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मुसलमानों की उम्मीद मोदी

06/08/2019

मुसलमानों की उम्मीद मोदी


च्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू अपने बयानों और लेखों से हमेशा चर्चा में रहते हैं। विवाद भी पैदा करते हैं। हाल में मुस्लिमों पर लिखा उनका लेख भी उत्सुकता पैदा करता है। 2019 के जनादेश को उन्होंने मुसलमानों खासकर मुस्लिम युवाओं को उम्मीद की किरण दिखाने की कोशिश की है। कांग्रेस और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझते रहे हैं। इन दलों ने मुसलमानों के दिलों-दिमाग में यह बैठा दिया कि उनके बिना न तो केंद्र में और न ही राज्यों में सरकार बन सकती है। मगर 2019 के चुनाव परिणाम ने मुसलमानों के इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया है। इसलिए काटजू अपने लेख में मौलाना आजाद के 1947 में जामा मस्जिद में मुसलमानों से कहे उन वाक्यों का उल्लेख करते हैं, जिनमें उन्होंने कहा था, ‘‘कोई भी आपको तब तक नहीं डुबा सकता जब तक कि आप खुद नहीं डूबो। कोई भी आपको तब तक नहीं हरा सकता जब तक आप खुद को नहीं हरा देते। जब आपको इसका एहसास होगा, तब आपमें यह विश्वास पैदा होगा कि यह देश जितना दूसरों को है उतना ही हमारा है।’’

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 1973 में इंदिरा गांधी के समय गठित एक गैर-सांविधिक निकाय है। इसका गठन मुस्लिम वोट बैंक के लिए किया गया। इसमें प्रतिक्रियावादी मौलवी और अन्य लोग शामिल हैं। इनका उद्देश्य पुराने सामंती प्रतिक्रियावादी शरिया कानून की रक्षा करना और जारी रखना है, जो वास्तव में मुसलमानों को परेशान करता है।

दरअसल, कुछ राजनीतिक दलों ने अपने वोट बैंक की खातिर मुसलमानों में भाजपा और संघ के प्रति डर पैदा किया। उन्हें अशिक्षित रखा। ताकि वे अपनी शरीयत और रूढ़िता से बाहर न आ सकें। मार्कण्डेय काटजू मुस्लिम युवाओं से अपने लेख में आह्वान करते हैं कि वे पिछड़ी प्रथाओं का समर्थन न करें। ऐसे सभी प्रतिक्रियावादी प्रथाओं का विरोध करें, जो उनके विकास में रोड़ा बनी हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के अपने नारे में अब ‘सबका विश्वास’ को भी जोड़ लिया है। पहली कैबिनेट मीटिंग में इसकी झलक भी मिली। वर्तमान मोदी सरकार ने मदरसों को आधुनिक बनाने सहित मुसलमानों के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए कई बड़े फैसले लिए हैं। तीन तलाक पर कानून बनाने के लिए मोदी सरकार पहले से ही प्रयासरत है। काटजू भी अपने लेख में यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि मुस्लिमों के पास यही सबसे सही समय है, जब वे अपने पिछड़ेपन को दूर करने के लिए क्रांतिकारी कदम उठा सकते हैं। वे लिखते हैं, ‘‘इसके लिए उन्हें तीन बड़े कदम उठाने होंगे। पहला, शरिया कानून में बदलाव। जैसे-जैसे समाज बदलता है, कानून भी बदलना चाहिए। 21 वीं सदी में एक मध्यकालीन कानून कैसे लागू हो सकता है? शरिया को खत्म करने का मतलब इस्लाम को खत्म करना नहीं होगा।

पुराने गैर वैधानिक हिंदू कानून में भी कई बदलाव किए गए। मसलन, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 द्वारा बदलाव कर दिया गया था। इस बदलाव से हिंदू धर्म समाप्त नहीं हुआ।’’ दूसरा, काटजू बुर्का को खत्म करने की बात करते हैं। वे लिखते हैं, ‘‘इससे महिलाओं की स्वतंत्रता बाधित होता है। इसके लिए कोई विकल्प नहीं होना चाहिए क्योंकि यह एक ‘नकारात्मक’ स्वतंत्रता का गठन करता है। यूरोप की तरह ही बुर्का पहनने वाली महिलाओं पर भारी जुमार्ना लगाया जाना चाहिए। तीसरा, आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खत्म करना।’’ काटजू लिखते हैं, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 1973 में इंदिरा गांधी के समय गठित एक गैर-सांविधिक निकाय है। इसका गठन मुस्लिम वोट बैंक के लिए किया गया। इसमें प्रतिक्रियावादी मौलवी और अन्य लोग शामिल हैं। इनका उद्देश्य पुराने सामंती प्रतिक्रियावादी शरिया कानून की रक्षा करना और जारी रखना है, जो वास्तव में मुसलमानों को परेशान करता है। बोर्ड ने प्रगतिशील और मानवतावादी शाहबानो निर्णय (1985) का कड़ा विरोध किया। इस कारण राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को रद्द कर दिया। अब यह अधिकांश बुद्धिजीवी मान रहे हैं कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ के साथ ‘सबका विश्वास’जीतने के लिए मोदी सरकार जरूर सक्रिय होगी।


 
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