यथावत

Blog single photo

इमरान पर चले ट्रंप के दांव

18/08/2019

इमरान पर चले ट्रंप के दांव


तीन वर्ष से अकाल का सामना कर रहे हिंगोली जिले के सेनगांव के एक किसान ने तहसीलदार जीवराज कांबले को एक पत्र लिखा। किसान ने तहसीलदार से गुजाड़ी मुश्किल से मिल पाता है। प्रधानमंत्री के रूप में इमरान खान की पहली अमेरिका यात्रा दोनों देशों के बीच 2015 के बाद होने वाली पहली शिखर-वार्ता भी थी। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी वक्तव्य के अनुसार दोनों नेताओं ने पाकिस्तान और अमेरिका के मध्य वृहद और चिरस्थायी संबंध स्थापित करने, आपसी सहयोग को मजबूत करने और दक्षिण एशिया में शांति, स्थायित्व एवं आर्थिक सम्पन्नता लाने के लिहाज से व्यापक वार्ता की। इसके अतिरिक्त दोनों नेताओं ने अफगानिस्तान में शांति और सुलह की प्रक्रिया की प्रगति की समालोचना की। अमेरिकी राष्ट्रपति ने शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान के योगदान के लिए उसकी प्रशंसा की, तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपनी प्रतिबद्धता की तस्दीक करते हुए कहा कि अफगानिस्तान में शांति की प्रक्रिया दोनों देशों की साझा जिम्मेदारी है।

अमेरिका की अपेक्षाओं पर पाकिस्तान कितना खरा उतरेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन यदि पाकिस्तानी इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता चलता है कि पाकिस्तान ने ‘डबल गेम’ में महारत हासिल की है। वह एक साथ शिकारी और शिकार दोनों के साथ खड़े होने का विशेषज्ञ है।

पाकिस्तान में सामाजिकआर्थ् िाक विकास के लिए अपनी परिकल्पना से राष्ट्रपति ट्रंप को अवगत कराने के दौरान इमरान खान ने कहा कि ‘शांतिपूर्ण पड़ोस’ उनकी विदेश नीति की एक प्राथमिकता है क्योंकि क्षेत्र में शांति और स्थायित्व पाकिस्तान में मानव संसाधनों के समुचित विकास और क्षेत्रीय संयोजकता बढ़ाने में सहायक होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने दक्षिण एशिया के लिए उनकी इस परिकल्पना की प्रशंसा की। इमरान खान और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात में दक्षिण एशिया में बदलती भू-राजनीतिक और भू- रणनीतिक परिस्थितियां उभर कर सामने आ गयीं। राष्ट्रपति ट्रंप, जो पिछले वर्ष की शुरुआत से ही पाकिस्तान पर शिकंजा कसने का प्रयास कर रहे थे, अफगानिस्तान में जारी युद्ध को खत्म करने में पाकिस्तान से रिश्ते सुधारते हुए दिखे।

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और अफगान-तालिबान के बीच रिश्तों को देखते हुए, अमेरिका यह महसूस कर रहा है कि वह पाकिस्तान की सकारात्मक मदद के बिना अफगानिस्तान में अपने उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं कर सकेगा। ओवल कार्यालय में इमरान खान से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्टत: कहा कि उनकी आशा है कि इमरान खान अफगानिस्तान में शांति के लिए समझौते करेंगे ताकि वहां उपस्थित अमेरिकी सैनिक वापस अपने घर आ सकें। हालांकि साथ ही ट्रंप ने यह भी कहा कि वह एक हμते के भीतर ही अफगानिस्तान में जारी युद्ध जीत सकते हैं, लेकिन वह 10 मिलियन लोगों को जान से नहीं मारना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि वो चाहते तो 10 दिन में अफगानिस्तान को धरती के पटल से मिटा देते। इस पर इमरान खान सहमत दिखे और कहा कि अफगानिस्तान में कोई सैन्य समाधान नहीं हो सकता और यदि आप इस समस्या का सैन्य समाधान करने की कोशिश करते हैं तो उसमे लाखों लोगों की जान जाएगी।

कश्मीर पर मध्यस्थता का अमेरिकी झूठ

दक्षिण एशिया में शांति की बात हो और भारत-पाकिस्तान संबंधों की चर्चा न हो, यह संभव ही नहीं होता। इमरान खान ने रेखांकित किया कि पाकिस्तान बातचीत और कूटनीतिक तरीकों के माध्यम से कश्मीर सहित सभी झगड़ों के निपटारे के लिए प्रयास करता रहेगा, लेकिन उन्होंने भारत में सीमापार से संचालित आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए कोई आश्वासन नहीं दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी मदद करने वाली भूमिका के लिए खुद को न केवल तैयार बताया, बल्कि एक विवादित बयान भी दे डाला। जी-20 बैठक के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए ट्रंप ने इमरान से कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें सात दशक पुराने कश्मीर मामले में मध्यस्थता करने का सुझाव दिया। यह एक ऐसी बात थी जिस पर विवाद होना स्वाभाविक था क्योंकि भारत हमेशा से पाकिस्तान के सन्दर्भ में किसी भी विवाद का अंतरराष्ट्रीयकरण करने या किसी को मध्यस्थ बनाने के खिलाफ रहा है। भारतीय नीति निर्माताओं ने उस दौर की यादें संजोकर रखी हैं जब सुरक्षा परिषद में एंग्लो-अमेरिकन कूटनीति भारतीय हितों के विरुद्ध और पाकिस्तान के पक्ष में कार्य कर रही थी। भारतीय विदेशनीति की गूढ़ समझ रखने वाले विश्लेषकों की मानें तो कोई भी भारतीय राजनेता सपने में भी इस तरह की बात सोच नहीं सकता। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने तुरंत ही इस बात का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस तरह की कोई बात नहीं कही गयी थी। चूंकि इस समय संसद का मानसून सत्र चल रहा था तो इस मामले को विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा तूल दिया जाना लाज़मी ही था। बीती 23 जुलाई को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस संदर्भ में बाकायदा अपना वक्तव्य दिया और स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने जैसा कोई अनुरोध नहीं किया है और भारत अपनी पुरानी नीति पर कायम है। अब सवाल है कि ट्रंप ने झूठ क्यों बोला। इस प्रश्न का कोई सटीक जवाब ढूंढना आसान तो नहीं है। फिर भी बदलती हुई भू-राजनितिक और भू-रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि पाकिस्तान अक्सर इस बात की मांग करता रहता था कि अमेरिका कश्मीर मसले में मध्यस्थता करके मामले का समाधान पाकिस्तान के अपेक्षाओं के अनुरूप कराए। चूंकि इस समय अमेरिका को पाकिस्तान से सहयोग की दरकार है, शायद इसीलिए ट्रंप ने मोदी से हाल ही में हुई मुलाकात की आड़ लेते हुए मध्यस्थता वाला झूठ गढ़ा।

कमोबेश इसी तरह की बात इमरान खान ने ‘यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ पीस’ में अपने संबोधन और प्रश्नोत्तर के दौरान भी कही। जिस बात को अधिकतर लोगों ने अनदेखा किया, वह थी दक्षिण एशिया की बदलती भू- राजनितिक और भू-रणनीतिक परिस्थतियां। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस संदर्भ में इतना ही कहा कि पाकिस्तान एक बड़ा देश है और अपने लिहाज से महत्वपूर्ण भी। अमेरिका के लिए पाकिस्तान के साथ टिकाऊ सहयोग और संबंध बनाए रखना महत्वपूर्ण है ताकि इस्लामाबाद, बीजिंग को इस क्षेत्र में कोई जगह न दे। यह अमेरिका का विरोधाभास ही है कि एक तरफ तो वह अफगानिस्तान से युद्ध समाप्त करके वापस जाने की बात करता है और दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान के साथ संबंध और सहयोग बनाए रखना इसलिए जरुरी है ताकि चीन को इस क्षेत्र में कोई जगह न मिले।

इसका मतलब यह भी है कि पाकिस्तान, जो हमेशा से भारत विरोधी आतंकवादियों को न केवल प्रश्रय देता है बल्कि उनका भारत के हितों के खिलाफ इस्तेमाल भी करता है, से हर हाल में अच्छे संबंध बने रहने चाहिए नहीं तो चीन को अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल जाएगा। यहां यह देखने की जरूरत है कि अमेरिका की इस क्षेत्र में प्राथमिकताएं क्या हैं। क्या वह वास्तव में अफगानिस्तान में युद्ध समाप्त करके वापस जाना चाहता है या पाकिस्तान के माध्यम से तालिबान से अपनी उपस्थिति के लिए समझौता करना चाहता है। अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा बनाए गए सैन्य अड्डे में हुए निवेश और चीन की दक्षिण एशिया में बढ़ती पकड़ को देखते हुए ऐसा लगता है कि अमेरिका वास्तव में इस क्षेत्र में शांति स्थापित करके वापस नहीं जाना चाहता है, बल्कि यहां अपनी उपस्थिति बनाए रखते हुए चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहता है।

तालिबानी तो प्रारंभ से ही इस बात पर अड़े हैं कि अमेरिका को यहां से वापस जाना पड़ेगा। चूंकि मामला वापस जाने के बजाए कुछ और है, इसलिए इस समस्या का समाधान होता नहीं दिख रहा है। जहां तक पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों का प्रश्न है, पाकिस्तान के प्रति अब तक कड़ा रुख अपनाने वाले ट्रंप प्रशासन ने न केवल अपना रवैया नरम किया है बल्कि आपसी रिश्तों और सहयोग को और अधिक मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी स्पष्ट की है। अब ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि पाकिस्तान अमेरिकी हितों का ध्यान रखते हुए अफगानिस्तान मसले के हल के लिए सकारात्मक प्रयास करेगा। उन्हें यह भी उम्मीद है कि चीन के बढ़ते प्रभाव के बावजूद पाकिस्तान और अमेरिका संबंध मजबूत होंगे और दोनों एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ेंगे। इन अपेक्षाओं पर पाकिस्तान कितना खरा उतरेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। पाकिस्तानी दृष्टिकोण से यह दौरा इस लिहाज से सफल रहा कि अब ट्रंप प्रशासन द्वारा आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को लगातार आरोपित करने और धमकाने के सिलसिले को विराम लग जाएगा।

अमेरिका प्रशासन द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक सहायता पर लगी रोक को हटाने या जारी रखने के सन्दर्भ में अभी तक कोई स्पष्ट वक्तव्य तो नहीं आया है लेकिन दोनों नेताओं के बीच जिस सहजता से मुलाकात और बातचीत हुई, उससे इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आर्थिक सहायता पर लगी रोक को हटाने को लेकर दोनों पक्षों में सहमति बनी हो। जहां तक भारत का प्रश्न है,उसे पूरे दक्षिण एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर न केवल पैनी नज़र रखनी होगी बल्कि अपनी विदेश नीति को इस तरह से संचालित करना होगा कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता पर कोई आंच न आए। अमेरिका और चीन दोनों वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में बड़ी ताकतों के रूप में स्थापित हैं। दोनों इस समय दक्षिण एशिया में अपने दांव-पेच से एक दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय नीति निर्माताओं को देश के तात्कालिक और रणनीतिक दोनों प्रकार के हितों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए तैयार रहना होगा।


 
Top