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राहुल ने क्यों दिया इस्तीफा?

06/08/2019

राहुल ने क्यों दिया इस्तीफा?


राहुल गांधी ने औपचारिक रुप से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन उसकी वजह जो उन्होंने बताई है, वह बिल्कुल नहीं है। वे पद इसलिए नहीं छोड़े कि कांग्रेस हार गई थी बल्कि इसलिए हटे हैं क्योंकि कांग्रेस में सत्ता के दो ध्रुव बन गए थे। एक के नेता वे खुद थे और दूसरे की कमान सोनिया गांधी के पास थी। कांग्रेस में चल रही रस्साकसी की असल वजह यही थी। राहुल गांधी बतौर अध्यक्ष जब कोई निर्णय लेते थे तो ओल्ड गार्ड सोनिया गांधी के पास पहुंच जाते थे। चूंकि वे लोग सोनिया गांधी के सहयोगी हुआ करते थे, इस वजह से सोनिया उनकी सुनती भी थी। इसमें कोई बुराई नहीं थी। पार्टी के वे वरिष्ठ हैं तो जाहिर है उनकी बात सुनी जानी चाहिए। पर बात इतनी सी थी नहीं। वे राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से अयोग्य मानते हैं और थे। इसी वजह से राहुल गांधी का फैसला उन्हें नगवार गुजरता था। लिहाजा वे उसे बदलवाने के लिए सोनिया गांधी के पास पहुंच जाते थे। वे राहुल गांधी के निर्णय में हस्तक्षेप करती थी। यह सिलसिला तब से चल रहा है जब से सोनिया गांधी ने कांग्रेस का कामकाज राहुल को सौंपा है।

मतलब 2014 के आम चुनाव के बाद से। यही वह समय था जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस से खुद अलग कर लिया था और राहुल गांधी को फैसले लेने की जिम्मेदारी सौंप दी थी। तभी से राहुल गांधी पार्टी के फैसले करने लगे थे। उसी समय से ओल्ड गार्ड अड़ंगा भी लगाने लगे थे। इस वजह से 2014 में कांग्रेस सचिवों ने विद्रोह कर दिया। वे ओल्ड गार्डस के खिलाफ मोर्चाबंद हो गए। तब पंजाब भवन में इसे लेकर कांग्रेस सचिवों की बैठक हुई थी। उसमें ओल्ड गार्डस के खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ था। वह प्रस्ताव कांग्रेस सचिवों ने तत्कालीन संगठन महासचिव जनार्दन द्विवेदी को सौंपा था। उसमें कहा गया था कि वरिष्ठ नेताओं को अनुशासन का पालन करना चाहिए। इसके जरिए राहुल टीम ने संदेश दे दिया था कि ओल्ड गार्डस के दिन लद चुके हैं। निर्णय भी उसी हिसाब से होने लगे थे। अजय माकन को दिल्ली का अध्यक्ष बनाया गया। शीला दीक्षित के खास कहे जाने वाले अमरिंदर सिंह लवली को हटा दिया गया। यह वह दौर था जब दिल्ली में विधान सभा चुनाव होने वाला था।

राहुल गांधी और उनकी टीम चुनाव के हिसाब से निर्णय ले रही थी। यह बात ओल्ड गार्डस को पसंद नहीं आई। वे राहुल के निर्णय पर सवाल करने लगे। बात सोनिया दरबार तक पहुंची। उन्होंने हस्तक्षेप किया। उससे राहुल बहुत नाराज हो गए थे। वह नाराजगी ही थी कि वे बजट सत्र के दौरान 53- 54 दिन के लिए अज्ञातवास पर चले गए थे। यह 2015 की बात है। जब वे लौटकर आए थे तो रामलीला मैदान में राहुल गांधी के लिए एक जलसा हुआ था। वह पार्टी की एकजुटता दिखाने के लिए हुआ था। नहीं तो यह माना जा रहा था कि पार्टी दो फाड़ में बंट चुकी हैं। इससे सभी परिचित भी थे। लेकिन सोनिया अपने सलाहकारों को पवेलियन वापस भेजने के मूड में नहीं थीं। वे चाहती थीं कि उनके सलाहकार राहुल गांधी की मदद करें। इसी वजह से रामलीला मैदान में सजे मंच पर युवा नेता भी थे और वरिष्ठ भी। वहीं से राहुल गांधी ने कहा था कि अनुभव और युवा जोश मिलकर पार्टी को आगे ले जाएंगे। हालांकि बात बन नहीं पाई। रस्साकशी चलती रही। कैप्टन अमरेंदर सिंह ने तो राहुल का सीधा विरोध किया था। उनका कहना था कि राहुल गांधी अभी पार्टी अध्यक्ष बनने के लायक नहीं हैं।

शीला दीक्षित ने तो उन्हें अपरिक्व तक कह दिया था। इस तरह की भाषा का सीधा मतलब था कि ओल्ड गार्ड राहुल गांधी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। सोनिया गांधी ने उन्हें पद देकर राहुल के लिए तैयार किया। वे मान भी गए। राहुल गांधी दिसंबर 2017 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन गए। हालांकि कांग्रेस कार्य समिति जस की तस बनी रही जबकि राहुल गांधी उसके चुनाव के पक्ष में थे। कायदे से होना यही चाहिए था। पर ऐसा हुआ नहीं। ओल्ड गार्ड जमे रहे। आम चुनाव में उनके रूख से राहुल स्तब्ध थे। वे समझ गए कि पार्टी में जब तक सत्ता के दो केंद्र रहेंगे, तब तक पार्टी को पटरी पर नहीं लाया जा सकता। लिहाजा उन्होंने इस्तीफा दे दिया।


 
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