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अमरकंटक की विशाल शिला पर मिलेंगे 'फरस विनायक'

01/09/2019

(गणेश चतुर्थी, 3 सितम्बर पर विशेष)
  
लोकेन्द्र सिंह

पृथ्वी पर भगवान शिव का धाम (निवास) कहां है? यदि यह प्रश्न आपके सामने आएगा तो अधिक संभावना है कि आप क्षणभर गंवाए बिना उत्तर देंगे - और कहां, कैलाश। अपने उत्तर में दूसरा स्थान आप काशी भी जोड़ सकते हैं। किन्तु, अमरकंटक शायद ही आपके ध्यान में आए। जी हां, समुद्र तल से लगभग 3500 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक वह तीसरा स्थान है, जिसे भगवान शिव ने परिवार सहित रहने के लिए चुना था। यह उनकी पुत्री नर्मदा का उद्गम स्थल भी है। यह भूमिका इसलिए बांधी जा रही है, ताकि आपको एक महत्वपूर्ण देवस्थल 'फरस विनायक' से जोड़ा जा सके।
दरअसल, अमरकंटक में मां नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा में ऊंचे पहाड़ और घने जंगल में विशाल चट्टान पर गणेश की आकृति है। सुरम्य अरण्य में ऋद्धि-सिद्धि के दाता की यह प्रतिमा प्राकृतिक रूप से निर्मित चट्टान पर किसने और कब उकेरी होगी, कहा नहीं जा सकता। निश्चित रूप से बप्पा का कोई भक्त रहा होगा, जो या तो योजनापूर्वक यहां आया होगा और अपने आराध्य की प्रतिमा तराशी होगी। या फिर एकांत में बैठकर गणपति महाराज का ध्यान कर रहा होगा और अपनी मूर्ति कला के कौशल से विशाल शिला पर उन्हें प्रकट किया होगा। मूर्तिकार आनंद के भाव में रहा होगा। इसलिए प्रतिमा नृत्यमुद्रा में है। गणेश प्रतिमा के एक हाथ में फरसा है। इसलिए कहा गया, 'फरस विनायक'। वैसे तो भगवान गणेश के प्रमुख अस्त्र अंकुश और पाश हैं। किन्तु, अनेक गणेश मूर्तियों में हम उनके हाथ में फरसा भी देखते हैं। फरसे से गणेश का एक और प्रसंग भी जुड़ा है। उसका उल्लेख भी यहां कर देना जरूरी है। एक कथा के अनुसार, परशुरामजी कैलाश पधारे उस समय भगवान शिव ध्यान में थे। ध्यान में कोई विघ्न न डाले, इसकी जिम्मेदारी विघ्नहर्ता गणेश को दी गई। इसलिए गणेश ने परशुरामजी को शिवजी से मिलने से रोक दिया। फिर क्या था? परशुरामजी को क्रोध आ गया और दोनों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया। युद्ध के दौरान परशुरामजी के फरसे से गणेश का एक दांत टूट गया और वे एकदंत हो गए। गणेश प्रतिमा पर ध्यान दें, तो आप पाएंगे कि गणेशजी के एक हाथ में उनका टूटा हुआ दांत भी रहता है। हालांकि उनका दांत कैसे टूटा, इस संदर्भ में और भी कथाएं प्रचलित हैं। जैसे अद्वितीय महाकाव्य महाभारत लिखने के लिए उन्होंने अपना दांत तोड़कर उसको कलम के रूप में उपयोग किया। कलम से जुड़ी हुई बात है, इसलिए उल्लेख उचित होगा कि लेखन कार्य में भगवान गणेश की अत्यधिक रुचि रहती है। लिखने के लिए कलम नहीं मिलने पर अपने दांत को तोड़कर कलम बनाने के प्रसंग से लेखन के प्रति उनका समर्पण और लगाव स्वत: प्रकट होता है।
'फरस विनायक' की प्रतिमा इतनी मोहक है कि उसे बस निहारते रहो। चिड़ियों का कलरव और साल के पत्तों की सरसराहट से एक मधुर संगीत उत्पन्न होता है। आनंद उत्पन्न करने वाले इस वातावरण में गणपति के ध्यान में डूबने से अच्छा और क्या हो सकता है? किसी भलेमानुष ने विनायक को प्रसन्न करने की इच्छा से इस प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ा दिया है। श्रद्धा से हटकर देखा जाए तो उसने एक प्रतिमा के नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट किया। लेकिन जिसने भी यह किया वह भावनाओं में रहा होगा। उसका सौंदर्यबोध भी गणेश को सिंदूर में रंगा देखने का रहा होगा। क्योंकि, प्रथम पूज्य गणेश को लाल एवं सिंदूरी रंग अत्यंत प्रिय हैं। उनकी अनेक प्रसिद्ध प्रतिमाएं सिंदूरी हैं। सिंदूर और शुद्ध घी की मालिश से भगवान शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए भक्त ने 'फरस विनायक' को प्रसन्न करने की इच्छा से ही सिंदूर चढ़ाया होगा। चट्टान पर सिंदूर से बनाया गया स्वास्तिक भी इसका साक्षी प्रतीत होता है। शुभ का प्रतीक स्वास्तिक भी गणेश को अत्यंत प्रिय है।
'फरस विनायक' वाममुखी गणपति हैं। प्रतिमा में उनकी सूंड के अग्रभाग का मोड़ बाईं ओर है। जिस मूर्तिचित्र में भगवान गणेश की सूंड बाईं ओर मुड़ी होती है, उसे वाममुखी गणेश कहते हैं। वाम से अभिप्राय उत्तर भाग भी है। मान्यता है कि उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक और आनंददायक है। इसलिए बप्पा के अधिकतर भक्त अपने पूजाघर में वाममुखी गणपति की मूर्ति रखते हैं। वाममुखी गणपति की पूजा सामान्य पद्धति से की जाती है। जबकि, दक्षिणाभिमुखी या अन्य प्रकार की गणपति की मूर्ति की पूजा कर्मकांडी ढंग और नियम-पद्धति से की जाती है। जो आनंद के भाव में होता है, अपने ईश की अर्चना के लिए वह सहज मार्ग को ही चुनता है।
अमरकंटक में 'फरस विनायक' के दर्शन के लिए घने जंगल में पहाड़ चढ़ने -उतरने होंगे। साधन-वाहन छोड़कर पगडंडियों पर पैदल चलना पड़ता है। स्थानीय निवासी का सहयोग लेकर आसानी से गणेश का दर्शन किया जा सकता है। स्थानीय नागरिक को साथ लिए बिना 'फरस विनायक' को खोजना ठीक उसी प्रकार कठिन है, जिस प्रकार बिना गुरु के ज्ञान प्राप्ति का प्रयास किया जाता है। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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