना के कुल 28 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए, जिनमें 8 मिग-21 विमान थे। फिलहाल वायुसेना के बेड़े में करीब 38 मिग-21 विमान ही शेष बचे हैं। मिग-21 के अलावा वायुसेना के पास इस समय सौ से भी ज्यादा मिग-23,  मिग-27 और मिग-29 विमान हैं जबकि करीब 112 मिग बाइसन हैं। मिग बाइसन चूंकि अपग्रेड किए हुए मिग-21 विमान हैं। इसलिए उनका इस्तेमाल जारी रहेगा। बाकी सभी मिग विमानों को चरणबद्ध तरीके से वायुसेना से बाहर किया जाएगा। आज के समय में ऐसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की जरूरत है, जो छिपकर दुश्मन को चकमा देने, सटीक निशाना साधने, उच्च क्षमता वाले राडार, बेहतरीन हथियार, ज्यादा वजन उठाने की क्षमता इत्यादि सुविधाओं से लैस हों जबकि मिग का न तो इंजन विश्वसनीय है और न ही इनसे सटीक निशाना साधने वाले उन्नत हथियार संचालित हो सकते हैं।
रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो सही मायनों में मिग विमानों को 1990 के दशक में ही सैन्य उपयोग से बाहर कर दिया जाना चाहिए था क्योंकि हर लड़ाकू विमान की एक उम्र मानी जाती है। मिग विमानों की उम्र करीब 20 साल पहले ही पूरी हो चुकी है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अपनी वायुसेना को गंभीरता से लेने वाले देशों में भारत संभवतः आखिरी देश है, जो अब तक मिग-21 जैसे बहुत पुराने लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करता रहा है।
फ्रांस से अत्याधुनिक तकनीक से निर्मित राफेल विमानों की आपूर्ति शुरू होते ही वायुसेना के बेड़े से मिग विमान हटने शुरू हो जाएंगे। लेकिन भारत को अगले तीन वर्षों के भीतर कुल 36 राफेल विमान ही मिलने हैं, जबकि भारतीय वायुसेना को इस समय अपने बेड़े में करीब 200 अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है। वायुसेना की जरूरतों की पूर्ति करने के लिए सुखोई विमानों के अलावा तेजस विमान भी मिग का स्थान लेंगे, किन्तु इनके वायुसेना के बेड़े में शामिल होने के बाद भी वायुसेना को बड़े पैमाने पर आधुनिक लड़ाकू विमानों की जरूरत रहेगी। इसलिए संभावना है कि आने वाले समय से आधुनिक विमानों की खरीद के कुछ और बड़े सौदे हो सकते हैं। इसके अलावा जिस प्रकार रक्षामंत्री द्वारा विदेशी निर्माताओं पर निर्भरता कम करने की बातें कही जा रही हैं, उससे संभव है कि तेजस जैसे ही कुछ और स्वदेशी लड़ाकू विमानों के निर्माण की दिशा में तेजी देखने को मिले। भारत द्वारा जो लड़ाकू विमान बनाए जा रहे हैं, वे भी कई विशेषताओं से लैस हैं। तेजस की ही बात करें तो यह भारत में ही हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा विकसित किया गया एक सीट, एक जेट इंजन, कम्पाउंड डेल्टा पंख और बिना पूंछ वाला हल्का जेट लड़ाकू विमान है, जो एक साथ कई भूमिकाएं निभाने में समर्थ है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।) 


 
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