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बोर्ड की भ्रष्टनिष्ठा

06/08/2019

बोर्ड की भ्रष्टनिष्ठा


त्यनिष्ठा रेल मंत्रालय का मिशन है तो भ्रष्टनिष्ठा रेलवे बोर्ड का। वहां सत्यनिष्ठा की बात करना ही अपराध है। कारण बोर्ड आकंठ भ्रष्टचार में डूबा हुआ है। आए दिन यहां से हेराफेरी की खबरें आती रहती है। लेकिन बोर्ड पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वहां बैठे लोग तो कान में तेल डालकर काम कर रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी वजह से सरकार की कितनी बदनामी हो रही है। ऐसा लगता है, मानो बोर्ड अपने मिजाज के हिसाब से काम करता है। तभी वहां पर सरकारी कानून नहीं चलता। अगर कुछ चलता है तो वह बोर्ड की दादागिरी है। वे अपने हिसाब से काम करते हैं। रूल बुक में कुछ भी लिखा हो, उसकी परवाह नहीं करते। मौजूदा मामला इसका गवाह है। उत्तर रेलवे बोर्ड में तैनात संजीव कुलश्रेष्ठ और आशीष गुलाटी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप है। विजिलेंस विभाग में इसकी शिकायत हुई। यह मामला 2013 का है। इन दोनों पर हेराफेरी का आरोप लगा। वह इसलिए क्योंकि ये लोग सरकारी दायित्व निभाने के बजाए धन कामने में लग गए। बोर्ड के ज्यादातर मामलों में यही हो रहा है। कर्मचारी अपना कर्तव्य भूल जाते हैं और नियम कानून के विरूद्ध जाकर काम करने लगते हैं। कुलश्रेष्ठ और गुलाटी भी उसी रोग के शिकार हैं।

लिहाजा मनमाने तरीके से काम करने लगे। हद तो तब हो गई जब उसे धन उगाही का जरिया बना लिया। इसके बारे में पता सबको था। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह इनके खिलाफ शिकायत करे। हालांकि यह स्थिति बहुत दिनों तक नहीं बनी रही। इनके लालच ने लोगों को मजबूर कर दिया कि वे आवाज उठाए। उठी भी। बात विजिलेंस विभाग पहुंची। विभाग को इनकी हेराफेरी के बारे में बताया गया। इनका किस्सा सुन कर वह भी चौंका। लिहाजा उसने इनको चार्जशीट किया और कहा कि इन्हें किसी भी संवेदनशील पद पर न रखा जाए। पर विभाग की किसी ने सुनी नहीं। उसे तो सीनियर डिविजनल कॉमर्शियल मैनेजर का पीए बना दिया गया। मतलब उसे और अधिक संवेदनशील पद पर बैठा दिया गया। वहां बैठने की वजह से सारी महत्वपूर्ण सूचनाएं उन्हें मिलने लगी। जो सजा के बजाय ईनाम था। लोगों में संदेश भी यही जा रहा है कि ईमानदार को कौन पूछता है। देखो, फला कर्मचारी या अधिकारी भ्रष्ट है, फिर भी वह आज कहां है। खुद को देखिए, आपने सारी उम्र ईमानदारी से नौकरी की, पर आपको हासिल क्या हुआ? पदोन्नति भी नहीं हुई। उसको देखिए, वह भ्रष्ट भी है और तेजी से आगे भी बढ़ रहा है।

यह महज कल्पना नहीं है बल्कि बोर्ड में काम करने वाले लोगों का मनोभाव है। कुलश्रेष्ठ और गुलाटी वाले मामले में विजिलेंस की अनुशंसा के बाद भी जिस तरह का रवैया डिविजनल कॉमर्शियल मैनेजर का रहा है उससे लोग हतप्रभ है। यह स्वभाविक भी है। वह इसलिए क्योंकि उन लोगों पर आरोप है। उनकी जांच भी चल रही थी। इसके बाद भी विभागीय परीक्षा में शामिल होने का मौका दिया गया। बात यही नहीं खत्म हुई। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि इनके परीक्षा में पास होने की व्यवस्था भी कराई गई। वे लोग पास भी हो गए। अब उन्हें बस कुर्सी तक पहुंचना है। उसमें बस एक ही अड़चन है, वह विजिलेंस विभाग की चार्जशीट है। वह जब तक कुलश्रेष्ठ और गुलाटी को बेदाग नहीं कहेगी तब तक कुर्सी मिल नहीं सकती। इसलिए पहले यह जरूरी है कि हेराफेरी के आरोप से विभाग उन्हें बरी करें। दावा किया जा रहा है कि दोनों आरोपी इसकी फिराक में सालों से लगे थे। चौंकाने वाली बात यह है कि अधिकारी भी इन आरोपियों की मदद करने लगे। उनकी भी पूरी कोशिश रही कि विजिलेंस को गुमराह किया जाए। वह इसलिए नहीं कि आरोपियों से उनको कोई लगाव था बल्कि इसलिए क्योंकि आरोपियों से वरिष्ठ अधिकारियों को हिस्सा मिलता था। इस वजह से वरिष्ठ अधिकारी दोनों को बचाने में लगे हैं। विजिलेंस की क्लीन चिट उसी कोशिश का हिस्सा है। वहां के कर्मचारी इस क्लीन को पक्षपात के रूप में देख रहे हैं।


 
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