यथावत

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वे कुछ कह गए हैं..

12/09/2019

वे कुछ कह गए हैं..

रुण जेटली के सफल और सार्थक जीवन का संदेश क्या है? वह सुनने में अत्यंत सरल है। लेकिन उसमें जीवन जीने की कला है। ऐसा मंत्र है जो अरुण जेटली को जानने-समझने और उनसे प्रेरणा लेने में हमेशा सहायक होगा। वह इन थोड़े से शब्दों में समाया हुआ है- अपना कार्य समझ लें और उसे पूरे कर्म कौशल से निभाएं। यही वह मंत्र है जो अरुण जेटली दे गए हैं। यह है अत्यंत प्राचीन। भारत की मिट्टी में पला बसा, संस्कारों में रक्त संचार की तरह अदृश्य। लेकिन हर क्षण उसका अनुभव हर कोई करता है। जहां यह सच है, वहीं एक बड़ी विडंबना भी है कि विरले ही होते हैं, जो इस पुराने मंत्र को अपने जीवन में उतार पाते हैं। अरुण जेटली अपने समय में सबसे ऊपर थे। यह सोचकर ही मन विह्वल हो जाता है कि वे शरीर से नहीं रहे। अशरीरी हो गए। उस अवस्था में जाने से तीन दिन पहले उन्होंने एक लेख लिखा। वह संभवत: उनका अंतिम लेख है।

राजनीति की गहमागहमी में व्यस्त रहते हुए भी वे समय-समय पर बोलकर-लिखकर बहस की दिशा को बदल देने में माहिर थे। इसका लोहा सभी मानते हैं, मित्र, सहयोगी, विरोधी और आलोचक भी। इसे हर कोई अनुभव करता था। उनके व्यक्तित्व की यह केंद्रीय विशेषता थी। बौद्धिक पराक्रम की ऐसी धुरी पर उनका व्यक्तित्व हमेशा आकाश में चमकता रहेगा।बात 6 अगस्त की है। संसद से ‘संविधान (जम्मू-कश्मीर में लागू) आदेश, 2019’ स्वीकृत हो चुका था। वे अस्वस्थ थे, फिर भी बहस सुनी। लेख लिखने बैठे। एक तथ्य की पुष्टि आवश्यक थी। मंत्री जितेंद्र सिंह को बुलाया। उसके बाद जो लेख उन्होंने लिखा, वह जम्मू-कश्मीर पर हो रही बहस को नया आयाम देता है। बहस के सागर में यह एक दीप स्तंभ है। लेख का शीर्र्षक है- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की असंभव उपलब्धि। इसमें उन्होंने लिखा कि भारतीय जनता पार्टी ने अनुच्छेद 370 को शुुरू से मुद्दा बनाया। जिसे हटाना असंभव समझा जाता था। इसलिए लोग इसे महज एक काल्पनिक नारा समझते थे। लेकिन भाजपा सरकार की कश्मीर नीति ने उसे जैसे ही संभव बनाया, वैसे ही जनमत के प्रबल प्रवाह में विपक्ष का विरोध विलीन हो गया। उनके लेख में चार उप शीर्षक हैं।

एक, विफल प्रयासों का इतिहास। दो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कश्मीर नीति। तीन, अनुच्छेद 370 और 35ए का कश्मीर के नागरिकों पर दुष्परिणाम। चार, राज्य की दो पार्टियों की भूमिका। विफल प्रयासों के इतिहास का वर्णन करते हुए उन्होंने एक अफसर अब्दुल खालिक का उल्लेख किया है। वे श्रीनगर और डोडा के जिला अधिकारी थे। इस नाते चुनाव अधिकारी भी रहते थे। वे 1957, 1962 और 1967 के चुनावों में सिर्फ कांग्रेस के उम्मीदवार का ही नामांकन स्वीकार करते थे। दूसरे का रद्द कर देते थे। अपनी शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद अरुण जेटली की याददाश्त रंच मात्र भी क्षीण नहीं हुई थी। उन्हें उस अफसर का नाम याद था। पर यह जरूरी समझा कि जितेंद्र सिंह को बुलाकर पूछ लें। इससे हम समझ सकते हैं कि तथ्य की प्रामाणिकता के बारे में वे कितना सतर्क रहते थे। निगम बोध घाट पर उमड़-घुमड़ कर बरसते बादलों को चीरते हुए जब अरुण जेटली ऊंची लपटों पर सवार होकर आकाश की ओर बढ़ रहे थे, तभी राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश मेरे पास आए। बातों ही बातों में उन्होंने याद किया कि अरुण जेटली की याददाश्त बेमिसाल थी। विलक्षण थी। उन्होंने उसके अनेक उदाहरण दिए।

अरुण जेटली जो मंत्र दे गए हैं, यह अत्यंत प्राचीन है। भारत की मिट्टी में पला बसा, संस्कारों में रक्त संचार की तरह अदृश्य। लेकिन हर क्षण उसका अनुभव हर कोई करता है। जहां यह सच है, वहीं एक बड़ी विडंबना भी है कि विरले ही होते हैं,जो इस पुराने मंत्र को अपने जीवन में उतार पाते हैं।

अरुण जेटली की अप्रतिम प्रतिभा का यह पक्ष उन्हें सबसे भिन्न और श्रेष्ठ सांसद बना देता था। 2010 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान भी मिला। लेकिन इस कारण नहीं, बल्कि उनसे प्रभावित होकर उन्हें सुनने के लिए हर काम छोड़कर हरिवंश पिछले पांच सालों से संसद में जहां भी होते थे, वहां से राज्यसभा में भागते हुए आ जाते थे। उनका अनुभव है कि अरुण जेटली संसदीय प्रक्रियाओं और संदर्भों के चलते-फिरते विश्वकोश थे। इस कारण भी विपक्ष के कानूनची दिग्गजों पर अकेले बहुत भारी पड़ते थे। मैं समझता हूं, आज भाजपा बुद्धि से गरीब हो गई है। कश्मीर पर लिखा उनका लेख इतिहास का वह शिलालेख माना जाएगा जो अमिट और अमर होगा। ऐसा लेख उनका कोई पहला नहीं है। ऐसे अनेक लेख गिनाए जा सकते हैं। पक्के तौर पर यह तो नहीं कह सकते कि जिसका उल्लेख करने जा रहा हूं, यह उनका पहला लेख है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पत्रिका ‘राष्ट्रीय छात्र शक्ति’ में उन्होंने 1979 में लिखा – ‘संघ पर प्रतिबंध क्यों?’ जनता पार्टी के दो नेता मधु लिमए और राजनारायण ने अभियान छेड़ा था। वे मांग कर रहे थे कि प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाएं। उससे संबंध रखने वाले मंत्रियों को निकालें। इस पर अरुण जेटली ने अपने लेख में सवाल उठाया कि ‘क्या लोकतंत्र में किसी राष्ट्रवादी संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग में कोई नैतिकता है?’ इसका ही विश्लेषण उनके लेख में है। जिसे पढ़ते हुए संविधान संबंधी उनकी गहरी समझ से पाठक परिचित होता है। उनका कायल बन जाता है। राष्ट्रीय राजनीति में अपनी महती भूमिका के लिए अरुण जेटली जिन बड़े कार्यों के आधार पर याद किए जाएंगे, उसकी शुरुआत उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में की। दिल्ली विश्व विद्यालय छात्र संघ की छवि उन्होंने चमका दी। पहले वह धूमिल थी। सच कहें तो कलंकित थी। सत्ता की चेरी के रूप में छात्र जगत में जानी जाती थी।

अरुण जेटली ने उसे व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में हरावल दस्ता बना दिया। वे दिन थे, जेपी आंदोलन के। जिसमें संपूर्ण क्रांति और समग्र क्रांति के सपने पल रहे थे। कोई छात्र नेता जो बरायनाम भी होगा, वह कैसे इस सपने से अपने को दूर रख सकेगा! अरुण जेटली तो निर्वाचित नेता थे। जिस छात्र नेता ने छात्र राजनीति को राष्ट्रीय महिमा और गरिमा दी, उसके बारे में भ्रमवश या ईर्ष्यावश अक्सर कहा जाता है कि वे लोकसभा का चुनाव एक बार भी जीत नहीं सके। यह कथन राजनीतिक नासमझी का है। इसकी कहानी कुछ दूसरी है। उसे बताने का यह उचित समय नहीं है। फिर कभी बताना उचित होगा। सच यह है कि वे लोकसभा का चुनाव जीतने में समर्थ थे। लेकिन वे इस बारे में स्पष्ट थे कि उनकी राजनीति में जगह कहां है, इसलिए उन्हें अवसरों से वंचित किया गया। अरुण जेटली वीर पुरुष थे।

ईमानदार ही वीरता का वरण करता है। इसका सबसे सटीक उदाहरण 26 जून, 1975 का है। लोकतंत्र का गला घोटा गया। तानाशाही थोपी गई। पूरे देश में गहरे अंधकार का सन्नाटा छा गया। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही उस अभिशाप को मिटा देने का पहला पराक्रम आप जानते हैं, किसने किया? वे अरुण जेटली थे। इसका उल्लेख कई पुस्तकों में है। लेकिन उस पराक्रम को वे उल्लेख समझाते कम हैं, पाठक को भ्रमित ज्यादा करते हैं। वे बताते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में मात्र दो सौ छात्र ही विरोध में उतरे, जिसका नेतृत्व अरुण जेटली कर रहे थे। जिसने इमरजेंसी को झेला है, देखा है और मन की पीड़ा से उपजी बगावत मोल ली है, वे ही जान सकते हैं कि इमरजेंसी के पहले दिन इतने छात्रों का विरोध वह भारत की पहली घटना थी। वे दो सौ छात्र पूरी छात्र शक्ति के प्रतिनिधि थे। संख्या पर नहीं, उनके साहस को याद किया जाना चाहिए। साहस तो वास्तव में संपन्न माता-पिता की संतान अरुण जेटली ने दिखाया था। उसकी सजा काटी। इमरजेंसी भर जेल में रहे।

एक मई, 1977 को नानाजी देशमुख की सलाह पर जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने अरूण जेटली को युवा जनता का राष्ट्रीय संयोजक बनाया। किसी भी छात्र नेता के लिए वह आत्म गौरव का क्षण होगा। जिसे अरुण जेटली ने विद्यार्थी परिषद के नेतृत्व की सलाह पर अस्वीकार किया। प्रश्न सैद्धांतिक जो था। वह अरुण जेटली का त्याग भी था। वैसा ही त्याग उन्होंने 2019 में किया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा कि मेरा यह शरीर मंत्री पद का बोझ उठा नहीं सकेगा। इतनी ईमानदारी और मोह से मुक्ति का क्या दूसरा उदाहरण मिलेगा? उलट उदाहरण तो अनेक हैं। एक अनकही कहानी कहना जरूरी है। 1987 का साल राजनीतिक संकट का जितना राजीव गांधी के लिए था, उससे अधिक वह बड़े संवैधानिक संकट की छाया में था। एक दिन अरुण जेटली ने मुझे एक दस्तावेज दिया। उसे वकील राम जेठमलानी ने बनाया था, जो राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के लिए था। जिसके आधार पर वे प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बर्खास्त करने का इरादा बना चुके थे। वह दस्तावेज 29 मार्च, 1987 को नवभारत टाइम्स में छपा। जो उस समय की बड़ी संवैधानिक दुघर्टना को टालने में सहायक हुआ। इसी विचार से अरुण जेटली ने उसे दिया भी था।

बहुत बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने स्वीकार किया कि ज्ञानी जैल सिंह ‘प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बर्खास्त करने का संवैधानिक आधार’ खोज रहे थे। वह घातक कदम होता। जिसे अरुण जेटली की सूझबूझ से रोका जा सका। उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह को उस साजिश में न पड़ने की सलाह दी थी। जिसे उन्होंने माना भी। ऐसी अनेक घातक राजनीतिक घटनाओं को अरुण जेटली ने कब-कब रोका और कैसे राजनीति की धारा को बदल दिया, इस पर भविष्य में अनेक शोध होंगे। भारतीय जनता पार्टी के लिए ऐसा ही एक संक्रमणकालीन दौर 2013 में था। नेतृत्व के प्रश्न को जिस राजनेता ने चुपचाप हल करवाया वे कोई दूसरे नहीं, अरुण जेटली ही थे। उसकी कुछ बातें प्रसंगवश मुझे मालूम है। उन बातों के बारे में लिखने का फिर कभी समय जरूर आएगा। −बादलों को चीरते हुए जब अरुण जेटली ऊंची लपटों पर सवार होकर आकाश की ओर बढ़ रहे थे, तभी राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश मेरे पास आए। बातों ही बातों में उन्होंने याद किया कि अरुण जेटली की याददाश्त बेमिसाल थी। विलक्षण थी। उन्होंने उसके अनेक उदाहरण दिए।

अरुण जेटली की अप्रतिम प्रतिभा का यह पक्ष उन्हें सबसे भिन्न और श्रेष्ठ सांसद बना देता था। 2010 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान भी मिला। लेकिन इस कारण नहीं, बल्कि उनसे प्रभावित होकर उन्हें सुनने के लिए हर काम छोड़कर हरिवंश पिछले पांच सालों से संसद में जहां भी होते थे, वहां से राज्यसभा में भागते हुए आ जाते थे। उनका अनुभव है कि अरुण जेटली संसदीय प्रक्रियाओं और संदर्भों के चलते-फिरते विश्वकोश थे। इस कारण भी विपक्ष के कानूनची दिग्गजों पर अकेले बहुत भारी पड़ते थे। मैं समझता हूं, आज भाजपा बुद्धि से गरीब हो गई है। कश्मीर पर लिखा उनका लेख इतिहास का वह शिलालेख माना जाएगा जो अमिट और अमर होगा। ऐसा लेख उनका कोई पहला नहीं है। ऐसे अनेक लेख गिनाए जा सकते हैं। पक्के तौर पर यह तो नहीं कह सकते कि जिसका उल्लेख करने जा रहा हूं, यह उनका पहला लेख है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पत्रिका ‘राष्ट्रीय छात्र शक्ति’ में उन्होंने 1979 में लिखा – ‘संघ पर प्रतिबंध क्यों?’ जनता पार्टी के दो नेता मधु लिमए और राजनारायण ने अभियान छेड़ा था। वे मांग कर रहे थे कि प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाएं। उससे संबंध रखने वाले मंत्रियों को निकालें। इस पर अरुण जेटली ने अपने लेख में सवाल उठाया कि ‘क्या लोकतंत्र में किसी राष्ट्रवादी संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग में कोई नैतिकता है?’ इसका ही विश्लेषण उनके लेख में है। जिसे पढ़ते हुए संविधान संबंधी उनकी गहरी समझ से पाठक परिचित होता है। उनका कायल बन जाता है।

राष्ट्रीय राजनीति में अपनी महती भूमिका के लिए अरुण जेटली जिन बड़े कार्यों के आधार पर याद किए जाएंगे, उसकी शुरुआत उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में की। दिल्ली विश्व विद्यालय छात्र संघ की छवि उन्होंने चमका दी। पहले वह धूमिल थी। सच कहें तो कलंकित थी। सत्ता की चेरी के रूप में छात्र जगत में जानी जाती थी। अरुण जेटली ने उसे व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में हरावल दस्ता बना दिया। वे दिन थे, जेपी आंदोलन के। जिसमें संपूर्ण क्रांति और समग्र क्रांति के सपने पल रहे थे। कोई छात्र नेता जो बरायनाम भी होगा, वह कैसे इस सपने से अपने को दूर रख सकेगा! अरुण जेटली तो निर्वाचित नेता थे। जिस छात्र नेता ने छात्र राजनीति को राष्ट्रीय महिमा और गरिमा दी, उसके बारे में भ्रमवश या ईर्ष्यावश अक्सर कहा जाता है कि वे लोकसभा का चुनाव एक बार भी जीत नहीं सके। यह कथन राजनीतिक नासमझी का है। इसकी कहानी कुछ दूसरी है। उसे बताने का यह उचित समय नहीं है। फिर कभी बताना उचित होगा। सच यह है कि वे लोकसभा का चुनाव जीतने में समर्थ थे। लेकिन वे इस बारे में स्पष्ट थे कि उनकी राजनीति में जगह कहां है, इसलिए उन्हें अवसरों से वंचित किया गया। अरुण जेटली वीर पुरुष थे।

ईमानदार ही वीरता का वरण करता है। इसका सबसे सटीक उदाहरण 26 जून, 1975 का है। लोकतंत्र का गला घोटा गया। तानाशाही थोपी गई। पूरे देश में गहरे अंधकार का सन्नाटा छा गया। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही उस अभिशाप को मिटा देने का पहला पराक्रम आप जानते हैं, किसने किया? वे अरुण जेटली थे। इसका उल्लेख कई पुस्तकों में है। लेकिन उस पराक्रम को वे उल्लेख समझाते कम हैं, पाठक को भ्रमित ज्यादा करते हैं। वे बताते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में मात्र दो सौ छात्र ही विरोध में उतरे, जिसका नेतृत्व अरुण जेटली कर रहे थे। जिसने इमरजेंसी को झेला है, देखा है और मन की पीड़ा से उपजी बगावत मोल ली है, वे ही जान सकते हैं कि इमरजेंसी के पहले दिन इतने छात्रों का विरोध वह भारत की पहली घटना थी। वे दो सौ छात्र पूरी छात्र शक्ति के प्रतिनिधि थे। संख्या पर नहीं, उनके साहस को याद किया जाना चाहिए। साहस तो वास्तव में संपन्न माता-पिता की संतान अरुण जेटली ने दिखाया था। उसकी सजा काटी। इमरजेंसी भर जेल में रहे। एक मई, 1977 को नानाजी देशमुख की सलाह पर जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने अरूण जेटली को युवा जनता का राष्ट्रीय संयोजक बनाया।

किसी भी छात्र नेता के लिए वह आत्म गौरव का क्षण होगा। जिसे अरुण जेटली ने विद्यार्थी परिषद के नेतृत्व की सलाह पर अस्वीकार किया। प्रश्न सैद्धांतिक जो था। वह अरुण जेटली का त्याग भी था। वैसा ही त्याग उन्होंने 2019 में किया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा कि मेरा यह शरीर मंत्री पद का बोझ उठा नहीं सकेगा। इतनी ईमानदारी और मोह से मुक्ति का क्या दूसरा उदाहरण मिलेगा? उलट उदाहरण तो अनेक हैं। एक अनकही कहानी कहना जरूरी है। 1987 का साल राजनीतिक संकट का जितना राजीव गांधी के लिए था, उससे अधिक वह बड़े संवैधानिक संकट की छाया में था। एक दिन अरुण जेटली ने मुझे एक दस्तावेज दिया। उसे वकील राम जेठमलानी ने बनाया था, जो राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के लिए था। जिसके आधार पर वे प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बर्खास्त करने का इरादा बना चुके थे। वह दस्तावेज 29 मार्च, 1987 को नवभारत टाइम्स में छपा। जो उस समय की बड़ी संवैधानिक दुघर्टना को टालने में सहायक हुआ। इसी विचार से अरुण जेटली ने उसे दिया भी था। बहुत बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने स्वीकार किया कि ज्ञानी जैल सिंह ‘प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बर्खास्त करने का संवैधानिक आधार’ खोज रहे थे।

वह घातक कदम होता। जिसे अरुण जेटली की सूझबूझ से रोका जा सका। उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह को उस साजिश में न पड़ने की सलाह दी थी। जिसे उन्होंने माना भी। ऐसी अनेक घातक राजनीतिक घटनाओं को अरुण जेटली ने कब-कब रोका और कैसे राजनीति की धारा को बदल दिया, इस पर भविष्य में अनेक शोध होंगे। भारतीय जनता पार्टी के लिए ऐसा ही एक संक्रमणकालीन दौर 2013 में था। नेतृत्व के प्रश्न को जिस राजनेता ने चुपचाप हल करवाया वे कोई दूसरे नहीं, अरुण जेटली ही थे। उसकी कुछ बातें प्रसंगवश मुझे मालूम है। उन बातों के बारे में लिखने का फिर कभी समय जरूर आएगा।



 
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