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‘गुमराह न हों घाटी के लोग’.....

06/08/2019

‘गुमराह न हों घाटी के लोग’


मैंयहां तीन हिस्सों में अपनी बात रखूंगा। जो सरकार अभी अभी चुनकर आई है, इससे पहले भी देश के प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी जी थे और इसी दल की सरकार थी। यह सरकार जम्मू कश्मीर की समस्या को किस दृष्टि से देखती है, इस बारे में पहले मैं थोड़ी बातें करूंगा और उसके बाद माननीय सदस्यों ने जो अपने विचार यहां रखे, उनके बारे में बात करूंगा। अंत में जम्मू कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में, जम्मू कश्मीर के विकास के लिए और आतंकवाद को समाप्त करने की दिशा में क्या कदम उठाए गए, उन्हें भी यहां रखने का प्रयास करूंगा। मैं एक बात स्पष्टता के साथ रखना चाहता हूं और जो सदन का विचार भी है। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इसे कोई हिन्दुस्तान से अलग नहीं कर सकता। दूसरी बात, फिर से दोहराना चाहूंगा कि नरेन्द्र मोदी सरकार की आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति है और हम उसे हरदम और हर पल उखाड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। तीसरी बात मैं जम्मू कश्मीर रियासत की अवाम के लिए रखना चाहता हूं। यह सरकार जम्मू कश्मीर के विकास के लिए, मगर समविकास के लिए प्रतिबद्ध है। अब समय आ गया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख तीनों के समविकास के लिए काम किया जाए। कभी भी विकास के मामले में ऊंच नीच का व्यवहार नहीं होना चाहिए।

‘‘यह सरकार जम्मू कश्मीर के विकास के लिए, मगर समविकास के लिए प्रतिबद्ध है। अब समय आ गया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख तीनों के समविकास के लिए काम किया जाए। कभी भी विकास के मामले में ऊंच नीच का व्यवहार नहीं होना चाहिए।’’‘गुमराह न हों घाटी के लोग’

अटल बिहारी वाजपेयी जी का एक मशहूर उद्धरण था कि कश्मीर समस्या का सामाधान जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत के नाते हो। मैं आज फिर से दोहराना चाहता हूं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार भी अटल जी के रास्ते पर चलते हुए काम कर रही है। जम्हूरियत कहता हूं तो आप इसे विधान सभा के 87 सदस्यों तक ही सीमित मत रखिए। आप चुनाव की बात करते हैं, जम्हूरियत की बात करते हैं। क्या पंच, सरपंच को लोकतंत्र का अधिकार नहीं है? क्या पंच, सरपंच को खुद अपने गांव का विकास करने का अधिकार नहीं है? यह नरेन्द्र मोदी सरकार ने जम्हूरियत को गांव तक पहुंचाने का काम किया। मैंने उस सदन में भी कहा कि जम्हूरियत तीन परिवारों के लिए सीमित नहीं रहनी चाहिए, जम्हूरियत नीचे तक, गांव तक जानी चाहिए, 40 हजार पंच, सरपंचों तक जानी चाहिए और यह ले जाने का काम हमने किया। हम भी मानते हैं कि कश्मीरियत को संभालना है। मैं पूछना चाहता हूं कि जो सूफी परंपरा थी, क्या वह कश्मीरियत का हिस्सा नहीं थी? पूरे देश के अंदर सूफी परंपरा का सबसे बड़ा गढ़ हमारा जम्मू और कश्मीर था। कहां चले गए सूफी। उनको किसने निकाल दिया। किसी ने उनके लिए एक शब्द क्यों नहीं बोला?

हमने जम्मू-कश्मीर के लिए आरक्षण कानून संशोधन विधेयकए 2019 के तहत राज्य के कमजोर, पिछड़ा वर्ग और अंतराष्ट्रीय सीमा के करीब रहने वाले लोगों के लिए नए सिरे से आरक्षण का प्रावधान किया है। नियंत्रण रेखा (एलओसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले लोगों को शेल्टर होम में रहना पड़ता है। कई दिनों तक बच्चों को यहां रहना पड़ता है। स्कूल बंद रहते हैं। उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है।

कश्मीरी पंडित, जो आज अपने ही देश के अंदर दर दर की ठोकर खा रहे हैं, उनको घरों से निकाल दिया गया। क्या वे कश्मीरियत का हिस्सा नहीं थे? अगर आवाज कश्मीरी पंडितों के लिए आती, सूफी परंपरा के लिए आती, सूफी संतों के लिए आती और कश्मीरितय की बात करते, तो मैं भी मानता कि कश्मीरियत के लिए सबकी चिंता है। वे हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते थे। वे भारत की बात करते थे। आज वे लोग कश्मीर से भगा दिए गए। कश्मीरियत की बात करते हैं, तब इनकी भी चिंता करनी चाहिए, कश्मीरी संस्कृति की भी बात करनी चाहिए और पूरे कश्मीर की बात करनी चाहिए। मैं सदन को आश्वासन दिलाता हूं कि नरेन्द्र मोदी सरकार की नीति है कि कश्मीर के आवाम की संस्कृति का संरक्षण हम ही करेंगे। एक समय आएगा, मैं निराशावादी आदमी नहीं हूं, वहां क्षीर भवानी के मंदिर में कश्मीरी पंडित भी पूजा करते हुए दिखाई पड़ेंगे और सूफी भाई भी वहां पर दिखाई पड़ेंगे। मैं यह पूछना चाहता हूं कि इतने सारे स्कूल बंद कर दिए गए, बच्चे अनपढ़ हो गए, पूरी की पूरी पीढ़ियां अनपढ़ होने लगीं। क्या यह इंसानियत है? हमने काम किया है, हमने राज्यपाल शासन के अंदर स्कूल चालू करा दिये। जो बाबू कभी कश्मीर के गांव में नहीं जाते थे, वे इन 10 दिनों के अंदर एक भी गांव ऐसा नहीं है, जहां पर बाबू नहीं गया है और योजनाओं को नीचे पहुंचाने का काम नहीं किया है। हमने घर तक गैस पहुंचाई। अगर किसी बुढ़िया की झोपड़ी धुएं से मुक्त होती है, तो यही इंसानियत है।

माइनस डिग्री तापमान में घर में शौचालय नहीं है, हमने उनके घर में शौचालय पहुंचाया, यही इंसानियत है। कोई कश्मीर में 70 साल में बिजली पहुुंचाने वाले घर गिन ले और हमारे छ: साल में बिजली कितने घरों में पहुंची, इसका हिसाब किताब कर ले, हम आगे हैं। मैं यह नहीं कहता कि इसमें स्पर्धा होनी चाहिए, परंतु मैं यह कहना चाहता हूं कि यह इंसानियत की बात है। हमने कश्मीर में खाना पहुंचाया। वहां सस्ता अनाज, गहूं, चावल, दलहन कभी नहीं पहुंचा था, इससे बहुत तकलीफ होती थी। विधवा पेंशन, वृद्ध पेंशन आज डीबीटी के माध्यम से सीधी उनके बैंक एकाउंट में पहुंचती है और बैंक का कर्मी उनके घर पर पैसा देने की पद्धति को लागू करता है। आज वे 600 रुपये 1000 रुपये पाते हैं, जो उनके जीवन निर्वाह के लिए काम आता है। यह इंसानियत है। अगर किसी राज्य में आयुष्मान भारत योजना का कवरेज एक साल में सबसे ज्यादा है, तो मैं यह गर्व के साथ कह सकता हूं कि वह जम्मू कश्मीर है। यह इसलिए है, क्योंकि नरेन्द्र मोदी की, देश के प्रधानमंत्री की यह एप्रोच है कि कोई भी गरीब इलाज के बगैर अपनी जान न गंवा बैठे। यही इंसानियत है।

मैं घाटी के भाई बहनों को कहना चाहता हूं कि किसी को डरने की जरूरत नहीं है। यह जो दहशत फैलाई जा रही है, प्रचार हो रहा है, अप्रचार हो रहा है, गुमराह कर रहे हैं, आप ऐसा मत करिए। आप एक बार अपने आपको भारत के साथ जोड़िए, आपको जानो माल की सुरक्षा करने की, आपके जीवन को ठीक ढंग से चलाने की भारत सरकार की जिम्मेदारी है।

हम जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत को लेकर चलते हैं अ‍ैर आगे भी इसी को लेकर चलेंगे। मगर इससे कोई यह मतलब न निकाल ले कि भारत को तोड़ने की बात करने वालों के साथ भी यही रवैया रहेगा। जो भारत को तोड़ने की बात करेगा, उसको उसी की भाषा में जवाब मिलेगा और जो भारत के साथ रहना चाहते हैं, हमें उनके कल्याण की चिंता हैं। मैं जम्मू कश्मीर की आवाम को कहना चाहता हूं, विशेषकर घाटी के भाई बहनों को कहना चाहता हूं कि किसी को डरने की जरूरत नहीं है। यह जो दहशत फैलाई जा रही है, प्रचार हो रहा है, अप्रचार हो रहा है, गुमराह कर रहे हैं, आप ऐसा मत करिए। आप एक बार अपने आपको भारत के साथ जोड़िए, आपको जानो माल की सुरक्षा करने की, आपके जीवन को ठीक ढंग से चलाने की भारत सरकार की जिम्मेदारी है। भारत के किसी भी सूबे में जितनी सुख- सुविधा पहुंची है, वह घाटी के लोगों को भी मिलनी चाहिए, यह नरेन्द्र मोदी सरकार का मानना है। लद्दाख में कई सालों से हिल काउंसिल की मांग थी, मगर हिल काउंसिल बनाई नहीं जाती थी, क्योंकि लद्दाख बहुत दूर का क्षेत्र है। हमारी सरकार ने पहली बार आर्थिक अधिकार दिए और उनको फैसले खुद करने का अधिकार दिया। मैं सहमत हूं कि आर्टिकल 356 का उपयोग कम से कम करना चाहिए। मगर जब आप यहां बैठे हो, तब एक बात और जब वहां बैठे हां, तब दूसरी बात, यह तो कम से कम नहीं करना चाहिए। मैं कुछ आंकड़े सदन के सामने रखना चाहता हूं। जब से देश आजाद हुआ , तब से इस देश में कुल 132 बार आर्टिकल 356 लागू हुआ।

मुझे एक बात बताइए कि 1 जनवरी 1949 को अभी एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में था और आपने सीजफायर क्यों कर दिया? इसका जवाब मैं नहीं पूछता, पूरा देश पूछता है, इतिहास पूछता है। अगर यह सीजफायर न हुआ होता तो आज ये झगड़ा ही ना होता। अगर यह सीजफायर ना हुआ होता तो आज आतंकवाद भी ना होता।

अकेली कांग्रेस पार्टी ने 93 बार आर्टिकल 356 का उपयोग किया। हमने तो परिस्थितिजन्य आर्टिकल 356 का उपयोग किया। आपने तो केरल में सबसे पहली कम्युनिस्ट सरकार को गिराकर आर्टिकल 356 लगाया। आर्टिकल 356 का दुरुपयोग कैसे हो सकता है, इसकी शरुआत आपके समय में हुई थी। प्रधानमंत्री जी ने सभी दलों के अध्यक्षों को बुलाया। लोकसभा के स्पीकर साहब ने सभी दलों के नेता, सदन को बुलाया। यहां एक बात आती है कि बिलों की चर्चा कमिटियों में नहीं हो रही है। हम व्यवस्था को सुधारने का प्रयास भी करेंगे, मगर जब अर्जेन्सी होती है, तब बिल को यहां लाते हैं और हम बिल पर पर्यापत चर्चा करने के लिए समय देने में कोई कमी नहीं करते हैं। एक मुद्दा बार-बार उठाया गया कि पंचायतों के चुनाव हुए, खून का कतरा नहीं बहा, लोक सभा के चुनाव हुए, खून का कतरा नहीं बहा, तो स्थिति अच्छी है, चुनाव होने चाहिए। यह भी कहा गया कि लोकसभा तथा विधानसभा के चुनाव साथ में क्यों नहीं हुए? हम तो कहते हैं कि देश भर के विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ हों, आप ‘न’ बोलते हो, पर यहां क्यों नहीं हुए, इसकी भी मैं बात करता हूं। अगर विधान सभा के चुनाव होते हैं, तो उसके लिए 1,000 प्रत्याशी फॉर्म भरते हैं।

1000 प्रत्याशी के प्रचार, उनकी छोटी-छोटी नुक्कड मीटिंग्स, उनके गांव के दौरे, उनकी बड़ी सभाएं, सभी राष्ट्रीय नेताओं का गांव तक का दौरा, इन सबको सुरक्षा कवर देने का मामला है, इसके लिए सुरक्षा बलों ने चुनाव आयोग के सामने साफ शब्दों में अपनी असमर्थता जाहिर की थी। चुनाव इसलिए भी नहीं कराए कि लोकसभा चुनाव के दौरान रमजान का महीना था। लोक सभा चुनाव के बाद अमरनाथ की यात्रा का समय आ गया था। इसलिए फिलहाल चुनाव न कराने का सुरक्षा बलों का सजेशन था, जम्मू-कश्मीर सरकार के एडमिनिट्रेशन का था और यह फैसला चुनाव आयोग ने लिया था। हम कांग्रेस नहीं है, हमारे समय में चुनाव आयोग ही चुनाव कराता है। आप जब थे, तब ऐसा था कि सराकर ही चुनाव कराती थी। चुनाव आयोग ही चुनाव करता है, उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, मैं कैसे करा दूंगा? अगर मैं कराता तो कहता कि चलो कल से चुनाव करा दें, किंतु बाद में आप कहेंगे कि चुनाव आयोग भी आप चला रहे हैं। एक मुद्दा उठाया गया कि आपने पी.डी.पी. के साथ गठबंधन क्यों किया।

मैं आज इस सदन के माध्यम से सभी सदस्यों को और देश की जनता को भी कहना चाहता हूं कि पीडीपी के साथ हम गठबंधन करें, यह हमारा फैसला नहीं था, यह जम्मू कश्मीर की जनता का फैसला था। हमें एक खंडित जनादेश मिला था और खंडित जनादेश भी इस प्रकार का मिला था, जिसके अंदर अगर कोई दो दल इक्ट्ठा नहीं होते हैं तो बहुमत की संभावना ही नहीं है। एन सी ने अपना रुख कायम कर दिया था, कांग्रेस ने अपना रुख कायम कर दिया था, उनकी संख्या से सरकार नहीं बन सकती थी। इसमें कम समय नहीं गया है, काफी समय तक राज्यपाल शासन रहा था, जब कुछ नहीं हुआ, तब एक मिनिमम कॉमन प्रोग्राम के तहत हम आगे बढ़े और हमने सरकार बनायी थी। जब हमें लगा कि अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा है, पानी सिर के ऊपर जा रहा है, तब हमने तनिक भी देर नहीं की, समर्थन वापस लिया और सत्ता से वापस आए। एक बात है,इतिहास की भूलों से जो देश नहीं सीखते हैं, उनका भविष्य अच्छा नहीं होता है। इतिहास की भूलों की चर्चा होनी चाहिए और इतिहास की भूलों से सीखना चाहिए। चाहे मकबूल शेरवानी हों, चाहे ब्रिगेडियर उस्मान हों या आप एक नाम भूल ग्ऋी, ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह हों, जो महाराजा की सेना के ब्रिगेडियर थे, जो सालों तक लड़ते रहे और शहीद हुए। इन तीनों के लिए हमारे मन में, सभी शहीदों के लिए पूज्य भाव है। मुझे एक बात बताइए कि 1 जनवरी 1949 को अभी एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में था और आपने सीजफायर क्यों कर दिया? इसका जवाब मैं नहीं पूछता, पूरा देश पूछता है, इतिहास पूछता है।

अगर यह सीजफायर न हुआ होता तो आज ये झगड़ा ही ना होता। अगर यह सीजफायर ना हुआ होता तो आज आतंकवाद भी ना होता, अगर यह सीजफायर ना हुआ होता तो 35000 जान ना गईं होतीं। इसका मूल कारण वह सीजफायर है जो उस समय हुआ था। सरदार पटेल ‘न’ बोलते थे, फिर हम क्यों गए? इन तीन बातों का जवाब देश जानना चाहता है। हम यूएन में क्यों गए? जब महाराजा के भारतीय संघ के साथ संधि करने के बाद कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था तो हमें यूएन में जाने की जरूरत क्या थी? क्या यह गलती नहीं है? मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि जनमत संग्रह के लिए हमने क्यों सहमति दी? आज जनमत संग्रह का सवाल ही नहीं है लेकिन उस वक्त सहमति क्यों दी,किसने दी, क्या यह गलती नहीं है? इन्होंने कहा टेलीविजन बंद कर दीजिए। हम तो इमरजेंसी लादना नहीं चाहते हैं। टेलीविजन चालू रहेगा, फिर भी शांति होगी। जिसे जो दिखाना हो दिखा दे, सारी घाटी की आवाम का दिल हम जीतेंगे। उसको गले हम लगाएंगे और उन्हें गुमराह होने से हम बचाएंगे। यह हमारा संकल्प है। हमने कोई लाग लपेट की बात नहीं की है। अलगाववाद और आतंकवाद को जो बढ़ावा देते थे,उनके ऊपर प्रतिबंध लगाने का काम किया है।

जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट पर इतने समय तक प्रतिबंध नहीं लगाया गया। इस पर प्रतिबंध लगाने का काम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस सरकार ने किया। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि जो भारत के विरोध में बात करते थे,जम्मू कश्मीर की आवाम को गुमराह करते थे, उन लोगों को भी इतनी भारी सुरक्षा दी गई थी। जनता की सुरक्षा नहीं हो पाती थी । लगभग 2000 व्यक्तियों की सुरक्षा को हमने रिव्यू किया। उसमें से 919 लोगों की सुरक्षा पूरी तरह वापस करने का काम इस भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने किया। इनमें 18 अलगाववादी नेता भी हैं। अगर अलगाववाद और आतंकवाद को रोकना है तो यह बहुत जरूरी कदम है। बहुत उपयोगी कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज मैं सदन के माध्यम से अभिनंदन करना चाहता हूं कि उन्होंने दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया। उन्होंने दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय कराते हुए एयर स्ट्राइक करने का निर्णय किया और पाकिस्तान के घर में घुसकर उसके आतंकवादी अड्डों को तबाह कर दिया। अब दुनिया भर में डिफेंस के पंडित कह रहे हैं कि भारत की सुरक्षा नीति अब निश्चित है। मगर शांति की बात तभी होगी, जब हमारी सीमाओं का सम्मान करें और हमारी सीमाओं के साथ छेड़खानी ना करें। यदि सभी माननीय सदस्यों की सहमति हो तो मैं नाम भी पढ़ सकता हूं,जो लोग यह कहते थे की पढ़ाई लिखाई बंद करो बहिष्कार करो। उनके एक नेता का पुत्र सऊदी अरब में उच्च शिक्षा प्राप्त करके 30 लाख रुपये महीने की तनख्वाह पर काम कर रहा है।

एक दूसरे नेता के पुत्र सऊदी अरब में डॉक्टर हैं। पढेंÞ कहां, लंदन में पढ़े लेकिन यहां स्कूलों को बंद कराने आते हैं। आर्सिया अंद्राबी के दो पुत्र विदेश में पढ़ रहे हैं और तीसरा पुत्र भी मलेशिया में पढ़ रहा है। घाटी की जनता को भी कहना चाहता हूं कि आपको जो गुमराह कर रहे हैं, उनके बच्चे कहां हैं, कितना पढ़े हैं और कितने सुख-चैन से रह रहे हैं। उस पर आप सोचें और इनकी बातों में ना आएं। इनकी बातों में आकर गुमराह होकर आप अपने हाथों में पत्थर मत उठाएं। इनकी बातों में आकर गुमराह होकर हाथ में हथियार मत लीजिए। हमने ऐसी व्यवस्था की है कि इनके घर में इनके पसीने छूट रहे हैं। मैं घाटी के लोगों, युवाओं और आम जनता से कहना चाहता हूं कि इनकी बातों में आकर गुमराह मत होइए।

लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और भारत सरकार में सचिव रह चुके हैं।
(अनुवाद: विक्रम उपाध्याय)


 
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