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सख्त कानून काफी नहीं

02/01/2020

सख्त कानून काफी नहीं

गुंजन कुमार

सात साल पहले दिल्ली की सर्द रात। तारीख थी, 16 दिसंबर। उस सर्द रात में एक वारदात हुई। एक मासूम का बलात्कार हुआ। दरिंदों ने इंसानियत की सभी हदें पार कर दी। पूरे देश के लिए यह तारीख अब दर्द बन चुका है। वारदात दिल्ली में हुई। मगर उससे पूरा देश हिल गया। लोगों का गुस्सा दिल्ली की सड़कों पर फूट पड़ा। देश भर से लोग दिल्ली पहुंचने लगे। आम लोगों का रौद्र रूप देखकर तत्कालीन सरकार की कुर्सी हिलने लगी। सरकार ने उस निर्भया कांड के बाद कानून में कई बदलाव किए। लड़कियों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए गए। सरकार ने लोगों को बताया कि अब देश की बेटियां सुरक्षित हो गई हैं। मगर यह पूर्णत: गलत साबित हुआ। बेटियों की इज्जत अब भी उतारी जा रही हैं। दरिंदें दरिंदगी कर रहे हैं। निर्भया कांड के सातवीं बरसी से पहले ही हैदराबाद में एक ऐसी ही दरिंदगी को अंजाम दिया गया। हैदराबाद ही क्यों? उत्तर प्रदेश के उन्नाव, बिहार के बक्सर, समस्तीपुर में उसे और आगे बढ़ाया।लोगों के लगातार विरोध प्रदर्शन के बाद बलात्कार कानून बदला गया। निर्भया कांड के बाद सड़कों पर प्रदर्शन और महिला सुरक्षा पर बहस हो रही थी।

सख्त कानून के बाद भी आखिर देश की बेटियां असुरक्षित क्यों हैं इस पर सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन बताती हंै, ‘इसका पहला कारण है कि पुलिस स्वतंत्र नहीं है। इसके अलावा समाज में आई गिरावट भी जिम्मेवार है। जहां परिवार छोटा और बच्चा अकेला है।’

बहस सड़क से संसद तक पहुंची। जिसके बाद सरकार ने बलात्कार कानून में बदलाव किए। इसके लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा की अगुवाई में तीन सदस्यीय कमिटी बनाई। कमिटी में न्यायाधीश वर्मा के अलावा न्यायमूर्ति लीला सेठ और पूर्व सॉलीसिटर गोपाल सुब्रह्मण्यम थे। उन्होंने देश भर से सिफारिशें मांगी। कमिटी को देश और दुनिया से 80 हजार से ज्यादा सिफारिशें मिली। कमिटी ने 29 दिनों में 631 पेज की रिपोर्ट 22 जनवरी 2013 में सरकार को सौंप दी थी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश वर्मा ने सरकार को रिपोर्ट सौंपते समय कहा, ‘इस तरह के अपराध कानून की कमी के कारण नहीं बल्कि सुशासन की कमी से होते हैं।’न्यायाधीश वर्मा की बात सौ फीसदी सही साबित हुई। महिला सुरक्षा और बलात्कार के सख्त कानून भी देश की बेटियों को नहीं बचा पा रही है। तभी तो हैदराबाद में पशु चिकित्सक प्रियंका रेड्डी की स्कूटी खराब होने पर मदद के बहाने सामूहिक बलात्कार किया गया। तेलंगाना के हैदराबाद के साइबराबाद में 27 और 28 नवंबर की रात यह दर्दनाक घटना घटी। चार दरिंदों ने इसे अंजाम दिया। इसके बाद उन चारों ने डॉक्टर को नेशनल हाइवे-44 पर अंडरपास के पास जिंदा जला दिया।

वर्मा कमेटी की सिफारिशें

महिला के कपड़े फाड़ने की कोशिश पर 7 साल की सजा मिले।

बदनीयती से देखने, इशारे करने पर 1 साल की सजा हो।

इंटरनेट पर जासूसी करने पर 1 साल की सजा दी जाए।

मानव तस्करी में पीड़ित की सहमति गैरजरूरी।

मानव तस्करी में कम से कम 7 साल की सजा।

अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाई जाए।

पुलिस में सुधार हो।

बच्चों की तस्करी पर सरकार ठोस कदम उठाए और डेटाबेस बनाए।

कानून का पालन करने वाली एजेंसियां नेताओं के हाथ का खिलौना न बनें।

सरकारी संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही लाई जाए।

दिल्ली में कानून व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर असमंजस खत्म हो।

सभी शादियां रजिस्टर हों, दहेज लेनदेन पर निगरानी मजिस्ट्रेट करें।

बलात्कार मामले दर्ज करने में नाकाम या देरी करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो।

पीड़ित की मेडिकल जांच के लिए दिया गया प्रोटोकॉल लागू किया जाए।

सैन्य बलों की तरफ से यौन हिंसा को सामान्य कानून के तहत लाया जाए।

आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट की समीक्षा की जाए।

हिंसाग्रस्त इलाकों में महिला अपराध की जांच के लिए स्पेशल कमिश्नर तैनात हों।

निर्भया कांड के बाद एक बार फिर इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया। सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर लोगों का आक्रोश साफ दिख रहा था। हालांकि तेलंगाना पुलिस ने चारों दरिंदों को 24 घंटे में गिरμतार कर लिया। पुलिस रिमांड के दौरान सुरक्षा बलों पर हमला कर भागने के दौरान चारों एनकाउंटर में मारे गए। इस एनकाउंटर का कोई सराहना तो कोई अलोचना कर रहा है। लेकिन सवाल पहले की तरह खड़ा है कि सख्त कानून के बाद भी ऐसी घटना खत्म तो दूर कम भी क्यों नहीं हो रहे। इतने सख्त कानून के बाद भी आखिर देश की बेटियां असुरक्षित क्यों हैं इस पर सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन बताती है, ‘इसका पहला कारण है कि पुलिस स्वतंत्र नहीं है। यदि कोई रसूख परिवार का व्यक्ति आरोपी है तो पुलिस पर दबाव आ जाता है। जिस कारण पुलिस सौ फीसदी काम नहीं कर पाती है। इसके अलावा समाज में आई गिरावट भी जिम्मेवार है। जहां परिवार छोटा और बच्चा अकेला है।’

नया एंटी रेप कानून

वर्मा कमिटी की सिफारिश के बाद सरकार ने आॅर्डिनेंस जारी किया। इसके तहत कानून को लागू कर दिया गया। बाद में संसद में बिल पास किया गया और 2 अप्रैल 2013 को नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया।

बलात्कार की नई परिभाषा

आईपीसी की धारा-375 में बलात्कार को विस्तार से परिभाषित किया गया है। इसमें अगर किसी महिला के साथ कोई पुरुष जबरन शारीरिक संबंध बनाता है, तो वह बलात्कार होगा। नए परिभाषा में महिला के साथ यौनाचार या दुराचार दोनों ही बलात्कार माना जाएगा। यही नहीं महिला के प्राइवेट पार्ट में पुरुष अगर कोई भी आॅब्जेक्ट डालता है तो वह बलात्कार के लिए दोषी होगा।

उम्रकैद तक की सजा

18 साल से कम उम्र की महिला के साथ सहमति से बना संबंध भी अब बलात्कार है। ऐसे में 7 साल से उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है। आईपीसी की धारा 376ए में प्रावधान किया गया है कि अगर बलात्कार से महिला मरने जैसी स्थिति में चली जाए। ऐसे में दोषी को अधिकतम फांसी की सजा होगी। 376डी में कम से कम 20 साल और ज्यादा से ज्यादा जीवन भर के लिए जेल का प्रावधान है।

दोबारा दोषी पर फांसी

376 ई में प्रावधान किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति दोबारा बलात्कार का दोषी पाया जाता है तो उसे उम्रकैद से लेकर फांसी तक की सजा होगी।

छेड़छाड़ में सख्त सजा

पहले छेड़छाड़ पर आईपीसी की धारा 354 के तहत केस दर्ज होते थे। दोषी को 2 साल तक जेल होती थी। इसे बढ़ाकर अधिकतम 5 साल जेल का प्रावधान किया गया है। इसे गैर जमानती अपराध माना गया है।

यौन टिप्पणी पर भी सजा

नए कानूनी प्रावधान में अगर कोई व्यक्ति किसी महिला को अशोभनीय और यौन टिप्पणी करता है तो आईपीसी की धारा 354 ए पार्ट एक के तहत केस दर्ज किया जाएगा। महिला से यौन संबंध बनाने का आग्रह करने पर धारा 354 ए पार्ट दो, किसी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ पोर्नोग्राफी दिखाने पर धारा 354 ए पार्ट तीन के तहत केस दर्ज करने का प्रावधान किया गया है। इसमें भी दोषी को सजा देने का प्रावधान है।

महिला का पीछा करने पर सजा

अगर कोई भी व्यक्ति महिला की इच्छा के खिलाफ अगर उनका पीछा करता है या उससे संपर्क करने की कोशिश करता है तो उसपर आईपीसी की धारा 354 डी के तहत केस दर्ज होगा और दोषी को 3 साल तक कैद हो सकती है। साल 2014 में भाजपा के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार ने भी कानून में कई बदलाव किए हैं। 22 दिसंबर 2015 में राज्यसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल पास हुआ। इस बिल में प्रावधान किया गया है कि 16 साल या उससे अधिक उम्र के बालक को जघन्य अपराध करने पर उसे वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जाएगा। जघन्य अपराध में बलात्कार, बलात्कार से पीड़िता की मौत, सामूहिक बलात्कार और एसिड-अटैक जैसे अपराध शामिल किए गए। इन सबके अलावा वे सभी कानूनी अपराध जिनमें सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, उसे भी जघन्य अपराध माना गया है।


 
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