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चोटी के लोग

24/05/2020

चोटी के लोग

हले मैं लेखक था। आजकल चोटी का लेखक हूं लेकिन इसका श्रेय मुझे नहीं कोरोना वायरस को है। कोरोना के डर से जब दुनिया के बड़े-बड़े अधिपति, चक्रवर्ती सम्राट, विश्वविजेता, फन्ने खां और शेखचिल्ली सबके सब दुबक गये तो फिर ये नाचीज क्या चीज है। लेकिन घर में रहने का फायदा यह है कि बाल इतने लंबे गये हैं कि चोटी बहुत आसानी से बनाई जा सकती है। सूरदास के भजन में कान्हा यशोदा से पूछते हैं ‘‘मां कबहुं बढ़ेगी चोटी।’’ यह कलयुग है। यहां करोना का प्रताप ऐसा है कि अब समस्त जीवधारी चुटियाधारी हो चुके हैं। जिस तरह मैं लेखक से चोटी का लेखक बना हूं, उसी तरह आप भी चोटी तक पहुंच गये होंगे। अगर आप गायक हैं तो चोटी के गायक बन चुके होंगे, चित्रकार है तो चोटी के चित्रकार में बदल गये होंगे, राजनेता या दलाल हैं, तो भी चोटी के हो चुके होंगे। बहुत से नये नवेले चुटियाधारी सोशल मीडिया पर अपने न्यू लुक की तस्वीरें डाल रहे हैं। ट्वेंटी ईयर चैलेंज और साड़ी चैलेंज की तरह मर्दों में चोटी चैलेंज चल रहे हैं।

जिस तरह मैं लेखक से चोटी का लेखक बना हूं, उसी तरह आप भी चोटी तक पहुंच गये होंगे। अगर आप गायक हैं तो चोटी के गायक बन चुके होंगे, चित्रकार है तो चोटी के चित्रकार में बदल गये होंगे, राजनेता या दलाल हैं, तो भी चोटी के हो चुके होंगे।

किसी ने पॉनी टेल के साथ बढ़ी हुई दाढ़ी में फोटो डाली है तो किसी ने साथ में नत्थूलाल जैसी बड़ी-बड़ी मूंछे बढ़ा ली हैं। कई लोग ऐसे भी है, जिनकी पत्नियों को उनका इस तरह ‘चोटी’ का होना कबूल नहीं है। उन्होंने सच्चे अर्थों में अपने पति की हजामत बना डाली और तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाल दीं। अगर ये सोशल मीडिया नहीं होता तो कोरोना काल की उदासी किस तरह कटती। मैं लंबे बालों से बहुत खुश हूं। पिछले सवा महीने से घर में बंद हूं। बाल उससे करीब महीना भर पहले कटवाये थे। मुंबई में जो हालत है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि महीना डेढ़-महीना से पहले नाई की दुकान नहीं खुल पाएगी। इस तरह देखा जाये तो मैं कम से कम छह-सात सौ रुपये हजामत की मद में बचा चुका होउंगा। ये इतना पैसा है कि इसमें कुछ और पैसे डालकर मुकेशभाई अंबानी की कंपनी का एक शेयर खरीदा जा सकता है, जो किसी मायने में सोने से कम नहीं है। लुक के हिसाब से देखें तो बाल बढ़ाना सिर मुड़वाने से ज्यादा आसान और कम खचीर्ला है। आप घर से बाहर निकलते नहीं है, इसलिए जुओं का भी कोई खतरा नहीं है। लंबे बालों के साथ चौका-बर्तन में हाथ बंटाना कहीं ज्यादा नेचुरल लगता है।

गर्मी की वजह से कुछ लोगों ने अपने ही घर में सिर मुड़वा डाले। ऐसा करते वक्त उन्होंने ये सोचा कि बाल काटने में हुनर की जरूरत पड़ती है। पूरे बाल उतारना आसान काम होगा। लेकिन मुंडन शुरू हुआ उन्हें पता चला कि ‘‘मूड़ना’’ सबके बस की बात नहीं है। इसमें भी अलग तरह का कौशल लगता है। कुल मिलाकर मानव जाति पर आया संकट हर किसी को तरह-तरह के प्रयोगों का मौका दे रहा है। रसोई, बागवानी, संगीत, योगाभ्यास से लेकर साधना तक के ढेरों विकल्प खुले हैं। अगर भंडार में अन्न है और अगले दो-तीन महीने तक राशन खरीदने के पैसे हैं तो आप अपने घरों में बैठकर खुले आसमान और पंछियों को निहार सकते हैं। इतनी साफ हवा और इतना नीला आसमान आपने इससे पहले कब देखे थे? जिनकी दिहाड़ी मजदूरी बंद हो गई है, जो लोग तपती धूप में सैकड़ों मील पैदल इस आस में चल रहे हैं कि कभी ना कभी गाँव पहुंचेंगे, ऐसे लोगों के बारे में मैं क्या कहूं। मैं ठहरा चोटी का लेखक, मुझे सिर्फ चोटी के पाठक ही पढ़ते हैं। भूखे नंगे लोगों से हमारा क्या वास्ता? 


 
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