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भारतीय खेल जगत और डोपिंग विवाद

11/08/2019

कुसुम चोपड़ा झा

हाल ही में भारतीय क्रिकेटर पृथ्वी शॉ के डोपिंग विवाद में फंसने के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने आखिरकार हथियार डालते हुए राष्ट्रीय एंटी डोपिंग एजेंसी (नाडा) से खिलाड़ियों के डोप टेस्ट करवाने के लिए हामी भर दी। दरअसल, बीसीसीआई को नाडा के अधीन लाने की मांग सालों से की जा रही थी लेकिन बीसीसीआई अभीतक इससे इनकार कर रही थी, लेकिन पृथ्वी शॉ विवाद के बाद अब बीसीसीआई इस फैसले पर राज़ी हो गई है। खेलमंत्री किरन रिजिजू ने भी बीसीसीआई के इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इसे खेल को स्वच्छ और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। दरअसल, खेल मंत्रालय की ओर से बीसीसीआई को कड़े शब्‍दों में लिखे पत्र में कहा गया था कि बीसीसीआई के एंटी डोपिंग प्रोग्राम में काफी खामियां हैं और यह हितों का टकराव भी है कि बीसीसीआई खुद ही टेस्‍ट करता है और खुद ही सज़ा भी देता है। बीसीसीआई के इस फैसले के बाद अब नाडा भारत में होने वाले किसी भी क्रिकेट मुकाबले जैसे दलीप ट्रॉफी, रणजी ट्रॉफी, कूच विहार ट्रॉफी आदि में खिलाड़ियों का डोप टेस्ट कर सकती है। यहां तक कि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में खेलने वाले देश के साथ-साथ न्यूजीलैंड, वेस्टइंडीज, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड समेत अन्य कई देशों के खिलाड़ियों का भी डोप टेस्ट करने का अधिकार नाडा के पास आ गया है। ऐसे में अब वे क्रिकेटर आईपीएल में खेलने से इनकार कर सकते हैं, जिन्हें डोप टेस्ट करवाने से परहेज है।

बेशक बीसीसीआई अब नाडा के तहत खिलाड़ियों का डोप टेस्ट करवाएगा लेकिन इसी बीच बड़ा सवाल ये उठता है कि नेम और फेम की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद भी आखिर खिलाड़ी इस विवाद में क्यों फंस जाते हैं? दरअसल, खेल कोई भी हो लेकिन खिलाड़ियों का करियर ज्यादा लंबा नहीं होता। खिलाड़ियों के लिए लंबे वक़्त तक अपनी फिटनेस को बनाए रखना बड़ी चुनौती होती है। फिटनेस की कमी के चलते अक्सर बड़े-बड़े दिग्गज खिलाड़ियों को भी खेल की दुनिया को अलविदा कहना पड़ जाता है। लेकिन अपने करियर के शिखर पर पहुंच चुके खिलाड़ियों को जब नाम और पैसा जाने का डर सताने लगता है तो वे डोपिंग जैसे शॉर्टकट अपनाने की सोचने लगते हैं। उन्हें यह उम्मीद होती है कि इसके जरिए वे अपने खेल जीवन को कुछ और लंबा खींच सकते हैं। इसी वजह से कड़ी मेहनत से कमाई गई इज्जत को भी दांव पर लगाने को रज़ामंद हो जाते हैं। भारतीय खेल जगत में डोपिंग का यह दाग़ कई खिलाड़ियों पर पहले भी लगता रहा है। अब जबकि बीसीसीआई भी नाडा के दायरे में आ गया है तो इस बात की आशंका बढ़ती दिखती है। इस लिहाज से खिलाड़ियों को ज्यादा सतर्कता की जरूरत है।

भारतीय खेल जगत में डोपिंग विवाद की बात करें तो सबसे ताजा मामला युवा होनहार क्रिकेटर पृथ्वी शॉ का है, जिसके बाद शुरू हुए विवाद में बीसीसीआई को नाडा के समक्ष समर्पण करना पड़ा। पृथ्वी शॉ ने बेहद कम उम्र में अपनी प्रतिभा की बदौलत क्रिकेट की दुनिया में नाम कमा लिया। सचिन तेंदुलकर को अपना मार्गदर्शक मानने वाले इस युवा खिलाड़ी पर डोपिंग का आरोप लगा है, जिसके चलते उनपर 15 नवंबर, 2019 तक क्रिकेट खेलने पर बैन लगा दिया गया। 22 फरवरी 2019 को इंदौर में सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी के दौरान पृथ्वी शॉ का यूरिन सैंपल लिया गया था, जिसकी जांच में सामने आया कि पृथ्वी शॉ के यूरिन सैंपल में जो प्रतिबंधित पदार्थ मिला है, उसका नाम टर्ब्यूटलाइन है, जिसका इस्तेमाल कफ सिरप में किया जाता है। यह पदार्थ द वर्ल्ड एंटी डॉपिंग एजेंसी (वाडा) की प्रतिबंधित दवाओं की सूची में भी शामिल है। इससे पहले भारतीय क्रिकेटर यूसुफ पठान भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। भारतीय क्रिकेट टीम के दिग्गज बल्लेबाजों में शुमार रहे यूसुफ पठान को 2017 में प्रतिबंधित पदार्थ टरबूटेलाइन लेने का आरोपी पाया गया था। जिसके तहत बीसीसीआई ने उन्हें पांच महीने के लिए निलंबित कर दिया था।

क्रिकेट से अलग अन्य खेलों में भी भारतीय खिलाड़ी डोपिंग विवाद में फंसते रहे हैं। 2016 में रियो-डि-जेनेरियो ओलंपिक गेम्स में हिस्सा लेने से सिर्फ एकदिन पहले भारतीय पहलवान नरसिंह यादव को प्रतिबंधित दवा एनाबॉलिक स्टेरॉयड मिथेनडायनोन लेने का दोषी पाया गया। इस टेस्ट के ए और बी दोनों ही सैंपल पॉजिटिव आए थे, जिसके बाद उनपर चार साल का प्रतिबंध लगा दिया गया। हालांकि, नरसिंह ने अपने खाने में उस प्रतिबंधित पदार्थ को मिलाए जाने का आरोप लगाया। इसी तरह सितंबर, 2010 में 53 किग्रा वर्ग की भारतीय भारोत्तोलक सनामाचा चानू नाडा के डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाई गईं। उस समय देश की सबसे सफल महिला भारोत्तोलकों में शुमार चानू प्रतिबंधित पदार्थ मिथाइलहेक्सानिएमाइन लेने की आरोपी पाई गईं थीं। 2004 एथेंस ओलंपिक में डोप टेस्ट में पकड़े जाने के बाद ये उनका दूसरा अपराध था। ऐसा ही मामला भारतीय भारोत्तोलक मोनिका देवी का भी है। 2010 में ही मोनिका देवी भी डोपिंग विवाद में फंस चुकी हैं। डोप टेस्ट पॉज़िटिव आने के बाद उन्हें बीजिंग ओलिम्पिक खेलों में हिस्सा लेने जा रहे भारतीय दल से हटा दिया गया। बताया गया कि मोनिका का एनाबोलिक सॉल्ट पॉज़िटिव पाया गया। उनके डोप टेस्ट में असफल होने से उस समय भारत की भारोत्तोलन में पदक हासिल करने की उम्मीदों को करारा झटका लगा था।

इन चर्चित मामलों के साथ केरल के ट्रिपल जंपर एथलीट रंजीत माहेश्वरी 2008 में तीन महीने के लिए सस्पेंड हो गया था। उनके यूरिन सैंपल में इडेफ्रिन नाम की दवा पॉज़िटिव पाई गई। हालांकि रंजीत ने अपनी सफाई में काफी कुछ कहा लेकिन फेडरेशन ऑफ इंडिया में सुनवाई के बाद उन्हें तीन महीने के लिए निलंबित करने का फैसला सुना दिया गया। एक अन्य मामले में डिस्कस थ्रो की मशहूर खिलाड़ी सीमा पुनिया का साल 2000 में डोप टेस्ट पॉज़टिव पाया गया था। उस समय अपने खेल के शिखर पर पहुंच चुकी सीमा को इस विवाद के चलते चिली इवेंट में जीता हुआ स्वर्ण पदक वापस करना पड़ा था। एकबार फिर से उनका डोप टेस्ट पॉज़िटिव आया था लेकिन एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने बाद में उनपर लगे आरोपों को वापस ले लिया था।

डोपिंग नाम के इस जिन्न का खुलासा भारत में पहली बार 1968 में हुआ था। उस समय दिल्ली के रेलवे स्टेडियम में मेक्सिको ओलंपिक के लिए ट्रायल चल रहे थे। उसी दौरान कृपाल सिंह नाम के एक एथलीट 10 हजार मीटर दौड़ में भागते समय ट्रैक छोड़कर सीढ़ियों पर चढ़ गए। अचानक उनके मुंह से झाग निकलने लगा और वे बेहोश हो गए। जांच में पता चला कि उन्होंने ट्रायल के दौरान नशीले पदार्थ का इस्तेमाल किया था। गौरतलब है कि 1968 के ओलिंपिक खेलों में पहली बार डोप टेस्ट हुए लेकिन इंटरनेशनल ऐथलेटिक्स फेडरेशन पहली ऐसी संस्था थी, जिसने 1928 में ही डोपिंग को लेकर नियम बना दिए थे। साल 1966 में इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल ने डोपिंग को लेकर मेडिकल काउंसिल बनाई। जिसका काम सिर्फ डोप टेस्ट करना ही था। आगे चलकर डोप टेस्ट करने का दायित्व दो संस्थाओं को दिया गया, जिनमें से वाडा ‘विश्व डोपिंग विरोधी संस्था’ है और नाडा ‘राष्ट्रीय डोपिंग विरोधी संस्था’ है। वाडा अंतरराष्ट्रीय खेलों में ड्रग्स के बढ़ते चलन को रोकने के लिए बनाई गयी एक विश्वस्तरीय स्वतंत्र संस्था है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा वाडा की स्थापना 10 नवंबर 1999 को स्विट्जरलैंड के लुसेन शहर में की गई थी। वर्तमान में वाडा का मुख्यालय कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में है। यह संस्था विश्व भर में वैज्ञानिक शोध, एंटी डोपिंग के प्रति खिलाड़यों को जागरूक करने वाले कार्यक्रमों का आयोजन करने के साथ-साथ दुनिया भर में वर्ल्ड एंटी डोपिंग कोड पर पैनी निगाह रखती है। वाडा हर साल प्रतिबंधित दवाओं की सूची जारी करता है, दुनिया के तमाम देशों में खेलों के दौरान इन दवाओं के इस्तेमाल पर रोक होती है। पहली जांच में ही दोषी पाये जाने पर खिलाड़ी पर सभी खेल प्रतियोगिताओं में दो वर्षों तक हिस्सा लेने पर प्रतिबंध लगाने से लेकर आजीवन बैन तक की सजा का प्रावधान है।

हाल के वर्षों में वाडा खेलों में ड्रग्स के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर काफी सक्रिय हो गया है। उसी तरह राष्ट्रीय एंटी डोपिंग एजेंसी (नाडा) देश में अपने सभी रूपों के खेलों में डोपिंग कंट्रोल प्रोग्राम को बढ़ावा देने, खेल संगठनों के साथ तालमेल बनाने और निगरानी करने के लिए जिम्मेदार एक राष्ट्रीय संगठन है। एंटी डोपिंग नियमों और नीतियों को अपनाने और लागू करने की जिम्मेदारी नाडा के पास होती है। ये नीतियां विश्व एंटी डोपिंग कोड के मुताबिक तय की जाती हैं। इन नीतियों के तहत अन्य खेल संगठनों और डोपिंग संगठनों के साथ सहयोग करके आगे बढ़ना, एंटी डोपिंग संगठनों के बीच पारस्परिक डोपिंग परीक्षणों को प्रोत्साहित करना, लगातार एंटी डोपिंग अनुसंधान करना और इसे लेकर खिलाड़ियों को जागरूक करना है। अभी दुनिया में वाडा से मान्यता प्राप्त 35 प्रयोगशालाएं हैं, जहां ड्रग्स लेने वाले के नमूनों की जांच और इसे रोकने के लिए अनुसंधान होते हैं। दिल्ली में भी वाडा से मान्यता प्राप्त एक प्रयोगशाला है। यह विश्व की 34वीं प्रयोगशाला है।

(लेखिका हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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