युगवार्ता

Blog single photo

राजनीतिक फुटबॉल बनी एनआरसी

06/12/2019

राजनीतिक फुटबॉल बनी एनआरसी

अरविंद कुमार राय

विपक्ष एनआरसी की त्रुटि के लिए पूरी तरह से सरकार को कसूरवार ठहरा रही है। जबकि सत्ता पक्ष अपना पल्ला झाड़ते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने की बात कह रहा है।

लंबी जद्दोजहद के बाद देश की सर्वोच्च अदालत की निगरानी में तैयार हुई असम की राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) देश के लिए एक धरोहर होनी चाहिए थी। इसे देश के अन्य राज्यों के लिए उदाहरण के तौर पर देखा जाना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य से आज एनआरसी राजनीति का फुटबॉल बन गया है। वर्तमान समय में सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी अपने-अपने फायदे के अनुरूप इसमें कमियां गिना रहे हैं, त्रुटियां बता रहे हैं। जबकि गैर राजनीतिक संगठन भी एनआरसी को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। सही अर्थों में वर्तमान समय में एनआरसी अद्यतन की प्रक्रिया को लेकर अगर कोई वाजिबतौर पर संतुष्ट है तो वह आॅल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) और आॅल असम मुस्लिम छात्र संस्था (आम्सू) है। इसके अलावा राज्य के सभी राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और छात्र संगठन एनआरसी को लेकर खुले मन से संतुष्ट नहीं हैं।
असम सरकार के प्रभावशाली नेता डॉ. हिमंत विश्वशर्मा ने चालू वित्त वर्ष के 31 अगस्त को प्रकाशित हुई एनआरसी की अंतिम सूची को त्रुटिपूर्ण बताते हुए स्वीकार करने से इंकार कर दिया है। ऐसे में इसमें जो त्रुटियां हैं उसको दूर किए बिना सहजता के साथ स्वीकार करना संभव नहीं है। हालांकि उन्होंने केंद्र सरकार से देश भर में होने जा रहे एनआरसी अद्यतन की प्रक्रिया के साथ असम में भी फिर से एनआरसी अद्यतन की बात कही है। उन्होंने कहा कि एनआरसी अद्यतन के लिए नागरिकता आधार वर्ष पूरे देश में 1951 है, जबकि असम में यह 1971 के तहत किया गया है। इसलिए असम में फिर से एनआरसी का अद्यतन आधार वर्ष 1951 के तहत किया जाएगा। हालांकि विपक्ष आधार 1951 के मुद्दे पर कड़ा विरोध कर रहा है। विपक्ष का कहना है कि असम समझौते के अनुसार ही एनआरसी का आधार वर्ष 1971 हुआ है। अगर इसमें तब्दीली हुई तो असम समझौते का अर्थ ही नहीं रह जाएगा।
इस संबंध में डॉ. विश्वशर्मा असम समझौते पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर एनआरसी के प्रदेश कोआॅर्डिनेटर रहे प्रतीक हजेला पर भी अब सवालिया निशान खुले तौर पर लगने लगे हैं। हालांकि एनआरसी अद्यतन प्रक्रिया के अंतिम चरणों के दौरान ही प्रतीक हजेला के क्रियाकलापों को लेकर सरकार भी संतुष्ट नहीं थी। सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने खुले तौर पर कहा कि हजेला मनमाने तरीके से एनआरसी की प्रक्रिया को अंजाम दे रहे हैं। जिससे प्रकृत भारतीय नागरिकों का नाम एनआरसी में शामिल होने से बड़ी संख्या में छूट गया है। मजेदार बात है कि अद्यतन प्रक्रिया के दौरान हजेला को कभी भी असम में डर नहीं लगा। लेकिन जब अंतिम सूची प्रकाशित होने वाली थी तो उन्हें असम में डर लगने लगा। सुप्रीम कोर्ट से हजेला ने मध्य प्रदेश जाने की गुहार लगाई। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अर्जी को स्वीकार करते हुए असम सरकार को हजेला को मध्य प्रदेश भेजने का निर्देश जारी कर दिया। जिसके तहत वे असम से मध्यप्रदेश पहुंच गए हैं।
प्रतीक हजेला पर सिर्फ सबूतों को लेकर ही आरोप नहीं लग रहे हैं, बल्कि कथिततौर पर अद्यतन प्रक्रिया के लिए केंद्र सरकार से जारी किए गए 16 सौ करोड़ रुपये में भ्रष्टाचार होने का भी गंभीर आरोप लगने लगा है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी सीबीआई से प्रतीक हजेला की जांच कराने की मांग कर दी है। राज्य के एक-दो संगठनों को छोड़कर अधिकांश राजनीतिक दल और संगठनों का मानना है कि अद्यतन प्रक्रिया के दौरान एनआरसी की सूची में शामिल होने से छूट गए 19 लाख लोगों में से अधिकांश नागरिक प्रकृत तौर पर भारतीय हैं। उनका नाम एनआरसी में शामिल होना चाहिए था। वहीं दूसरी ओर यह भी मानना है कि प्रकाशित सूची में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों का नाम शामिल हो गया है।
अंतिम सूची प्रकाशित करने से पहले भाजपा समेत कई संगठनों ने पुनर्सत्यापन की मांग उठाई थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजामंदी देते हुए सूची के 10 फीसद नामों के पुनर्सत्यापन का निर्देश दिया था। पुनर्सत्यापन के दौरान निश्चिततौर पर कुछ त्रुटियां सामने आई थीं। इसी के आधार पर यह कहा जा रहा है कि प्रकाशित एनआरसी अद्यतन की सूची में घुसपैठियों का नाम शामिल होने की बात कही जा रही है। विपक्ष एनआरसी की त्रुटि के लिए पूरी तरह से सरकार को कसूरवार ठहरा रही है। जबकि सत्ता पक्ष अपना पल्ला झाड़ते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने की बात कह रहा है। कुल मिलाकर वर्तमान दौर में एनआरसी राजनीतिक फुटबॉल बन गया है। जिस पर सभी अपने-अपने फायदे के हिसाब से बयानबाजी कर रहे हैं।



 
Top