युगवार्ता

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कुरेड़ी समाज का ये कैसा न्याय

01/08/2019

कुरेड़ी समाज का ये कैसा न्याय

चंदा सिंह

बिहार के समस्तीपुर जिले के शंभुपट्टी में लगी अदालत चर्चा का विषय बनी हुई है। यह स्वयंभू अदालत न केवल लोगों की शिकायतें सुन रही है, बल्कि उनको बकायदा सजा भी सुना रही है। कुरेड़ी समाज की यह अदालत कानून व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न है।

ये कैसी अदालत और ये कैसा न्याय, ये सवाल हर उस व्यक्ति के दिमाग में उठ रहा है जिसने पिछले दिनों बिहार के समस्तीपुर जिले के शंभुपट्टी में लगी अदालत में देखा और समझा। अदालत की कार्यवाही का अंदाज एक तालिबानी सरीखा था। वे अपने ही अंदाज में सजा और फैसले कर रहे थे। स्वयंभू अदालत लगाने वाले इस संगठन का नाम कुरेड़िया महासंघ है। ये नट समुदाय के लोग हैं। कुरेड़ियों की महाअदालत में दी जाने वाली अनोखी सजा का गवाह शंभुपट्टी गांव का हाट मैदान बना। घुमंतू खानाबदोश कुररियाड़ महासंघ का पांच दिवसीय सम्मेलन सह जन अदालत में इस समाज के करीब 25 हजार कुरेड़ी शंभुपट्टी गांव आये। यहां ये लोग 19 जिलों से पहुंचे थे। इस समाज के लोगों ने यहां विभिन्न स्थलों पर डेरा डाल रखा है। ग्रामीण हाट, गाछी, खेत, स्कूल समेत अन्य जगहों पर उनका ठहराव है, जिसमें युवक, युवतियां, बूढ़े और बच्चे सभी शामिल हुए।
हाट परिसर कुरेड़ी समाज की महिला, पुरुषों और बच्चों से खचाखच भरा था। दोषियों को समाज के पुलिसकर्मी बारी-बारी से पकड़कर लाते। जैसे ही उन्हें लाया जाता, पूरे हाट परिसर में कोलाहल मच जाता था। जिसे अदालत के सिपाही दबाने की भरपूर कोशिश करते। दोषी के अदालत में पेश होते ही पहले उसके चेहरे पर कालिख और चूना पोता जाता, माथे में बेल बांधा जाता उसके बाद समाज के सिपाही उसे पूरे मैदान में लोगों के सामने घुमाकर पहचान कराते। फिर 12 फुट मोटे खंभे से बांध देते। इसके बाद बारी जज के सजा सुनाने की आती और जज आपस में मशविरा कर सजा सुनाते थे। सुनवाई के लिए 32 जज तैनात थे।

अदालत में तालियां नहीं
हाट मैदान में जिस स्थान में अदालत लगायी गयी थी, वहां एक सूखे वृक्ष का 12 फुट लम्बा खंभा काटकर गाड़ा गया था। खंभे की 12 महिलाओं ने विधिवत पूजा की व चढ़ावा चढ़ाया। मौके पर मौजूद सिपाहियों की पीठ पर हाथ में लाल रंग लगाकर थाप लगाया गया। उसके बाद जज पहुंचे। गोवर्धन, अदालत, मृदाहा व काशमा अलग-अलग टोली में बैठे थे। सभी को बैठने के लिए तार का छज्जा बिछाया गया था। जजों के बीच आपस में उनकी अपनी भाषा में खूब बहस हुई। उसके बाद सिपाहियों को खंभा गाड़ने का आदेश मिला। हिदायत दी गयी कि कोई ताली नहीं बजायेगा। सिपाहियों ने लोगों की तलाशी भी ली कि किसी के पास चाकू और छुरी तो नहीं है।


महिलाओं को भी नहीं बख्शा जाता 

महिला दोषियों के साथ जो होता है। वह तो और भी क्रूर था। महिलाओं के चेहरे पर कालिख और चूना पोता जाता था। इसके बाद बाल काटकर छोड़ दिया जाता है। जज दोषियों पर जुर्माना भी लगा रहे थे। जजों के अनुसार 51 हजार से दो लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान इस अदालत में है। महाअदालत में गोवर्धन, मृदाहा व काशमा अदालत के लोग शामिल हुए थे। पहले दिन विभिन्न कांडों के दोषी सात लोगों को सजा दी गयी। इनमें तीन महिलाएं भी थी। हालांकि महिलाओं के साथ थोड़ी नरमी यह थी कि उन्हें मैदान में घुमाया नहीं गया। भीड़ से निकालकर महिलाओं को मैदान के बीचोंबीच लाया जाता। फिर बैठाकर उनके चेहरे में कालिक पोती जाती, चूना लगाया जाता और सिर मुंडवा दिया जाता। जानकार बताते है कि एक साल तक इस समाज में हुए सभी अपराधों और अपराधियों का रिकॉड रखा जाता है। जिस पर इस महाअदालत में आॅन द स्पॉट सजा सुनायी जाती है।

बारी-बारी से पेश हुए दोषी
बारी-बारी से अदालत में दोषियों को पेश किया गया। सबसे पहले मृदाहा द्वारा दोषी को पेश किया गया। दोषी मिथुन कुरेड़ी समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड के रामचंद्रपुर का रहने वाला है। उस पर अपने ही भाई पर जानलेवा हमले का आरोप था। उसके चेहरे पर परम्परागत ढ़ग से कालिख और चूना पोता गया, माथे में बेल बांधकर खंभे से बांध दिया गया। जजों ने उसे 51 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। समस्तीपुर के समर्था कल्याणपुर के वसंत कुरेड़ी को भी इसी तरह सजा दी गयी। उसका दोष था कि उसकी पत्नी ने दूसरे पुरुष से संबंध बना लिया था। चौथे दोषी दरभंगा जिले के सोनकी निवासी बिज्जी कुरेड़ी व उसकी सास को सजा दी गयी। छठे दोषी रोसड़ा दुधपुरा के लालू कुरेड़ी को भी परम्परा के अनुसार चेहरे पर कालिख और चूना पोता गया, माथे पर बेल बांधकर खंभे से बांध दिया गया।

घुमंतू खानाबदोश कुररियाड़ महासंघ के पांच दिवसीय सम्मेलन सह जन अदालत में इस समाज के करीब 25 हजार कुरेड़ी शंभुपट्टी गांव आये।

मुगलकाल से रही परम्परा

घुमंतू खानाबदोश कुरियाड महासंघ के अध्यक्ष कमल करोड़ी मानते है कि यह परम्परा मुगलकाल से चली आ रही है। उस समय समाज की ओर से बनाये गये घेरे में जितने लोग आ गये सभी समाज के सदस्य हो गये। तब से यह परम्परा निरंतर जारी है। यह समाज भारतीय संविधान, कानून व मानवाधिकार आयोग का पूरा सम्मान करता है। इस परम्परा से भारतीय कानून व मानवाधिकार आयोग का उल्लघंन नहीं हो रहा है। आज तक उन लोगों का कोई मामला किसी कोर्ट और थाने में नहीं गया है। कमल करोड़ी का कहना है कि हमारा समाज अपनी अदालत में सुनवाई कर अदालत का बोझ कम कर रहा है। कुरेड़ी समाज के लोगों का मुख्य पेशा मधुमक्खी के छत्ते से मधु निकालना होता है। हालांकि अब ये अलग—अलग व्यवसाय में भी लग गये है। लेकिन इस जाति ने अपनी परम्परागत न्याय प्रणाली नहीं छोड़ी है। सवाल है कि आखिर यह समाज अपनी अलग अदालत क्यों लगाता है।
क्या इन्हें भारतीय संविधान और कानून के न्याय पर भरोसा नहीं। इसका जवाब धुमा फिरा कर एक ही आता है कि ये परम्परा मुगलकाल से ही चली आ रही है जिसे बिहार में आज तक निभाया जा रहा है। खैर, जो भी हो इस परम्परा ने भारतीय कानून व्यवस्था को बौना बना दिया है और कुरेड़ी समाज की इस अदालत ने कानून के समक्ष सवाल खड़ा कर दिया है। खास बात ये है कि समस्तीपुर पुलिस के नाक के नीचे ये कुरेड़ी समाज अपनी तालिबानी अदालत लगाकर दर्जनों दोषियों को सजा सुना चुके हैं। और महासंघ के लोग ऐसा कर भारतीय अदालत का बोझ कम करने का दावा करते हुए अपनी पीठ थपथपाने में लगे है।


 
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