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कोरोना की त्रासदी व भारतीय संस्कृति की मूल भावना

22/03/2020

अर्जुन शर्मा

कोरोना के विश्वव्यापी खतरे और उसके असर से पूरी दुनिया सकते में है। खतरा इतना भयावह है कि मानव अस्तित्व पर बन आया है। इस हालात से निपटने में भारत सरकार व देश की समस्त राज्य सरकारें अपने-अपने तौर पर लोगों को बचाने में प्रयत्नशील हैं। हम भारतीयों की अंतिम आशा भगवान ही होते हैं। पर मंदिरों, गुरुद्वारों व अन्य धर्मस्थलों पर ताले लग गए हैं। जैसे भगवान भी कह रहे हों कि तुम लोगों ने मेरी बनाई दुनिया का क्या हाल कर दिया।

पावन गुरबाणी में एक मूल मंत्र है जो इस मौके पर बहुत प्रासंगिक है। पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत्त। यानि पवन का दर्जा गुरु समान है, पानी का दर्जा पिता जैसा है व धरती मां समान है। क्या हम इन तीन महत्वपूर्ण कारकों के प्रति सचमुच संवेदनशील हैं? क्या हम वायु यानि पवन को साफ रखने में जिम्मेवारी का निर्वाह करते हैं? क्या पानी को स्वच्छ रखने की सोच हमारे भीतर है? क्या धरती की कोख को केमिकल युक्त कीटनाशकों व विषैली खादों इत्यादि से जहरीला नहीं बना रहे? यदि ऐसा है तो कौन हमें बचाएगा, जब हम पालनहारों को ही कलंकित करने पर तुल जाएंगे ! यह वो मूल सवाल है जो आज इस त्रासदी के मौके पर हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है। वैसे इसबार करोना वायरस के फैलाव की रोकथाम में जुटे विश्व को भारतीय परंपराओं को मान्यता देनी पड़ रही है, जिनका वे मजाक उड़ाते रहे हैं।

1. हाथ जोड़कर नमस्कार

विश्व के विकसित देशों के लोगों में आपसी अभिवादन का तरीका हाथ मिलाकर चूमने वाली है। पर अब वो बात नहीं रही। भारतीय संस्कृति में हाथ जोड़कर नमस्कार करने वाली जिस परंपरा को वे फूहड़ मानते रहे हैं, आज सारी दुनिया उसी का प्रचार कर रही है। मानो इस परंपरा का आरंभ करने वाले भारतीयों ने सदियों पहले इस प्रकार की महामारी से बचे रहने का वैज्ञानिक ढंग खोज निकाला था।

2. अंतिम क्रिया में भी भारतीयता का संदेश

चीन, जापान,अमेरिका, इंग्लैड, इटली इत्यादि देशों में शवों को दफन करने की परंपरा है, जबकि भारत में उसे जलाने की। खासतौर पर हिंदू-सिख संस्कृति में। करोना जैसी महामारी के बाद इन देशों को सूझा है कि मृतक को जलाकर ही उसके शरीर पर हुए खतरनाक वायरस के हमले को आगे फैलने से रोका जा सकता है। उन्हें आज समझ आ रही है, यहां सदियों से ऐसा होता चला आ रहा है। ये सोचने वाली बात नहीं कि खुद को विज्ञान के पंडित मानने वाले विकसित देशों को इतने छोटे-से वैज्ञानिक तथ्य की भी जानकारी नहीं थी। पर आज हमारी परंपराओं के पीछे के विज्ञान की उन्हें जानकारी हो रही है।

3. जीव भक्षी बनाम जीव प्रेमी

करोना जिन मुल्कों में ज्यादा तेजी से फैला उनके खानपान का जायजा लें तो पता चलेगा कि ऐसे सभी मुल्क सी-फूड के शौकीनों के हैं। इसके साथ ही वहां चूहों, सांपों, कुत्तों, छिपकलियों, कॉकरोचों का क्या कहें कितने जीवों को वे कच्चे ही खा जाते हैं, जिनकी फेहरिस्त बहुत लंबी है। हमारे यहां देखिए, चूहों की भी पूजा होती है। पंडित उपाय बताते हैं कि मछली को आटे का पेड़ा डालो, कीड़ों के स्थान पर त्रिचौली डालो। गाय की सेवा करो। ये जीवों पर रहम करने की मानसिकता को बढ़ावा देने वाली संस्कृति का प्रतीक है। उनके यहां जीवों की क्या स्थिति है? मछली को आधा काटकर तड़पते छोड़कर आधी कच्ची ही खा जाते हैं। कुत्ते पर खौलता पानी डालकर उसकी तड़प का मजा लेते हैं, फिर उसे जीते जी काटकर कच्चा ही चबाने लगते हैं। कहते हैं कि कुदरत (प्रकृति) ने एक घास का तिनका भी किसी तर्क अथवा इस्तेमाल के बिना नहीं बनाया। उसके बनाए जीवों पर अत्याचार, ये कैसी मानवीय संवेदना है। ऐसी स्थिति में निश्चय ही करोना वायरस पर नियंत्रण भी होगा व भारत इस विपदा की घड़ी से बाहर भी निकलेगा पर शायद हमें घासफूस खाने वाला होने का ताना देने वालों को अपनी जीवन शैली भारतीय संस्कृति से रौशनी लेकर उसपर फिर से विचार करना होगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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