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घर-घर नल से पानी पहुंचाने की योजना

11/09/2019

डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्र
भाजपा ने गत लोकसभा चुनाव में अपने संकल्प पत्र में हर घर को पेयजल उपलब्ध कराने का वादा किया था। चुनाव में सफलता प्राप्त कर नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी की शुरुआत करते ही अपने कैबिनेट में जल संसाधन, नदी विकास, गंगा जीर्णोद्धार और पेयजल एवं स्वच्छता विभाग को मिलाकर जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया और उसको देश में व्याप्त जल समस्या को समाप्त करने तथा हर घर को नल से पानी उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य करने का निर्देश दिया। प्रधानमंत्री ने नीति आयोग की बैठक में हर घर को पेयजल उपलब्ध कराने के संदर्भ में रीति-नीति को व्यक्त कर उस पर अविलंब तथा द्रुतगामी कार्यवाही कर 2024 तक की समय सीमा निर्धारित कर दी है। प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तावित यह योजना उनकी अन्य प्रभावी सौभाग्य योजना, उज्ज्वला योजना तथा स्वच्छता अभियान जैसी महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी योजना है। सौभाग्य योजना के अंतर्गत मोदी सरकार ने देश के कोने-कोने में बिजली पहुंचाकर हर घर तक बिजली पहुंचाने का अपना लक्ष्य लगभग प्राप्त कर लिया है। इसी प्रकार उज्ज्वला योजना के अंतर्गत समाज के निम्नतम तबके तक गैस चूल्हा पहुंचा कर उज्ज्वला योजना को सार्थक किया है। स्वच्छता अभियान के द्वारा समाज में साफ-सफाई एवं स्वच्छता हेतु जागरूकता अभियान चलाते हुए अपने चारों ओर सफाई बनाए रखने हेतु आमजन को जागरूक किया गया, तो घर-घर शौचालयों की व्यवस्था कर खुले में शौच जाने की परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया है। अब उनकी हर घर को नल से पानी पहुंचाने की योजना है। सरकार की प्रतिबद्धता को देखते हुए उम्मीद है कि निर्धारित समयावधि में हर घर को नल से पानी प्राप्त हो जाएगा। हालांकि इस योजना के समक्ष राष्ट्र में जल का अभाव, निरंतर गिरता हुआ जल स्तर तथा जल संरक्षण का समुचित प्रबंधन न होना योजना को निश्चित समयावधि के अंतर्गत पूर्ण कर पाने के संदर्भ में प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। इसके लिए निरंतर जल संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में कार्य कर योजना को मूर्त रूप दिया जा सकता है। 
यह अलग तथ्य है कि अभी तक सिर्फ 65 फीसदी घरों में ही नल से पानी पहुंचाने का काम हो रहा है। वर्ष 2014 से 2018 के मध्य 6.7 फीसदी की वृद्धि से घरों में पानी के कनेक्शन के लिए नल लगाए गए। 2011 से 2014 के मध्य यह आंकड़ा 4 फीसदी था और 2001 से 2011 के बीच यह मात्र 0.6 फीसदी ही था। पानी के कनेक्शन लगाने और नल से पानी पहुंचाने की दिशा में गांव में वृद्धि का आंकड़ा शहरों से अधिक है। 2014 से 2018 के मध्य गांव में यह 28 फीसदी और शहरों में 22 फीसदी के करीब रहा। ग्रामीण इलाकों में अभी भी लगभग 60 फीसदी घर ऐसे हैं जहां पानी का कनेक्शन नहीं पहुंचा है। ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे जिले जो सबसे गरीब की श्रेणी में आते हैं वहां तक पानी का कनेक्शन अभी नाम मात्र की संख्या में ही पहुंचा है। उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार जैसे राज्य अब भी हैं जिनकी आधी जनसंख्या को अभी भी पानी की सप्लाई नहीं की जा रही है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु ऐसे राज्य हैं जहां 70 फीसदी से अधिक घरों में पानी के लिए नल लगाए जा चुके हैं। इन राज्यों के शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में नल का प्रयोग पानी के लिए किया जा रहा है।        
केंद्रीय जलशक्ति मंत्री के अनुसार हर घर जल की योजना को 2050 की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। देश में बारिश और अन्य संसाधनों से मिलने वाले जल का मात्र 5 फीसदी ही पेयजल के रूप में प्रयोग हो रहा है। आज सरकार की प्रमुख चुनौती कृषि के लिए आवश्यक जल उपलब्ध कराने की है। बड़ी मात्रा में जल कृषि और औद्योगिक इकाइयों में प्रयोग होता है। अनेक जल स्रोतों का जल प्रदूषित हो चुका है। 27544 जगहों पर आर्सेनिक और अन्य कारण से पानी की गुणवत्ता खराब है। सरकार उनमें से 11200 जल स्रोतों की गुणवत्ता सुधारने का कार्य अपने हाथ में ले चुकी है। इनमें से 4071 जल स्रोतों की गुणवत्ता सही हो चुकी है और करीब 5000 पर काम चल रहा है। केंद्र सरकार इस काम के लिए राज्यों की मदद कर रही है। पर्वतीय राज्यों में पेयजल को लेकर कई योजनाएं चल रही हैं। राज्यों को सूचित किया गया है कि जितनी तेजी से योजनाओं पर कार्य कर उन्हें पूर्ण करेंगे, केंद्र सरकार उन्हें उतनी अधिक आर्थिक मदद देगी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अभी इस दिशा में बहुत अधिक कार्य किया जाना लंबित है। गांव में पाइप लाइन के जरिए पानी पहुंचाने की वृद्धि दर 2013 -14  में 12 फीसदी थी जो 2017-18 में 17 फीसदी तक ही पहुंच पाई है। बिहार, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में इस दिशा में प्रभावी कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई है। देश में व्याप्त जल समस्या एवं पेयजल की उपलब्धता को सुनिश्चित करने हेतु जल संरक्षण और उसके सदुपयोग के लिए आमजन को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। सरकार द्वारा जलदूतों की नियुक्ति करने की भी योजना बनाई गई है। जो जनसामान्य के बीच पहुंचकर निरंतर गिर रहे जलस्तर को सामान्य बनाए रखने हेतु प्रयास करने, जल के हो रहे अपव्यय को बंद करने तथा आवश्यकता अनुसार कम से कम जल का प्रयोग करने के लिए समाज को जागृत करने का कार्य करेंगे। इस संदर्भ में जल स्रोतों का संरक्षण तथा भूगर्भ के जल स्तर में हो रही निरंतर गिरावट को दूर करना मुख्य कार्य है। इसके लिए मनरेगा योजना की मदद से नए-नए जल स्रोत तालाब आदि बनाकर तथा पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार कर उन पर जल संग्रह कर भूगर्भ के जल स्तर को बढ़ाना प्रमुख तथा आवश्यक कार्य होगा। किंतु, व्यवहार में भूगर्भ के जल स्तर को बढ़ाने के स्थान पर उसका निरंतर दोहन किया जा रहा है। सिंचाई के साथ-साथ औद्योगिक इकाइयों, फैक्ट्रियों आदि के लिए बोरिंग कर भूगर्भ से असीमित मात्रा में जल निकालकर उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। साथ ही भूगर्भ से निकाला गया जल औद्योगिक उत्पादन के पश्चात् प्रदूषित होकर भूगर्भ में ही चला जाता है या नालों के माध्यम से नदियों में पहुंचकर वहां के जल को भी प्रदूषित कर रहा है। जल की अनुपलब्धता के साथ -साथ उसका प्रदूषित होना पेयजल की समस्या का  प्रमुख कारण है। इसका समाधान किए बिना घर-घर तक जल पहुंचाने की योजना को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि भूगर्भ के जल के दोहन पर अंकुश लगाते हुए किसी भी प्रकार के ट्यूबवेल की स्थापना पर रोक लगाई जाए। बिना अनुमति प्राप्त किए बोरिंग कर भूगर्भ से जल निकालने को दंडात्मक कार्यवाही घोषित कर दी जाए। साथ ही जल संरक्षण की योजनाओं पर निरंतर निगरानी रखते हुए जल संरक्षण, संवर्धन तथा शोधन की दिशा में कार्य करने वाले सरकारी, गैर सरकारी लोगों तथा संस्थाओं को इस दिशा में कार्य हेतु प्रोत्साहित किया जाए। वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाया जाए। यदि ऐसा कर लिया गया तो निश्चित रूप से जलविहीन हो रही भारत भूमि पुनः जल से परिपूर्ण होगी। पानी की समस्या से जूझ रहे जनमानस को राहत मिलेगी और प्रत्येक घर को नल के माध्यम से पानी उपलब्ध कराया जाना संभव होगा। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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