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मप्र में थम नहीं रही कांग्रेस की अंतर्कलह

06/09/2019

डॉ. अजय खेमरिया
मप्र के वनमंत्री उमंग सिंघार के बोल प्रदेश की सियासत में कांग्रेस की गुटीय विरासत और कबीलाई संस्कृति का पीढ़ीगत हस्तांतरण है। उमंग का परिचय स्व. जमुना देवी के भतीजे के रूप में भी है। वही जमुना देवी जो मप्र में बुआजी के नाम से आदिवासी और महिला अस्मिता की बेख़ौफ़ नजीर रही हैं। जमुना देवी के बेबाक बोल से मुख्यमंत्री रहते दिग्गी राजा पूरे समय सहमे से रहते थे लेकिन उनकी जातीय पूंजी और कांग्रेस के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता को दिग्विजय ने सदैव सम्मान दिया। जमुना देवी ने भी दिग्विजय सिंह के साथ अपने मतभेदों को अनुशासनहीनता की सीमा तक नहीं जाने दिया लेकिन उनके भतीजे उमंग सिंघार ने शायद पीढ़ीगत विरासत से राजनीतिक मर्यादाओं को पूरी तरह से तिरोहित कर दिया है। उन्होंने जिस भाषा और तरीके को दिग्विजय सिंह के विरुद्ध चुना, वह एक कैबिनेट मिनिस्टर की गरिमा के साथ न्याय नहीं करता।
उमंग सिंघार धार जिले की उसी कुक्षी सीट से जीतकर आते हैं, जहां से जमुना देवी जीतती रही हैं। धार, झाबुआ, रतलाम, बड़वानी, खँडवा, खरगौन का आदिवासी इलाका असल में जमुना देवी के जमीनी वर्चस्व और दिग्विजय सिंह के समर्थन से खड़े कांतिलाल भूरिया, हनी बघेल जैसे नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा का मैदान भी है। दिग्विजय सिंह ने इस पूरे वनवासी बेल्ट में जमुना देवी के विरोधियों को आगे बढ़ाया और राजनीतिक रूप से उन्हें ताकत दी है। जाहिर है जमुना देवी के दौर की राजनीतिक अदावत आज भी यहां कायम है लेकिन मामला आज सियासी मर्यादाओं के पूरी तरह से तार-तार होने का भी है। यह मप्र की कांग्रेस सरकार के इकबाल के लिये भी बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में सरकार सामूहिक उत्तरदायित्व के मान्य सिद्धान्त पर काम करती है। दलीय अनुशासन में बंधे रहना मंत्री का संवैधानिक दायित्व भले न हो पर उसकी विश्वसनीयता का यह आधारभूत तत्व है। फिलहाल मप्र की कमलनाथ सरकार इस पैमाने पर खरी नहीं उतर पा रही है। ऐसा नहीं लगता कि मंत्रिमंडल का सुपर बॉस सीएम होने के नाते कमलनाथ हैं। उनके कई मंत्री पार्टी और दल की मर्यादाओं को तार-तार कर रहे हैं। वन मंत्री उमंग सिंघार ने तो जिस तरह की शब्दावली का प्रयोग दिग्विजय सिंह के विरुद्ध किया है, वैसी तो विपक्षी बीजेपी के लोग भी नहीं करते रहे हैं। उनकी हिन्दू विरोधी छवि जरूर बीजेपी के निशाने पर रही है लेकिन ब्लैकमेलर, खनन-शराब माफिया जैसे आरोप बीजेपी भी कभी नहीं लगा पाई है। जाहिर है मप्र में दिग्विजय और जमुना देवी के भतीजे मंत्री के बीच की यह जंग आगे दूर तलक जाएगी क्योंकि मंत्रीमंडल के सभी दिग्विजय सिंह समर्थक मंत्री अब उमंग के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ की इस मामले में चुप्पी, सरकार में उनकी सुपर बॉस की इमेज को कटघरे में खड़ा कर रही है।
वैसे उमंग सिंघार के इस रुख के पीछे उस विरासत को भी समझने की जरूरत है जो काँग्रेस के चाल-चरित्र का अंतर्निहित गुणधर्म है। दिग्विजय सिंह मप्र की सियासत के अपरिहार्य तत्व हैं। अर्जुन सिंह, मोतीलाल बोरा, श्यामाचरण शुक्ला का मंत्रिमण्डलीय दौर हो या पीसीसी के दो बार अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल। मुख्यमंत्री के तौर पर दस साल की उनकी पारी उन्हें मप्र की कांग्रेस सियासत में ऐसे तत्व के रूप में स्थापित कर चुकी है, जिसे स्वीकार किये बिना न तो आज कांग्रेस की गाड़ी आगे बढ़ सकती है और न मप्र की समग्र राजनीतिक तस्वीर को मुकम्मल रूप से समझा जा सकता।
उमंग सिंघार के बोल की तह में जाने की भी आवश्यकता है, जमुना देवी कहा करती थीं कि वे तंदूर की आग में जल रही हैं। इसका मतलब दिग्विजय सिंह सरकार को निशाने पर लेना होता था लेकिन दिग्विजय इसे बुआजी का दुलार कहकर कमतर करने की कोशिशें किया करते थे। यहां एक तथ्य यह भी याद रखना होगा कि जिस दौर में दिग्विजय सीएम हुआ करते थे वह कांग्रेस आलाकमान के स्तर पर कमोबेश आज की तरह ही कमजोरी के ग्रहण से पीड़ित था। नरसिंहराव के साथ दिग्विजय ने रणनीतिक याराना बना रखा था तो वह 10 जनपथ के साथ भी अपने तार जोड़े हुए थे। जब सीताराम केसरी की बेरहम विदाई के साथ सोनिया युग का आगाज हुआ तो दिग्विजय वजनदार साबित हुए इसलिए जमुना देवी, दिलीप सिंह भूरिया और दूसरे दिग्गजों की चुनौती से वह बेफ़िक्र रहा करते थे। जमुना देवी का कद कभी दिल्ली दरबार में मजबूत नहीं हो पाया और प्रदेश के दूसरे दिग्गज सिंधिया जैसी मुखरता का साहस नहीं कर पाते थे।
आज परिस्थितियां बदली हुई हैं, उमंग सिंघार के तार राहुल गांधी से सीधे जुड़े हैं। वह पढ़े-लिखे आदिवासी तो हैं ही उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी खुला समर्थन है। उनकी गिनती सिंधिया कोटे में नहीं होती है क्योंकि वे खुद अपनी जीत में सक्षम हैं। उनके पास खुद की विरासत है इसलिये टिकट के लिये वे किसी सिफारिश के मोहताज नहीं हैं। लेकिन वह सिंधिया से सीधे जुड़े हैं ताकि उनकी पृथक पहचान बनी रहे। उमंग जानते हैं कि वे अकेले सक्षम नहीं है और जमीन पर दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की युति बहुत ही मजबूती और व्यापकता लिए है। इसलिये सिंधिया के साथ उनका रणनीतिक रिश्ता बना है। ग्वालियर जिले के प्रभारी मंत्री के रूप में उमंग की नियुक्ति इस रिश्ते की बानगी है क्योंकि ग्वालियर और धार जिलों के बीच कभी कोई साम्य नहीं रहा है, न ही उमंग कभी ग्वालियर आते-जाते रहे हैं। जाहिर है उमंग के बोल केवल उनके नहीं हैं।
मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिये दिग्गी राजा बनाम उमंग सिंघार का झगड़ा असल में उसी 60 साल पुरानी बीमारी का उभरना है जो इस पार्टी के डीएनए में है। कभी अर्जुनसिंह कभी बोरा, कभी श्यामाचरण तो कभी डीपी मिश्रा जैसे राजनीतिक चाणक्य भी मप्र की राजनीति से इस बीमारी को निजात नहीं दिला पाए। पिछले 40 साल से दिग्विजय सिंह तो इस खेल के खिलाड़ी भी रहे हैं और कई बार खेत भी। उन्हें पता है कि उनकी भूमिका क्या होनी चाहिये? वे यह भी जानते हैं कि कमलनाथ किस हद तक उनके साथ युति बनाकर चलने वाले हैं इसलिये मुख्यमंत्री की चुप्पी को केवल उनकी मजबूरी नहीं समझा जा सकता। राजनीतिक जानकर मानते हैं कि शैडो सीएम बनने का दिग्विजय सिंह को शौक नहीं है, वे राजनीति में छाया नहीं बल्कि रीयल खेल के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं। उनकी जमाई बिसात पर फिलहाल कांग्रेस में कोई विकल्प नहीं है। संयोग से मप्र में दिग्गी राजा को अप्रासंगिक करने के लिये जो योद्धा सामने खड़े हैं वे महाराजा हैं या वाणिज्यकार। सियासत का यह कांग्रेसी कल्चर मप्र आलाकमान के लिये भी चुनौती का सबब बन गया है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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