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कोरोना के खौफ के बीच टीबी दिवस

24/03/2020

डॉ. रमेश ठाकुर
इस समय जिधर देखो, उधर कोरोना का खौफ देता है। इसने समूचे संसार को अपने आगोश में लिया हुआ है। ज्यादातर जगहों पर लाॅकडाउन कर दिया गया है। आज विश्व तपेदिक यानी टीबी दिवस भी है। डब्ल्यूएचओ के ताजा आंकड़े बताते हैं कि टीबी की बीमारी बीते कुछ वर्षों में कमी के जगह बढ़ेातरी ही हुई है। रोकने के लिए हर वर्ष विश्व तपेदिक दिवस के मौके पर ग्लोबल स्तर पर मंथन होता है। लेकिन, इसबार कोरोना के कारण यह दिवस फीका-सा है। पर, जरूरी यह भी हो जाता है कि अचानक जन्मी समस्याएं चाहें कितनी भी क्यों न बड़ी हो, जिन विकराल समस्याओं पर रूटीन मंथन किया जाता है वह मंथन यथावत रहे। हिंदुस्तान में पोलियो के बाद दूसरी सबसे बड़ी विकराल बीमारी टीबी है। सालाना लाखों की संख्या में मरीज दम तोड़ते हैं। बीते कुछ वर्षों से टीबी बच्चों में ज्यादा फैली है। रिपोर्ट बताती है, हिंदुस्तान में पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चों में टीबी रोग युद्वस्तर पर फैल रहा है। निजी व सरकारी अस्पतालों से लिए आंकड़ों में कुल 1,33,059 बच्चों में टीबी पाई गई है, जो कुल मामलों का करीब सात फीसदी है।
ऐसा भी नहीं कि भारतीय स्वास्थ्य तंत्र टीबी को गंभीरता से नहीं ले रहा हो। टीबी पर काबू पाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘डाॅट्स‘ व अन्य दवाओं का वितरण सरकारी व निजी अस्पतालों में फ्री में देना शुरू किया। प्रचार-प्रसार भी खूब हुआ। फिलहाल विगत कुछ वर्षों से धीमा है। लेकिन, फिर भी जो उम्मीद थी, उसके परिणाम उतने उत्साहजनक नहीं निकले? कमोबेश, स्थिति पहले से भी ज्यादा चिंताजनक हो गई है। सन् 2015 से लेकर 2018 के बीच बढ़े टीबी के मामले चिंता का विषय हैं। पिछले मामलों के मुकाबले इन सालों में बीस फीसद की वृद्वि दर्ज हुई। वहीं, टीबी पर आई डब्ल्यूएचओ की पिछले साल की रिपोर्ट ने भी स्वास्थ्य सिस्टम के तोते उड़ा दिए थे। आंकड़ों में सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश से दर्ज हुए। वहां के दर्ज मामलों में 16 फीसदी वृद्धि हुई। पिछले साल पूरे देश में 21, 55, 894 टीबी के नए केस सामने आए थे। सबसे दुखद पहलू यह है, टीबी संक्रमित की बढ़ी हुई यह वृद्वि पंद्रह से बीस साल के युवाओं में दर्ज की गई।
मौजूदा केंद्र सरकार सन् 2025 तक टीबी को भारत से समाप्त करने के मिशन पर काम कर रही है। टीबी से लड़ने के लिए कई विशेष कार्ययोजनाएं संचालित हैं। नई वैक्सीन आदि की खोज भी हुई है। पर, टीबी के मौजूदा बढ़े केस उनके प्रयासों पर पानी फेरने का काम करते हैं। बीते दो दशक पहले की बात करें, तब स्वास्थ्य विभाग ने वैश्विक स्तर पर टीबी की रोकथाम के लिए डाॅट्स पर निर्भरता दिखाई थी। यूरोप के कुछ मुल्कों में डाॅट्स के परिणाम चमत्कारी रहे थे। उसको देखते हुए भारत सरकार ने इस दवा का वितरण जारी किया। तब, डब्ल्यूएचओ ने भी उम्मीद जताई थी कि डाॅट्स दवा के कोर्स से टीबी का इलाज मुमकिन होगा। पर, सिर्फ भारत में उसके नतीजे वैसे नहीं आए। जबकि, एशिया के दूसरे देशों में रिजल्ट अच्छा आया। यहां तक पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी हमसे बेहतर परिणाम दिखे। टीबी के मामलों में बढ़ोतरी से स्वास्थ्य मंत्रालय भी चिंतित है।
हिंदुस्तान में टीबी तेजी से क्यों फैल रही है इसका एक कारण भी सामने आया है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक पाॅल्युशन टीबी रोग को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। सड़क पर उड़ने वाली धूल-मिट्टी और कंस्ट्रक्शन वर्क से फैलने वाला प्रदूषण इंसान को तेजी से टीबी की तरफ खींच रहा है। निर्माण कार्य के दौरान अगर सावधानी नहीं बरती जाए तो धूल के कण उड़कर व्यक्ति के पेट में चले जाते हैं, जिससे धीरे-धीरे वह संक्रमण की चपेट में आता है। प्रदूषण इंसानों के फेफड़ों में लगातार जम रहा है। वहीं, बीड़ी, सिगरेट, खैनी व तंबाकू तो टीबी को बढ़ावा देती ही है। ऐसी वैज्ञानिक धारणा शुरू से रही है। बावजूद इसके लोग इन सबका सेवन करने से नहीं चूकते हैं। सिनेमाघरों में फिल्में शुरू होने से पहले एक व्यक्ति का विज्ञापन दिखाया जाता है जो खैनी से अपनी जान गंवा देता है। केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा सिनेमाघरों को उस विज्ञापन को दिखाना इसलिए अनिवार्य किया है ताकि लोग जागरूक हो सकें। पर, उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा।
गौरतलब है, समूचे जगत में बीमारियों से मरने वालों का एक तिहाई आंकड़ा टीबी को बताया गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हिंदुस्तान में करीब पांच लाख के आसपास लोगों की मौत टीबी से प्रत्येक वर्ष होती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति कितनी भयाभय है? हिंदुस्तान में टीबी की बीमारी दिन प्रतिदिन विकराल रूप लेती जा रही है। ऐसा भी नहीं है कि रोकने के प्रयास न हो रहे हों, काफी हो रहे है। पर, बेअसर साबित हो रहे हैं। टीबी के बढ़ते मामलों को देखकर एक बात जेहन में आती है कि एक तरफ हम आर्थिक विकास की सेहत को चंगा करके दुनिया को देश की खुशनुमा शक्ल दिखाने में लगे हैं। वही, दूसरी तरफ देशवासियों के स्वास्थ्य से हम इस कदर बे-ख्याल हैं कि किसी न किसी बीमारी की गिरफ्त में आकर उनके चेहरे की रंगत पीली पड़ रही है।
हमारे यहां टीबी के संबंध में वही पुरानी उक्ति ‘परहेज इलाज से बेहतर है’ चरित्रार्थ होती है क्योंकि टीबी के संक्रमण का प्रभाव हर आदमी पर नहीं पड़ता यानी जिनका इम्मियून सिस्टम (रोगों से लड़ने की क्षमता) कमजोर हो, वही इनके चपेट में आता है। शायद यही वजह है कि कुपोषण तथा पोषण तत्वों की कमी की वजह से गरीब इससे अधिक प्रभावित होते हैं। टीबी एक संक्रामक रोग है, जो बीमारी घेरने से पहले आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करता है। टीबी की बीमारी दूषित खानपान, प्रदूषण और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर फैलती है। यह न केवल फेफड़ों, बल्कि शरीर के दूसरे हिस्से जैसे किडनी व दिमाग पर भी हमला करती है। इसपर काबू पाने के लिए सरकार को पोलियो जैसा अभियान चलाना होगा। नहीं तो यह बीमारी यूं ही फैलती रहेगी। समाज को भी अपने स्तर पर इस बीमारी से लड़ना होगा। टीबी होने पर वैद्य-हकीमों के पास जाने के बजाय अस्पतालों में उपयुक्त इलाज कराना चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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