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नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरत मुनि

18/08/2019

नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरत मुनि


इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र गुरु पूर्णिमा के दिन एक अविस्मरणीय पल का साक्षी बना। जब आचार्य भरत मुनि की प्रतिमा का अनावरण कला केंद्र में किया गया। नाट्य शास्त्र के रचयिता की मूर्ति की स्थापना गुरु पूर्णिमा व इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कलाकोश विभाग के प्रतिष्ठा दिवस के अवसर पर की गई। मूर्ति का अनावरण केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय, सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. पद्मा सुब्रमनियम, राज्यसभा सांसद एवं नृत्यांगना डॉ. सोनल मानसिंह एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के न्यासी भरत गुप्त के कर कमलों द्वारा किया गया।

यह प्रतिमा दिव्य शक्तियों का एक अदभुत संयोग है। वैष्णव मुद्रा विष्णु का प्रतिनिधित्व करती है, उनके बायें हाथ में डमरू शिव का तथा उनके निचले दाहिने हाथ की चिन्मुद्रा ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करती है। वीणा थामे उनके दायें हाथ की मुद्रा सरस्वती का प्रतिनिधित्व करती है। दायें और बायें कानों में कुंडल क्रमश: शिव और पार्वती का प्रतिनिधित्व करते हुए तांडव एवं लास्य शैलियों में अर्धनारीश्वर के प्रतीक स्वरुप हैं।

इस अवसर पर राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय के निदेशक श्री अद्वैत गड्नायक, इंदिरा गांधी राष्ट्रया कला केंद्र के सदस्य सचिव श्री सच्चिदानंद जोशी, प्रख्यात नृत्यांगना दीप्ती ओमचरी, संस्कृत विश्वविद्यालय कर्नाटक के कुलपति मल्लापुरम जी.वेंकटेश एवं अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। सुविख्यात नृत्य विदुषी डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम ने ध्यानावस्था में भरतमुनि के एक अलौकिक विग्रह का दर्शन पाया था। यह प्रतिमा उसी संकल्पना का मूर्त रूप है। जिसे टी. एन. रत्ना तथा श्री एस. वेंकटरमण भट्ट ने पुराविद आर. जगन्नाथन के साथ मिल कर मूर्त रूप प्रदान किया। यह प्रतिमा दिव्य शक्तियों का एक अद्भुत संयोग है।वैष्णव मुद्रा विष्णु का प्रतिनिधित्व करती है, उनके बायें हाथ में डमरू शिव का प्रतिनिधित्व करता है तथा उनके निचले दाहिने हाथ की चिन्मुद्रा ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करती है।

वीणा थामें उनके दायें हाथ की मुद्रा सरस्वती का प्रतिनिधित्व करती है। दायीं और बायें कानों में कुंडल क्रमश: शिव और पार्वती का प्रतिनिधित्व करते हुए तांडव एवं लास्य शैलियों में अर्धनारीश्वर का प्रतीक स्वरुप हैं। इस कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने कहा कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में गुरु और गोविंद का अभाव था। भरत मुनि की मूर्ति स्थापित होने से अब वह पूरा हो गया है। इस प्रतिमा का अनवारण सांस्कृतिक पुरानुत्थान के निमित्त हुआ है। उन्होंने यह भी कहा की कला केंद्र का नाम बदलकर नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरत मुनि के नाम पर रख देना चाहिए। उन्होंने सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में आगे बढ़ने का आवाहन किया और साथ ही कहा कि मोटे ग्रंथों का अपना महत्व ही लेकिन सिर्फ विद्वानों के लिए आम-जन के ऐसी पुस्तकों का अध्ययन कठिन है।

इस अवसर पर सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. पद्मा सुब्रमनियम ने कहा कि भरत मुनि हमारे आदि गुरु हैं और गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इस मूर्ति का अनावरण करना एक सुखद अनुभव है। उन्होंने बताया की किस तरस घंटो मूर्ति के मूर्तिकरों एवं पुराविद के साथ बैठ कर इस संकल्पना को साकार रूप प्रदान किया है। उन्होंने इस अवसर पर मुस्ती के निर्माताओं एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को धन्यवाद दिया। इस अवसर पर कला केंद्र के कलाकोश विभाग द्वारा सात पुस्तकों जैमनीय ब्राह्मण, जयसेनापति विचरित नृत्यरत्नावली थे सिलिंग्स आॅफ इंडियन टेम्पल, देश कबीर का, एस्थेटिक टेक्चर लिविंग ट्रेडीशन आॅफ थे महाभारत, संजारी एक भारत श्रेष्ठ भारत एवं कलाकल्प का विमोचन किया गया।

संस्कृत विश्वविद्यालय कर्नाटक के कुलपति श्री मल्लापुरम जी. वेंकटेश ने कलाकोश के प्रतिष्ठा दिवस पर एक विशिष्ठ व्याख्यान प्रस्तुत किया एवं कार्यक्रम के अंत में दीप्ती ओमचरी भल्ला एवं उनके शिष्यों द्वारा मंत्रमुग्ध कर देने वाली मोहिनीअट्टम नृत्य की प्रस्तुति पेश की गई।


 
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