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हाशिये पर ‘राष्ट्र’

18/09/2019

हाशिये पर ‘राष्ट्र’

ज्ञानेंद्र कुमार संतोष

हिन्दी ‘राष्ट्र’ और ‘स्पर्धा’ को पिछले कुछ वर्षों में कई गंभीर अपूरणीय आघात लगे हैं। इसके अनेक लोकप्रिय, स्वीकृत एवं स्थापित शिखर साहित्यकार भाषा एवं समाज से अलविदा हो चुके हैं। इसमें निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव, केदारनाथ सिंह, कृष्णा सोबती और अंतत: नामवर सिंह के बिना हिन्दी की साहित्यिक दुनिया, अचानक से सुनी प्रतीत होने लगे तो, इसे केवल अतार्किक भावोच्छवास कहकर झुठला नहीं सकते हैं। जब हम वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य का अवलोकन कर रहे हैं, तो ‘अलविदा’ हो चुके हमारे ये शीर्ष साहित्यकार हमें प्रकाश की कुछ किरणें दे सकते हैं। साहित्य के ये सारे शिखर रचना पुरुष प्रथमत: और मूलत: ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ के साधक थे।

अभी हम एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। जल्द ही लोग श्रेष्ठ साहित्य और कला की तरफ पुन: वापस आयेंगे। महान कलाकृतियां कल भी कालजयी ‘शब्द’ की तरह हमारे सामने हिमालय सी खड़ी रहेंगी और हमें अधूरेपन का एहसास कराती रहेंगी।

ये साहित्यकार और ‘सर्जक’ पहले थे- विमर्शकार, मार्क्सवादी, समाजशास्त्री, राष्ट्रवादी या हिन्दुत्ववादी बाद में थे और इसी कारण साहित्य और सौन्दर्य के स्मृति संसार में ये अविस्मरणीय प्रतीत होते हैं। जो कलापूर्ण और सौन्दर्यपूर्ण है, वो मानवता, भाषा, समाज और राजनीति के लिए भी कहीं न कहीं प्रासंगिक प्रतीत होगी ही! इसी बिन्दु पर आकर हमें तीखा त्रासद अहसास होता है कि आज के अधिकतर हिन्दी साहित्यकार चाहे वे तथाकथित वामपंथी हों या स्वघोषित राष्ट्रवादी या प्रखर विमर्शवादी- वे साहित्यकार प्रतीत नहीं हो रहे हैं। इनके लिए ‘शब्द’ ‘साधना’ नहीं,बल्कि केवल ‘साधन’ प्रतीत हो रहा है। दूसरे अनुशासनों से आयातित घिसे-पिटे ‘अभिधात्मक’ नारों और मुहावरों ने साहित्य के मूल ‘साधन’ और अंतिम ‘साध्य’ ‘शब्द’ की ‘व्यंजना’ को विस्थापित सा कर दिया है। इसी कारण हमें साहित्यिक परिदृश्य में सर्वत्र महानता की गरिमा की जगह ‘औसतपन’ के छिछलेपन का अहसास हो रहा है।

आज के तथाकथित वामपंथी और सांस्कृतिक राष्ट्रवादी यदि नामवर सिंह और निर्मल वर्मा की ऊंचाई को नहीं छू पा रहे हैं, तो इसका बड़ा कारण केवल यह नहीं है कि वर्तमान पीढ़ी के पास उनकी जैसी प्रतिभा नहीं है, बल्कि मूलभूत कारण यह है कि समकालीन साहित्यिक पीढ़ी की ‘साहित्य’ और ‘साहित्यकार’ की आधारभूत अवधारणा ही असंगत और आत्मघाती है।

‘शब्द’ ही साहित्य की सत्ता, शक्ति और अस्मिता है। ‘शब्द’ को हाशिए पर धकेल कर ‘महानता’ की यात्रा आत्ममुग्धता और छल के अलावा और कुछ नहीं है। राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजवाद के ‘शब्द’ और साहित्य के ‘शब्द’ के मध्य अर्थ की – पवित्रता, आस्था और संभावना की दुर्गम अनुलंघनीय दूरी है। राजनीति और समाज विज्ञान के विमर्शों और नारों ने हिन्दी को कितना समृद्ध किया है, यह भविष्य में तय होगा,पर इतना निश्चित है कि विमर्शों ने ‘साहित्यकर्ता’ को सर्वाधिक क्षति पहुंचाई है। साहित्य की समृद्धि के लिए अन्तत: अनुशासनिक दृष्टि और इसका रचनात्मक प्रयोग अपरिहार्य हो सकता है, और हिन्दी में इसकी महान परंपरा रही भी है। पर साहित्य को तात्कालिक राजनीति और समाज का अनुवाद और पर्याय समझना नि:संदेह रूप से साहित्य की उदात्त अवधारणा को संतुलित करने वाला है।

पिछले एक दशक से भी कुछ अधिक समय से हिन्दी में ‘साहित्य’ की जगह ‘विमर्श’ केन्द्र में है। तथाकथित स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्शकार यह जानबूझकर भूल रहे हैं कि विमर्शों के मुहावरे और उसके सांचे से महान साहित्य नहीं बनता है, भले ही उन्हें पुरस्कार या विश्वविद्यालय के पाठयक्रम में जगह मिल जाये। हिन्दी के विभिन्न विमर्शों ने महान साहित्यिक परम्परा के ‘कैनन’ को प्रश्नांकित कर परम्परा की महानता को धूमिल करने का असफल प्रयास किया है। वास्तविकता यही हे कि इन विर्मशों के सांचे से निकली सैंकड़ों औसत रचनाओं के बीच अभी भी महान साहित्य की प्रतीक्षा शेष है। यह विडम्बनापूर्ण है। इस विमर्शों की त्रासदी यह है कि इन्होंने परम्परा को अप्रासंगिक और प्रगतिविरोधी मानकर स्वयं के लिये अंधेरे में धकेल दिया है और स्वयं सर्जनात्मक प्रकाश एवं ऊर्जा से रिक्त है।

पिछले एक दशक से भी कुछ अधिक समय से हिन्दी में ‘साहित्य’ की जगह ‘विमर्श’ केन्द्र में है। तथाकथित स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्शकार यह जानबूझकर भूल रहे हैं कि विमर्शों के मुहावरे और उसके सांचे से महान साहित्य नहीं बनता है, भले ही उन्हें पुरस्कार या विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में जगह मिल जाये।

नि:संदेह इससे भी दु:खद यह है कि यह अपने व्यक्तिगत संकुचित स्वार्थों के खातिर भावनात्मक रूप से उत्तेजित कर रहे हैं। अत: महसूस होता है कि विमर्शों की साहित्यिक दुनिया के दोनों धु्रवांतों पर एक साहित्यविरोधी या साहित्यहंता प्रक्रिया क्रियाशील है। महसूस होता है कि विमर्श और कुछ नहीं, बल्कि‘औसत् ापन’ को ‘महानता’ का नकाब पहनाने का एक जरिया भर है। ये विमर्शकार आत्ममुग्ध हैं- पर संतुष्ट नहीं। ये प्रशंसा और स्वीकृति के भूखे हैं- पर आत्मविश्लेषण रहित हैं। ये विमर्श चाहते हैं, पर किसी भी प्रकार की आलोचना के प्रति असहिष्णु हैं। यह भी महसूस किया जा सकता है कि साहित्य अब राजनीति को ‘मशाल’ दिखाने वाला रहनुमा नहीं रहा, बल्कि उसका अनुचर प्रतीत हो रहा है। तथाकथित ‘पुरस्कार वापसी’ भले ही ऊपर से सशक्त ‘सत्ता विरोध’ प्रतीत हो पर इससे साहित्य और उसके ‘शब्द’ की निष्पक्षता संदिग्ध हुई है।

नतीजा सामने है कि अब ठोस विचारधारा और सत्ता की जगह ‘सरकार विरोधी’ और ‘सरकार समर्थक’ खेमे में साहित्यकारों का विभाजन हो चुका है। इससे साहित्य और उसके शब्दों के प्रति जिस आस्था की परतों का निर्माण सदियों में हुआ था, वह अब अचानक से छिन्न भिन्न हो रहा है। विगत वर्षों की हिन्दी साहित्य की सर्जना- प्रवृतियों को पिछले दो तीन दशकों की राष्ट्रीय- अतं:राष्ट्रीय परिस्थिति के संदर्भ में ही देखा जा सकता है। हमारे बहुसंख्यक वरिष्ठ साहित्यकारों के सारे संस्कार, अमेरिकन पूंजीवाद का विरोध करते हुए बने हैं, और जब उन्हें यह ‘मजबूरी’ दिखाई दे रही है कि उसके सिवा कुछ ‘अपराजित’ नहीं है तो एक अन्धी गली में वे अपने आपको पाते हैं। सोवियत संघ के पतन और भारत में वामपंथ की बदहाली से उन्हें लगा कि जैसे अचानक उनसे अपने आदर्शों का सुरक्षित ढांचा छीन लिया गया है।

यह भी लक्षित किया जा सकता है कि अब अमेरिकन पूंजीवाद की जगह भारतीय संस्कृति, हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद वामपंथ के निशाने पर हैं। इसकी प्रतिक्रिया में एक नया राष्ट्रवादी साहित्यिक खेमा भी सक्रिय दिखाई दे रहा है। कुल मिलाकर साहित्य की ताकत को लेकर एक आशा, विश्वास जो आजादी के दौरान था, वह बाद में निरंतर कम हुआ है। इसका एक बड़ा कारण निर्दोष विचारधारा के अभाव का भी है। सच्चाई है कि विगत वर्ष की रेखांकित करने योगय कविताएं विफलता की पीड़ा बोध से ग्रस्त हैं। जहां तहां ऊपरी उत्साह या संघर्ष के बावजूद कविता की मन:स्थिति ‘पराजय और निराशा’ की है। कवि उदास प्रतीत होते हैं कि वर्तमान सभ्यता के मूल्य और तकनीक हर पवित्र, हर संवेदनशील की संवेदनशीलता और अद्वितीयता अर्थात सर्जना को खत्म कर रहे हैं। लगता है कि हर चीज हाथ से फिसल रही है। सब चीजें ‘खत्म हो रही हंै। आपसी रिलेशंस खत्म हो रहे हैं।’ – मुनष्य से भी प्रकृति से भी और अन्तत: जीवन से भी।

काव्यगत निराशा के इस परिदृश्य का दूसरा बुलंद पहलू यह है कि समग्र रूप से जो सारा परिदृश्य है, इसमें साहित्य खुद हाशिये पर है। बाजारबाद के दौर में नया मीडिया इतना शक्तिशाली हो गया है कि जिसको सर्जनात्मक साहित्य कहते हैं, वह मूल्यवान होते हुए भी उपेक्षित हो रहा है। वरिष्ठ कवियों के विपरीत युवा कवियों की कविता उनती उदास और विषणन नहीं है। पर युवा कविता ‘विराट थीम्स’ के अभाव में ‘डे-टुडे लाइफ’ प्रतीत होती है, मानो ‘रोज एक दिन या दृश्य या बिम्ब को दूसरे दिन, दृश्य या बिम्ब से जोड़ दिया गया है।’ उपलब्धियों के बावजूद युवा सर्जना संकुतिच प्रतीत होती है। कुल मिलाकर युवा सर्जना कविता- कहानी केंद्रित प्रतीत होती है। उपन्यास अब कहानी के समक्ष उपेक्षित प्रतीत हो रहा है। कुछ युवा लेखक अब कहानी से उपन्यास का काम करवाना चाहते हैं जो कहानी की हैसियत से बाहर की महत्वकांक्षा है। युवा लेखन में संवेदनशीलता तो महसूस हो रही है, पर वैचारिकता का अभाव प्रत्यक्ष महसूस हो रहा है। शायद इसी कारण निबंध विधा अब अछूती होती जा रही है। नामवर सिंह भारतीय आलोचना के चरम उत्कर्ष प्रतीत होते थे।

उनकी अनुपस्थिति में हिंदी आलोचना गहन अध्ययन, धैर्य और वैचारिकता के अभाव में पुस्तक समीक्षा के रूप में अवमूल्यित होती जा रही है। यह भी चिंताजनक है कि परम्परा, लोक और समाज से प्रत्यक्ष संबंधों के अभाव में युवा-लेखन नाटकों से विमुख होता प्रतीत हो रहा है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान और उसके उपरांत हिन्दी को लेकर जो संस्थाएं बनी थीं, चाहे वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन हो, काशी नगरी प्रचारणी सभा हो या दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार के लिये बनी संस्थाएं हों, वे मृतप्राय हैं। यही नहीं प्रलेस, जलेस और परिमल जैसी समानान्तर साहित्यिक संस्थाएं भी इस दौर में क्षरित हुई हैं। नामवर सिंह ने सही महसूस किया था कि कुल मिलाकर लेखकों, कवियों में संस्थावादी चरित्र कम हुआ है, जिसका प्रभाव पत्रिकाओं के प्रकाशन पर पड़ा है।

दु:खद है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार को लेकर जो उत्साह 1966 के आस-पास था, वह निरन्तर कम होता जा रहा है। संभवत: साहित्य और फिल्म को छोड़कर सभ्यता के प्रत्येक क्षेत्र में अस्सी के दशक के बाद से अंग्रेजी और अंग्रेजियत का निरंतर विस्तार हो रहा है। नव मीडिया और सोशल मीडिया ने लोकप्रिय साहित्य को अतिरिक्त महत्व दिया है, पर महान साहित्य की प्रासंगिकता न कम हुई है न होगी। लोकप्रियता उत्कृष्ट साहित्य का कोई अनिवार्य मापदंड नहीं है। श्रेष्ठ साहित्य या कला सर्वसुलभ हो, यह भी जरूरी नहीं है। इसलिए जिस विमर्शवादी साहित्य या पापुलर कल्चर की बात की जा रही है- वह बहुत टिकने वाली नहीं है।


 
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