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क्या मरणासन्न कांग्रेस को संजीवनी दे पाएंगी सोनिया?

12/08/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'
कांग्रेस की बागडोर एक बार फिर सोनिया गांधी के हाथ में है। 2019  के लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद से कांग्रेस सदमे में है। राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने की घोषणा कर पार्टी को निश्चेतना की स्थिति में ला दिया था। राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया था कि पार्टी अपना अध्यक्ष चुन ले। इस चुनाव प्रक्रिया में उनका परिवार शामिल नहीं होगा। लेकिन जिस तरह सोनिया गांधी को कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया है उससे यह साबित हो गया है कि कांग्रेस के पास गांधी परिवार के समक्ष शरणागत होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ‘इनके और न उनके ठौर’ वाली स्थिति है। 25 मई, 2019 को राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से कांग्रेस असहज हो गई थी। उसे भविष्य की राह दिखाई ही नहीं दे रही थी। महीनों की खींचतान के बाद भी कांग्रेस अपने लिए एक अदद अध्यक्ष की तलाश नहीं कर पाई। इसके पीछे गांधी परिवार के प्रति कांग्रेसियों की अंधनिष्ठा और चाटुकारिता ही बहुत हद तक जिम्मेदार है। इसमें संदेह नहीं कि सोनिया गांधी कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रह चुकी हैं। 14 मार्च 1998 को उन्होंने पहली बार कांग्रेस की कमान संभाली थी। 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या के बाद वे खुद तथा अपने बच्चों को राजनीति से दूर रखना चाहती थीं। लेकिन 7 साल बाद ही उनकी छठी इंद्री जागृत हो गई। उन्हें कांग्रेस संकटग्रस्त नजर आने लगी। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में जिस तरह राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित किया गया। यह जानते हुए भी कि जो शख्स कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में ही बहुत मान-मनौव्वल के साथ आया था, वह अध्यक्ष पद स्वीकार भी कैसे कर सकता है? जब तक राहुल ने दोबारा इनकार नहीं कर दिया तब तक चापलूस कांग्रेसियों का मुगालता टूटा नहीं। एक दांव हाथ से फिसलता देख कांग्रेसियों ने दूसरा पासा सोनिया गांधी के नाम का फेंका। उनसे आग्रह किया गया कि तब तक अंतरिम अध्यक्ष बनी रहें, जब तक कांग्रेस अपना नया अध्यक्ष न चुन ले। उन्होंने कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष बनना स्वीकार भी कर लिया। कुल मिलाकर कांग्रेस की अध्यक्षी सोनिया, राहुल और प्रियंका के बीच ही रही। 1998 में सीताराम केसरी की जगह लेने वाली सोनिया गांधी का पुत्र मोह अगर हावी न हुआ होता तो कदाचित कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती। सोनिया ने उन्हें उपाध्यक्ष से अध्यक्ष तक पहुंचने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लेकिन राहुल राजनीति का महल खड़ा करना तो दूर, उनके अभिलाषाओं की एक ईंट भी नहीं रख पाए। वे भाजपा विरोध के प्रतिमान तो बने लेकिन अपने निराधार आरोपों के चलते वे अपने पैरों के नीचे से सरकती जमीन को भी नहीं देख पाए। सोनिया गांधी अब 72 की हो गई हैं। उनका स्वास्थ्य भी खराब रहता है। ऐसे में वे 1998 जैसा चमत्कार कर पाएंगी, इसकी उम्मीद तो नहीं के बराबर है। उस समय कांग्रेस ने देश के कई प्रदेशों में सरकार बनाई थी लेकिन मौजूदा हालत उससे सर्वथा विपरीत है। अब मात्र चार राज्यों में ही कांग्रेस की सरकार बची है ऐसे में सोनिया हताश और निराश कांग्रेस का सहारा कैसे बन पाएंगी? तब कांग्रेस एकजुट थी लेकिन अब वह बात नहीं रही। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाए जाने के बाद जिस तरह कांग्रेस दो खेमों में बंटी नजर आई, उसका मतलब साफ है कि इस बार सोनिया गांधी की राह बहुत आसान नहीं है। कर्ण सिंह, अश्विनी कुमार, ज्योतिरादित्य सिंधिया और मिलिंद देवड़ा के विचार गुलाम नबी आजाद से अनुच्छेद 370 पर सर्वथा भिन्न नजर आए थे। अपने बीस माह के कार्यकाल में राहुल गांधी ने कांग्रेस को रसातल में पहुंचा दिया है। कांग्रेस में बदलाव तभी संभव है जब पूरी कांग्रेस में सब कुछ बदल दिया जाए। कांग्रेस को नरेन्द्र मोदी से बड़ी विकास की रेखा खींचनी होगी। यह देश विकास चाहता है। विपक्ष में रहकर भी कांग्रेस अपने क्षेत्र के विकास के लिए सरकार पर दबाव बना सकती है। काम करने का श्रेय अगर सरकार ले सकती है तो कांग्रेस काम के लिए अपेक्षित दबाव बनाने का श्रेय तो ले ही सकती है। वैसे राहुल गांधी को यह बात समझ में आ गई है कि जब तक कांग्रेस के पास गांधी-नेहरू परिवार की वैसाखी है, तब तक वह अपने पैर पर खड़ी नहीं हो सकती। कांग्रेस को अगर वाकई आत्मनिर्भर होना है। अपने पैरों पर खड़ा होना है, तो उसे भाजपा की कार्यशैली पर विचार करना होगा। उसे सोचना होगा कि भाजपा नेता स्वाभाविक रूप से पार्टी में उभरे, जबकि कांग्रेस परिवार से आगे बढ़ ही नहीं पाई। कांग्रेस ने अगर चुनाव नतीजों से भी सबक लिया होता तो भी वह दस जनपथ के व्यामोह से मुक्त हो गई होती। पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने कांग्रेस और देश दोनों को आगे बढ़ाने का काम किया। लेकिन कांग्रेस में उन्हें इसलिए याद नहीं किया जाता क्योंकि वे मन से गांधी परिवार का करीब नहीं थे। सत्ता संचालन में उन्होंने स्वविवेक का इस्तेमाल किया। जिस तरह कांग्रेस में भगदड़ मची है, ऐसे में सोनिया गांधी उसे फिर संजीवनी दे पाएंगी, ऐसा लगता नहीं है। गांधी परिवार के कुछ भक्तों को लगता है कि सोनिया गांधी की उपस्थिति भर से सब कुछ ठीक हो जाएगा। भाजपा के कथित झूठ और ठगी के शासन से निजात मिल जाएगी। तो उन्हें इस बात का भी विचार करना होगा कि कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होता। कांग्रेस को आगे बढ़ना है तो उसे भाजपा की राह पर चलना होगा। अपने मन की बात कहनी होगी। लेकिन इससे पहले सबकी बात सुननी होगी। लोकतंत्र का तकाजा भी यही है कि सबको सुना जाए और युक्त ढंग से विचार कर उस पर अमल किया जाए। अब भी समय है जब कांग्रेस को बिना किसी हिचक के अपना नेता चुन लेना चाहिए। यह अवसर अगर उसने खो दिया तो उसके पास सिर्फ यादों के अवशेष ही बचेंगे।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
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