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स्वायत्तता पर चीन की कुदृष्टि

06/08/2019

स्वायत्तता पर चीन की कुदृष्टि


विश्व की खूबसूरत जगहों में से एक और बड़ा कारोबारी हब हांगकांग इन दिनों एक अलग कारण से चर्चा में है। पिछले दिनों वहां हिंसक प्रदर्शन बढ़ गये। प्रदर्शनकारियों ने वहां के शानदार प्रतिनिधि भवन को काफी क्षति पहुंचाई। इस विधायी भवन की शीशे की दीवारों को भारी ट्राली की टक्कर से तोड़ दिया गया। भवन के अंदर तक प्रदर्शनकारी घुस आये। यह वही भवन है, जहां कुछ दिन पहले अंदर बैठे प्रतिनिधि एक अवसर पर चीनी गणतंत्र का राष्ट्रीय ध्वज लहराया जाता देख रहे थे। अब कुछ ही दिन में हालात बदले हुए हैं। उपद्रवी प्रदर्शन के दिन तो अंदर बैठे लोग बाहर हिंसा की झलक से रू-ब-रू हो रहे थे। पुलिस की तमाम कोशिशें नाकाम हो रही थीं। लोग दौड़ाकर पीटे जा रहे थे। ऊपर हवा में उड़ते चीनी हेलीकॉप्टर इस बात का संकेत कर रहे थे कि जरूरत पड़ने पर और अधिक सख्त कदम उठाये जा सकते हैं। आखिर क्यों हो रहा है यह सब? हांगकांग में इस हलचल से चीन सरकार क्यों चिंतित है? क्यों वह हर हाल में हांगकांग के लोगों को अपनी बात मनवाने की पुरजोर कोशिश में लगी है? इन सवालों के जवाब बहुत कुछ हांगकांग की ऐतिहासिक सच्चाई में छिपे हुए हैं। दरअसलए हांगकांग अभी तक एक स्वायत्त क्षेत्र है। ब्रिटेन ने साल 1997 में स्वायत्तता की शर्त के साथ चीन को हांगकांग की बागडोर सौंपी थी। तब ‘एक देश-दो व्यवस्था’की अवधारणा बनी।

1997 में जब इंग्लैंड ने चीन को हांगकांग वापस सौंपा तो कुछ शर्तें तय हुर्इं। इनके मुताबिक रक्षा और विदेश छोड़कर सभी मामले हांगकांग खुद तय किया करेगा। समझौता 50 साल का हुआ, पर तभी शक जताया गया था कि चीन इतने लंबे समय तक शांत नहीं रह सकता।

हांगकांग को 50 साल के लिए अपनी स्वतंत्रता, सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था बनाने की गारंटी मिली । हांगकांग की अपनी व्यापारिक विशिष्टता रही है। इस प्रकार चीन के मुख्य भाग में साम्यवाद और हांगकांग में पूंजीवाद के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं। यह चीन जैसे देश के लिए अजीब है। तब भी माना गया था कि चीन ने हांगकांग में हस्तक्षेप न करने की घोषणा जरूर कर दी लेकिन वह इस पर अमल नहीं करेगा। यही हो रहा है कि चीन धीरे-धीरे इस हिस्से में अपनी पकड़ मजबूत करने में लगा है। हांगकांग के लोग लोकतंत्रिक विकास,मानवअधिकार और मताधिकार के पक्ष में खड़े होते रहते हैं। स्वाभाविक है कि हांगकांग के आम नागरिक इन अधिकारों के चलते खुद को चीन का हिस्सा नहीं मानते हैं। हांकांग में चीन की आलोचना के बावजूद यह सच्चाई भी है कि यहां चीन की केंद्रीय सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव बढ़ा है। चीन की करीबी माने जाने वाली कमेटी ने ही 2017 में कैरी लैम को चीफ एक्जक्युटिव चुना। हांगकांग की प्रतिनिधि सभा में भी चीन समर्थक सांसदों का एक बड़ा गुट है। अब वही प्रतिनिधि सभा एक नया बिल लेकर आई है, जिसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं।

हांगकांग में हिंसक विरोध का कारण मौजूदा प्रत्यर्पण कानून में संशोधन है। संशोधन के मुताबिक अब हांगकांग में रह रहे अथवा भाग कर आये गंभीर आरोपितों को चीन के मुख्य हिस्से में प्रत्यारोपित किया जा सकेगा। फिलहाल कई देशों के साथ हांगकांग का ऐसा कोई समझौता नहीं है। ऐसे में कोई आरोपित अपराध के बाद हांगकांग आ जाय तो उसे मामले की सुनवाई के लिए सम्बंधित देश में प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता। चीन को भी ऐसे किसी संधि से बाहर रखा गया था। नया प्रस्तावित संशोधन ताइवान, मकाऊ और मेनलैंड चीन के साथ भी आरोपितों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति देगा। बिल के विरोधी चूंकि चीन और हांगकांग को अलग मानते हैं, इसलिए कहते हैं कि इससे हांगकांग की स्वायत्तता प्रभावित होगी। वे कहते हैं कि चीन में राजनीतिक विरोधियों पर आर्थिक अपराधों और गैर परिभाषित राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर खतरे हमेशा बने रहते हैं। इस बिल के मुताबिक हांगकांग में भी यह व्यवस्था लागू हो जायेगी। फिर एक बार आरोप लगा तो सम्बंधित व्यक्ति ऐसी कानूनी प्रक्रिया से होकर गुजरेगा, जहां अधिकांश मामले सजा पर ही समाप्त होते हैं। हांगकांग के बहुतेरे कानूनविद्, कारोबारी और मानव अधिकार कार्यकर्ता ईमानदार न्याय की वकालत करते हैं। दूसरी ओर हांगकांग की चीफ एक्जेक्यूटिव कैरी लैम ने लोगों को भरोसा दिया है कि मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने वाले मुद्दे नये कानून में शामिल हैं। हांगकांग के अंदर स्वायत्तता की वकालत करने वाले लोग महसूस करते हैं कि चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सत्ता में 2012 से ही हांगकांग पर दबाव बढ़ा है।

बहुत समृद्ध है हांगकांग
करीब 200 छोटे द्वीपों के समूह हांगकांग का शाब्दिक अर्थ सुंगधित बंदरगाह है। अफीम के व्यवसाय और लोगों को नशेड़ी बनाने के सवाल पर 1839 से 1842 तक चीन और इंग्लैंड के युद्ध के बाद चीन को हांगकांग इंग्लैंड को देना पड़ा था। साथ में चीन ने इंग्लैंड को मुआवजा भी चुकाया था। तब से हांगकांग इंग्लैंड का ही उपनिवेश था। वैसे दोनों देशों के बीच व्यापार के लिए इंग्लैंड ने इसे व्यावसायिक बंदरगाह बनाये रखा। बीच में 1941 से करीब चार वर्षों तक इस पर जापान का कब्जा रहा। फिर इंग्लैंड ने चीन के साथ मिलकर 1945 में वहां से जापान को खदेड़ा। इंग्लैंड के उपनिवेश होने के हालात में यहां लोकतंत्र खूब फला-फूला। हांगकांग की अपूनी मुद्रा दुनिया में नौवें स्थान पर हैए जो काफी मजबूत समझी जा सकती है। चीन को 1997 में जब यह वापस मिला तो इंग्लैंड ने कई शर्तें लगाईं। उसके मुताबिक रक्षा और विदेश मामले छोड़कर बहुत से मसलों पर हांगकांग को 50 साल तक स्वतंत्र रखना शामिल है।

वर्ष 2014 में लोकतंत्र समर्थकों ने ‘अंब्रेला मूवमेंट’ शुरू किया, तब भी नौ नेताओं को उपद्रव का दोषी पाया गया। इस बार के आंदोलन में भी पुलिस से जूझते प्रदर्शनकारी प्रतितिनिधि सभा के बाहर अपने हाथों में छाता लिए दिखाई दिए। वर्ष 2014 के आखिरी महीनों में हुए चुनाव में चीन की दखलंदाजी के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आये थे। तब 11 हμतों तक यह चलता रहा। अब हांगकांग की विधायी संस्था में चीन की पूर्व मंजूरी और आम लोगों के जरिए चुने गये दो तरह के प्रतिनिधि हैं। स्वाभाविक तौर पर लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये प्रतिनिधि लोकतंत्र और स्वायत्तता के पैरोकार हैं। परिणाम यह होता है कि सदन में विधायी गतिरोध होते रहते हैं। साल 2014 के बाद वर्ष 2015 में हांगकांग के कई किताब विक्रेताओं को नजरबंद किया गया था। उन पर आपत्तिजनक साहित्य बिक्री के आरोप लगे थे। अक्टूबर 2018 में चीन ने सबसे लंबा समुद्र मार्ग खोला जो चीन को हांगकांग और मकाउ से जोड़ता है। वर्तमान आंदोलन के शुरुआती दिनों,मई 2019 में हांगकांग से भागे दो कार्यकर्ताओं को जर्मनी ने अपने यहां शरण देने की पुष्टि की थी। हाल के वर्षों में ऐसा यह पहला मामला था। आम तौर पर पश्चिमी देश हांगकांग के मामले में इस तरह की राजनयिक कार्यवाही से दूरी ही बनाये हुए थे। पिछले साल यानी 2018 में मई के पहले सप्ताह में यह जरूर हुआ कि चीन ने अपने यहां आने वाली विदेशी एयरलाइन्स से कहा कि वे ताइवान और मकाऊ के साथ हांगकांग को देश कहना बंद करें।

चीन के विदेश मंत्रालय का तर्क था कि ताइवान, हांगकांग और मकाऊ जैसे हिस्से स्वशासित होने के बावजूद चीन के हिस्से हैं। ऐसे में चीन में काम करने वाले विदेशी उपक्रमों को चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए। चीन ने इस मामले में एयरलाइन्स को अपने कानून मानने की सलाह दी। तब अमेरिका ने इसे बकवास बताकर खारिज कर दिया। तब व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी हकाबी सैंडर्स ने चीन पर आरोप लगाया था कि वह अपनी सेंसरशिप अमेरिका सहित बाकी दुनिया में निर्यात करने की कोशिश में है। तब चीन ने 36 विदेशी एयलाइन्स से ऐसी मांग की थी। इनमें से चार अमेरिकी कंपनियां थीं। अपने जिन क्षेत्रों को चीन ने स्वायत्त माना है, अब उन्हीं में से एक हांगकांग में उसे प्रत्यर्पण कानून लाने की जरूरत पड़ी है। हिंसा के बीच हांगकांग प्रशासन थमता सा भले दिखे और प्रत्यर्पण कानून स्थगित भले हुआ हो, संकेत हैं कि वह इस पर अड़ा हुआ है। कैरी लेम को लगता है कि सदन में फिर से इस समस्या का समाधान निकल आयेगा। उधर, बिल विरोधी प्रदर्शनकारी लोगों से एकजुटता का अनुरोध कर रहे हैं। कैरी लैम की नजर में न्याय और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने के लिए यह कानून जरूरी हैं। उनकी नजर में ऐसा नहीं होने पर हांगकांग ‘भगोड़ों का स्वर्ग’ कहलाने लगेगा। उनके सामने वह घटना उदाहरण है, जब एक हांगकांग निवासी ने ताइवान यात्रा में अपनी गर्लफ्रेंड को मार दिया था। ऐसा कर वह वापस हांगकांग आ गया।

हांगकांग और ताइवान के बीच प्रत्यर्पण संधि नहीं होने की दशा में वह बच गया था। अलग बात है कि मनी लॉंिड्रग के मामले में वह हांगकांग की जेल में है। चीन सरकार एस तरह के अप्रत्यक्ष कानूनों पर भला कब भरोसा करती है। यही कारण है कि वह हांगकांग जैसे स्वायत्त क्षेत्र में भी केंद्रीय कानूनों पर जल्द से जल्द अमल चाहती है।



 
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