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जेएनयू में लाल आतंक पुलिस ने की पुष्टि

24/01/2020

जेएनयू में लाल आतंक पुलिस ने की पुष्टि

सौरव राय

वाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में नकाबपोशों के उत्पात से पूरा देश सन्न रह गया था। कुछ अज्ञात लोगों ने कैंपस के अंदर हॉस्टल में जमकर तोड़फोड़ की और तथा छात्रों से मारपीट की। इसमें वामपंथी व एबीवीपी दोनों संगठनों के छात्रों को गंभीर चोटें आर्इं। हालांकि जांच के बाद पुलिस ने जिन 9 उपद्रवियों की पहचान की है उसमें 9 वामपंथी छात्र संगठन के व दो एबीवीपी से जुड़े हैं। इस घटना के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय के छात्रों का कहना है कि इसकी शुरुआत लेμट संगठन के छात्र संगठनों द्वारा ही की गई। जेएनयू में हिंदी विभाग के शोधार्थी सूर्यभान के मुताबिक एक जनवरी को उन्हें एक काम के सिलसिले में विभाग के अध्यक्ष से एक जरूरी कागज पर हस्ताक्षर कराना था। वे जैसे ही विभाग पहुंचे लेμट के छात्र वहां पहले से ही मौजूद थे।

पूरे कैंपस को राजनीतिक स्वार्थसिद्धी का अड्डा बना दिया गया है। आज कल यहां पढ़ाई कम, मोदी विरोध ज्यादा दिख रहा है। इसमें सभी पार्टियों की समान सहभागिता है।

उन्होंने उन्हें अंदर जाने से रोका। सूर्यभान के शब्दों में-जब मैंने कहा कि मुझे जरूरी काम है और हस्ताक्षर कराना जरूरी है तब भी वह लोग सुनने के लिए तैयार नहीं थे। बात के दौरान कई दफा मुझे ऐसा लगा की अगर मैंने विरोध किया तो यह लोग हमला कर देंगे। और यह सिलसिला आज का नहीं बल्कि जबसे फीस वृद्धि हुई है तब से चल रहा है। उन्होंने आगे बताया कि विश्वविद्यालय का इतिहास रहा है कि कोई भी बड़ा फैसला बिना छात्रों को जीवीएम में बुलाए नहीं होता फिर जेएनयूएसयू ने छात्रों को जीवीएम में क्यों नहीं बुला के पूछा कि कितने छात्र रजिस्ट्रेशन करना चाहते हैं। आप अकेले पूरे छात्रों के लिए कैसे फैसला कर सकते हैं। इसी तरह इंटरनेशनल स्टडीज के शोधार्थी सुबोध कुमार ने कहा कि लेμट संगठनों ने पिछले दो महीने से विश्वविद्यालय का काम पूरी तरह से ठप कर दिया है। न ही पढ़ाई सुचारू रूप से चल रही है और न ही प्रशासनिक काम ही हो रहा है। इसकी वजह से हमारी फेलोशिप भी रुकी हुई है। गरीब छात्र दिल्ली जैसी जगह पर कैसे रहेगा। क्या अब उनको इन गरीब छात्रों की चिंता नहीं है। लेμट के हंगामे की वजह से कई लड़कियां घर जा चुकी हैं। पूरे कैंपस को इन्होंने राजनैतिक अड्डा बना दिया है।

दिल्ली पुलिस का खुलासा

दिल्ली पुलिस ने जेएनयू की घटना के बाद दस जनवरी को एक प्रेस कांफ्रेंस की जिसमे डीसीपी जॉय तिर्की ने घटनाओं को सिलसिलेवार तरीके से रखा। उन्होंने वह फोटो भी दिखाए जिसमे जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आईशी घोष खुद कुछ लड़कों के साथ हिंसा में शामिल थीं। पुलिस ने अपनी जाँच में बताया कि हमने कई छात्रों से पूरी घटना के बारे में विस्तार से बात की है जिसमे यह सामने निकल के आया कि जो हिंसक घटना पेरियार हास्टल में पांच जनवरी को घटी उसके पीछे और भी घटनाएँ हैं जो इससे जुड़ी हुई हैं। हमने इसमें कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरें और वीडियो की मदद से नौ छात्रों की पहचान की है। इन छात्रों में जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष, जेएनयू छात्रसंघ की काउंसलर सुचेता ताल्लुकदार, चुनचुन कुमार, प्रिया रंजन,डोलन सामंत, योगेंद्र भारद्वाज, विकास पटेल, पंकज मिश्रा और वास्कर विजय शामिल हैं।

आज कल यहां पढ़ाई कम, मोदी विरोध ज्यादा दिख रहा है। मोदी विरोध में क्या दिक्कत है, मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं जब उनकी नीतियां लोगों को नहीं ठीक लगेगीं तो उनका विरोध तो होगा ही? यह पूछने पर उनका जवाब था कि मोदी की पॉलिसी के विरोध में कोई दिक्कत नहीं है। मामला दरअसल दूसरा है। लेμट विंग यह साबित करने पर उतारू है कि मोदी देश को बर्बाद कर देंगे। सवाल इस भय का है। और इस भय को फैलाने में यहां के प्रोफेसरों का भी हाथ है। वहीं दूसरी तरफ अनुवाद में शोध करने वाली शोधार्थी कमर जहां ने कहा कि यह हिंसा पूरी तरह से संगठित थी। यह एबीवीपी का कारनामा है। मास्क पहनकर उपद्रव करने वाले छात्र एबीवीपी के थे इस आरोप पर छात्र विजय कुमार का प्रश्न है कि यह कैसे पहचाना जब वे मास्क पहने हुए थे? यह विद्यार्थी परिषद के खिलाफ एक प्रौपेगैंडा है। इनकी पुरानी आदत रही है खुद हिंसा करेंगे और दोष दूसरे पर मढ़ देंगे। जेएनयू के ताजा घटनाक्रम में दोनों तरफ के प्राध्यापक भी घायल हैं।

क्या है पूरा मामला

पिछले कई महीनों से जेएनयू खबरों का केंद्र बना हुआ है। अगर थोड़ा और पीछे जाएं तो पाएंगे कि यह 2016 से ही केंद्र में है। दरअसल नया मामला फीस वृद्धि को लेकर उठा है। प्रशासन ने फीस में वृद्धि की और छात्र आन्दोलन करने लगे। यह एक तरह से सामान्य प्रक्रिया है। लोकतंत्र में सबको असहमति दर्ज कराने का अधिकार है। पर मामला यहीं तक नहीं है। इसके पीछे भी बहुत कुछ हुआ जो खबरों का हिस्सा नहीं रहा। आन्दोलन कर रहे छात्रों का संगठन हर दिन विश्वविद्यालय के काम में बाधा डालता रहा है। विभाग के दरवाजे पर बैठ जाना, शिक्षकों को काम न करने देना, प्रशासनिक कार्य में व्यवधान डालना, और तो और अगर कोई मीटिंग चल रही है तो उसमे पहुंच कर हंगामा करना, टेबल पर रखे कागजातों को फाड़ देना, आदि जैसे परेशान करने वाले काम इनके द्वारा किये जा रहे थे। यह तथाकथित आन्दोलनकारी यहीं तक नहीं रुके। ये टर्म पेपर और सेमिनार तक के लिए छात्रों को रोक रहे थे।

प्रशासन ने टर्म पेपर जब छात्रों से आॅनलाइन मांगा तो उसे व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी कह कर गलत तरह से प्रचारित किया गया। इनकी अति तो तब हो गई जब प्रशासन ने एक जनवरी से पांच जनवरी तक छात्रों को दाखिला के लिए रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने को कहा। इस दाखिला प्रक्रिया को रोकने के लिए उन्होंने सर्वर रूम पर कब्जा कर लिया। इस मामले में जेएनयू एबीवीपी के अध्यक्ष दुर्गेश कुमार का कहना है कि अगर किसी को रजिस्ट्रेशन नहीं करना है तो मत करे लेकिन जो स्टूडेंट्स रजिस्ट्रेशन करना चाहते हैं उनको रोकने का अधिकार किसी को नहीं। इस बात को लेकर हल्की झड़पें दोनों तरफ से होती रही। मामला तीन जनवरी के बाद बिगड़ने लगा। दाखिले की अंतिम तारीख देख छात्र परेशान होने लगे। यहां पर मामला छात्र हित में होने के कारण एबीवीपी ने इसमें दखल दिया। विश्वविद्यालय में स्थिरता कब आएगी? इसका किसी को पता नहीं क्योंकि जो मौजूदा स्थिति है उसमें यह परिसर ज्ञान का कम वैचारिक राजनीति का बड़ा अखाड़ा दिख रहा है।

 


 
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