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कितने दिन चल पाएगी खिचड़ी सरकार

06/12/2019

कितने दिन चल पाएगी खिचड़ी सरकार

उमेश चतुर्वेदी

शिवसेना ने अपने हठ में जिस तरह अपने धुर विरोधी दलों राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाई है, उससे विपक्षी खेमे की उम्मीदें बढ़ गई हैं। विपक्ष का खुश होना जायज है।

महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की अगुआई में तीन दलों की सरकार बनने के बाद राजनीति और विचारकों के कथित सेकुलर खेमे में खुशी की लहर है। महाराष्ट्र विधानसभा में 105 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से किनारे रखकर विपक्ष भी उत्साहित नजर आ रहा है। 2019 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के पिछले आम चुनाव की तुलना में और ज्यादा उभार के बाद से ही विपक्षी खेमा भारतीय जनता पार्टी को पटखनी देने की फिराक में था। उसे शिवसेना की हठ ने यह मौका मुहैया करा दिया। शिवसेना ने अपने हठ में जिस तरह अपने धुर विरोधी दलों राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाई है, उससे विपक्षी खेमे की उम्मीदें बढ़ गई हैं। विपक्षी खेमा यहां तक दावा करने लगा है कि अब नरेंद्र मोदी दौर के उतार की शुरूआत हो चुकी है। विपक्ष का खुश होना जायज है।
क्योंकि उसने भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में महाराष्ट्र में लगातार दूसरी बार बनने वाली सरकार की राह रोक दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वैचारिकता की उलटबांसी पर टिकी इस सरकार की उम्र कितनी होगी? सवाल यह भी है कि क्या इस मौके का फायदा उठाकर चौथे स्थान पर जा चुकी कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है? सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी की बैसाखी के सहारे सत्ता की लंबी डगर को पूरा कर पाएंगे। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या चुनाव सुधार अब जरूरी नहीं हो गया है? क्योंकि चुनाव पूर्व गठबंधन, जीत के बावजूद सरकार बनाने के लिए नैतिक रूप से जवाबदेह क्यों नहीं बन पाया? शिवसेना की अल्पमत की पहली सरकार नहीं है, जिसे कांग्रेस या उसके सहयोगी दलों ने समर्थन दिया है।
अतीत में भी कांग्रेस ने अपने से संख्या बल में छोटे दलों को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया, लेकिन जैसे उसने देखा कि वह सरकार लोक उम्मीदों पर खरी उतरने लगी, इस वजह से उस सरकार की स्थिति मजबूत होने लगी या फिर कांग्रेस के लिए माकूल राजनीतिक माहौल सामने आया, पार्टी ने समर्थन की बैसाखी खींचने में देर नहीं लगाई और अच्छी-भली चलती हुई सरकारों को उसने किनारे लगा दिया। केंद्र में चंद्रशेखर, एचडी देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की सरकारें राजनीति की राह पर ठीक तरीके से दौड़ रही थीं, लेकिन उनकी राह में अचानक ब्रेक लगाने में कांग्रेस ने देर नहीं लगाई। उसके पहले उसने ऐसा ही करतब चौधरी चरण सिंह के साथ 1979 में किया था, जब उनकी सरकार को महज कुछ दिनों में ही समर्थन खींचकर गिरा दिया था।
कांग्रेस समर्थित हर सरकार गिरने के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को ही फायदा हुआ। 1980 के चुनावों में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई, 1991 में चंद्रशेखर सरकार गिरने के बाद हुए चुनावों में भी कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनकर उभरी। हां, इस मामले में अपवाद 1998 रहा। इंद्रकुमार गुजराल की सरकार कांग्रेस ने गिराई, लेकिन उसके बाद हुए चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को जीत मिली। राजनीति में धारणाएं ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर बनती हैं। लिहाजा यह मानने का कोई कारण नहीं है कि जैसे ही कांग्रेस के माकूल माहौल दिखेगा, वह उस शिवसेना की सरकार गिराने के लिए सोच-विचार नहीं करेगी, जिसके नेता स्वर्गीय बाल ठाकरे और उसके नेता सोनिया गांधी के खिलाफ आग उगलते थे।
महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक माहौल के संदर्भ में शरद पवार को चाहे जितना भी बड़ा नेता माना जा रहा हो, उन्हें आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति का चाणक्य कहा जा रहा हो। लेकिन एक कटु सत्य यह भी है कि उनकी छवि ऐसे राजनेता के तौर पर है, जो हर माहौल में अपना फायदा देखता है। शरद पवार के बारे में महाराष्ट्र के बाहर धारणा है कि वे अपने राजनीतिक और निजी हित के लिए किसी भी गठबंधन, विचारधारा या राजनीतिक दल से समझौता कर सकते हैं। पी ए संगमा और तारिक अनवर के साथ उन्होंने 1999 में कांग्रेस पार्टी को अलविदा सोनिया गांधी के विदेशी मूल को मुद्दा बनाकर किया था। लेकिन उसी कांग्रेस के साथ कुछ ही महीनों बाद महाराष्ट्र में उन्होंने सरकार बना ली। इसके बाद 2004 से 2014 तक वे केंद्र सरकार में शामिल भी रहे। अपने भतीजे अजित पवार को उन्होंने महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाया। इस बार भी वे ना-नुकुर करते रहे।
उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना-दोनों से बातचीत जारी रखी। कुछ राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि उनकी ही शह पर अजित पवार ने भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया। क्योंकि जब अजित ने देवेंद्र फडनवीस के साथ 23 नवंबर को शपथ ली तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तमाम नेता अजित के खिलाफ हो गए थे। लेकिन शरद पवार ने उनके खिलाफ किसी को भी बोलने नहीं दिया। शरद पवार ने उन्हें सिर्फ पार्टी के विधायक दल के नेता पद से हटाया, लेकिन उनके खिलाफ कोई अनुशासनिक कार्रवाई नहीं की। फिर उन्हें मनाने के लिए छगन भुजबल और जयंत पाटिल को भेजा और जब अजित देवेंद्र फडनवीस का हाथ छोड़कर लौट आए तो उन्हें स्वीकार भी कर लिया, उनकी बेटी सुप्रिया सुले ने अजित को गले लगाया और यह फोटो पूरे देश की मीडिया में छपा। कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अजित के शपथ के दो दिन पहले संसद भवन में प्रधानमंत्री से शरद पवार के बाद ही राज्य में भाजपा-एनसीपी की सरकार बनने की भूमिका बनी थी।
लेकिन शरद पवार की कुछ शर्तों को जब भारतीय जनता पार्टी ने मानने से इनकार कर दिया तो उन्होंने पार्टी को गच्चा दे दिया। जानकार तर्क देते हैं कि प्रधानमंत्री आमतौर पर विवादास्पद मामलों में ट्वीट नहीं करते। प्रधानमंत्री को भरोसा था कि अजित पवार की अगुआई में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता पार्टी का साथ देगी, इसलिए उन्होंने शपथ ग्रहण के बाद अपने ट्वीट में बधाई दी। कुछ राजनीतिक जानकार शरद पवार के पैंतरे को उनकी चाणक्य नीति मानते हैं तो कुछ इसे उनकी अवसरवादिता मानते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस दांव के जरिए शरद पवार ने तीन तीर एक साथ साधे हैं। उन्होंने अजित पवार को एक हद तक कमजोर कर दिया। इससे सुप्रिया सुले को पवार विरासत के तौर पर स्थापित करना आसान हो गया। फिर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को अवसरवादी पार्टी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की। शिवसेना के साथ जाकर उन्होंने उसका ही नुकसान किया है। अतीत में शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के खिलाफ भी आग उगलते थे।
21 अक्टूबर को निर्वाचन के दिन शिवसेना के मुख पत्र सामना ने लीड रिपोर्ट में लिखा था कि देशद्रोही कांग्रेस पार्टी को सत्ता से दूर करने के लिए मतदान करो। अब वही आग उगलने वाली पार्टी शरद पवार की शरण में है और शरद पवार अपने इशारे पर उस सरकार को चलाएंगे। जाहिर है कि इसका फायदा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को ही मिलेगा। इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान शिवसेना का होता नजर आ रहा है। शिवसेना का आधार वोट बैंक और कार्यकर्ता उग्र हिंदुत्ववादी विचारधारा का पोषक रहा है। नई सरकार में शिवसेना को लंबी डगर तय करने के लिए उग्र हिंदुत्व की राह छोड़नी होगी। बदले हुए हालात को तीन दशक से पोषित कैडर के लिए आत्मसात कर पाना आसान नहीं होगा। यही शिवसेना की सबसे बड़ी चुनौती होगी। शिवसेना जहां उग्र हिंदुत्व की हिमायती है, वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस अल्पसंख्यकवाद की हिमायती है।
इस मसले पर भी आने वाले दिनों में तीनों दलों में टकराव दिख सकते हैं। बेशक तीनों दलों ने शासन चलाने के लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तय किए हैं, लेकिन आने वाले दिनों जब राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव होंगे तो स्थानीय स्तर पर राजनीतिक फायदे की उम्मीद लगा रखे कैडर के बीच हितों का टकराव होगा और फिर इस टकराव को टाल पाना कम से कम शिवसेना के लिए आसान नहीं होगा। जाहिर है कि उसका असर स्थानीय स्तर पर पड़े बिना नहीं रहेगा। इसका असर मौजूदा राज्य सरकार की सेहत और स्थिरता पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। भारतीय जनता पार्टी के साथ शिवसेना का चूंकि चुनाव पूर्व गठबंधन था, इसी गठबंधन के दम पर राज्य की जनता ने उसकी अगुआई में सरकार बनाने के लिए जनादेश दिया है और भाजपा अब राजनीतिक कारणों से अलग-थलग है। इसलिए उसके प्रति लोगों की सहानुभूति बढ़ने की संभावना है।
1996 में जब सबसे बड़ा दल होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार गिर गई थी और छोटे-छोटे दल सरकार की मलाई खाने में जुट गए थे तो आम लोगों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। भारतीय जनता पार्टी के प्रति वोटरों की हमदर्दी बढ़ी थी और इसका असर यह हुआ कि 1998 में हुए आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में एनडीए को बड़ी जीत मिली। ऐसा 2005 में बिहार में भी हुआ। तब जनता दल यू और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। तब 29 सीटों के साथ जीती लोक जनशक्ति पार्टी ने जनता दल यू का साथ नहीं दिया था। इसके बाद मजबूरन चुनाव हुए तो जनता दल यू-भाजपा गठबंधन को सहानुभूति के चलते भारी जीत मिली। अगर महाराष्ट्र में कुछ इसी अंदाज में इतिहास दोहराया जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए। वैसे यह सच है कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी और एक हद तक शिवसेना का कार्यकर्ता भी ठगा महसूस कर रहा है। कार्यकतार्ओं की मायूसी की राजनीतिक अनुगूंज दूर तक सुनाई देगी।


 
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