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बाजार के बीच कोरोना

16/03/2020

डॉ. अजय खेमरिया
हमारे लोकजीवन की चेतना, ऊर्जा और संकेन्द्रण मीडिया ट्रायल पर अबलंबित हो गए हैं। सूचना क्रांति ने सूचना की सीमित महत्ता को अनावश्यक व्यापक बना दिया है। केवल निजी तौर पर नागरिक जीवन बल्कि राजव्यवस्था भी युद्धस्तर पर सभी प्राथमिकता बदलकर मीडिया ट्रायल के पीछे पूरा पराक्रम झोंक देती है। नजीर के तौर पर हम "कोरोनो वायरस" अटैक को समझ सकते हैं। निःसन्देह यह चुनौती है लेकिन जिस अतिशय डरावनी जमीन पर सूचनावीरों ने कोरोना को खड़ा किया है, देश में आज हरतरफ केवल कोरोनो वायरस की चर्चा हो रही है। खबरिया चैनल्स देशभर को कोरोनो से जिस लहजे और अंदाज में आगाह कर रहे हैं, उसने सरकारों को भी लगता है बुरी तरह से डरा दिया है।
हम भारतीयों का स्थायी तत्व बन गया है कि हम मीडिया ट्रायल के इर्द-गिर्द चलने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। चीन जनित इस त्रासदी से निबटने के लिए निःसन्देह एहतियात की जरूरत है लेकिन सवाल यह है कि ऐसी परिस्थितियों में हमें इस तरह भयाक्रांत होने की वाकई जरूरत है? तब जबकि हमारे पास चीन, जापान या यूरोपियन मुल्कों की तरह न स्वास्थ्य सुविधाएं हैं न संसाधन और इन सबसे ऊपर न जीवनशैली। देश में अभीतक कोरोनो पीड़ित लोगों का आंकड़ा सौ के पार हुआ है। इससे मरने वाले दो बुजुर्ग हैं, दोनों की मौत विदेशी सम्पर्क के चलते हुई है।
साबुन, हैंडवाश लिक्विड, सेनिटाइजर बेचने वाली कम्पनियों ने विज्ञापन के कंटेंट बदल कर कोरोना केंद्रित कर दिए। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोपों की झड़ी लगाते हुए यहां तक कह दिया कि वह गहरी नींद में सो रहे हैं। सरकार ने इसे महामारी घोषित कर दिया। सभी सरकारी स्कूल, दफ्तर 31 मार्च तक बन्द कर दिए। मप्र, हरियाणा, गुजरात, यूपी, बिहार, राजस्थान सहित 12 राज्य सरकारों ने आगामी आदेश तक स्कूल कॉलेज, सिनेमाघर, सरकारी आयोजन बन्द रखने के आदेश जारी कर दिए। अखबारों, टीवी और रेडियो पर लगातार कोरोना के विज्ञापन बरस रहे हैं। मोबाइल पर किसी को फोन मिलाइये घण्टी से पहले आपको खांसते हुए एक रिकार्डेड वाइस नोट सुनने को मिलेगा जो कोरोना से बचने का संदेश सुनाता है।
सवाल यह है कि क्या कोरोना की त्रासदी किसी वैश्विक षड्यंत्र का हिस्सा तो नहीं है? याद कीजिये एड्स और हेपेटाइटिस बी, जीका, बर्ड फ्लू जैसी ग्लोबल बीमारियां। एड्स पर हजारों करोड़ रुपये भारत में खर्च हो रहे हैं। हर जिले में एड्स नियंत्रण दफ्तर है। राज्यों में स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी है। जबकि इस बीमारी से भारत में होने वाली मौतें इसकी डरावनी स्क्रिप्ट के बिल्कुल उलट है। कुछ समय पहले हैपेटाइटिस बी, जीका, एच1 एन1 का हल्ला भी ऐसे ही मचाया गया था। तब इसका टीका 15 से 25 हजार तक बेचा गया। आज यही टीका हजार पांच सौ में मिल रहा है। दोनों बीमारियों की जांच के नाम पर लाखों लोग आज भी रोज लुटने को विवश हैं। कमोबेश कोरोनो की बाजारवादी ताकतें भी कुछ यही बयां कर रही है।
पीसीआर जांच व मास्क आदि के व्यापार रातोंरात चमक गए पर दूसरे सभी सेक्टर डवांडोल है। भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा है। कोरोनो की जांच पीसीआर (Polymerase chain reaction ) टेस्ट के जरिये की जा रही है। इसे ईजाद करने वाले 'कैरी मुलिस' खुद इसकी प्रमाणिकता के प्रति आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने स्वीकार किया था कि पीसीआर कोरोना जैसे किसी विशिष्ट वायरस के संक्रमण को 100 फीसदी नहीं पकड़ सकता है।ग्वालियर मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर रहे डॉ. अरविन्द्र दुबे का मत है कि ब्रह्मांड में करीब 4 लाख वायरस हैं और अबतक शोध में लगभग 200 या 300 वायरस ही उनकी विशिष्टता के साथ 'कोरोना' जैसे नामों से चिन्हित किये गए हैं। तमाम शोध और नवोन्मेष चिकित्सा तकनीकी से जुड़े डॉ. दुबे कहते है कि अधिकतर सभी वायरस के लक्षण लगभग समान होते हैं, जिनसे बुखार, जुकाम, सर्दी, नाक बहना, खांसी, आंखों का लाल होना आम है। हर साल बसन्त के साथ भारत में करोड़ों लोग इस बीमारी से परेशान होते हैं और यह भी तथ्य है कि औसतन 7 दिन में ठीक भी हो जाते हैं।
हमें यह ध्यान से समझने की जरूरत है कि कोरोना का यह 'प्रचार केंद्रित प्रकोप' इसी अवधि में हो रहा है। समझने का प्रयास करना होगा कि जब यह वायरस चीन के साथ इटली जैसे साफ-सुथरे मुल्क में पैर पसार गया तो भारत ने तो अभी स्वच्छता पर काम करना ही शुरू किया है। उन हाइजेनिक मुल्कों में यह नहीं रुक रहा है तो सेनिटाइजर, हैंडवाश या मास्क से इसे भारत में कैसे रोका जा सकेगा? हमारे यहाँ आज भी 90 फीसदी लोग खुली खाद्य सामग्री का प्रयोग करते हैं। पैक्ड फूड का चलन भी यहाँ धनी लोगों तक सीमित है। ऐसे में कोरोना और बचाव के डरावने शोर को समझने की आवश्यकता है।
चिकित्सा विज्ञान में आम धारणा है कि हमारे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, तब शरीर पर वायरस या बैक्टिरिया हावी हो जाता है। हमारे वातावरण में सदैव वायरस-बैक्टिरिया मौजूद रहते हैं। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता एक अंतर्क्रिया है। यह प्रकिया अनवरत चलती रहती है। जब शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होती है या मौसम परिवर्तन होता है या दूषित खानपान के शिकार होते हैं या शरीर में अत्यधिक टॉक्सिन्स जमा हो जाते हैं तो वायरस का हमला होता है, जिससे हम सर्दी जुकाम, बुखार, खांसी एलर्जी के शिकार हो जाते हैं। इजरायल और अमेरिका में काफी समय काम कर चुके इंदौर के डॉ. मनीष जैन कहते हैं कि मानव शरीर में वायरस से लड़ने की स्वतः क्षमता और तन्त्र मौजूद है। कोरोना को डॉ. जैन आपदा मानने के लिए तैयार नहीं हैं। मेडिकल जर्नल लासेन्ट में छपी एक रिपोर्ट के हवाले से वह बताते हैं कि मांसाहारी भोजन, पैक्ड फूड, हाइब्रिड फूड आदि इस तरह के रोगों के लिए जिम्मेदार हैं। ये खाद्य सामग्रियां लोगों को बीमार बना रही हैं। भारत के सन्तुलित खानपान में ही सबका शमन निहित है।
आज रक्षा उत्पादन के बाद दूसरा सबसे बड़ा कारोबार पूरी दुनिया में एलोपैथी और दवाओं से जुड़ा है।135 करोड़ का मुल्क एड्स, एच1एन1, जीका, स्वाइन फ्लू, हेपेटाइटिस, बर्ड फ्लू जैसे वायरस के लिये बाजार बन चुका था अब कोरोना के लिए बाहें खोलकर खड़ा है। इस बीच देश में होली खेली गयी, न ट्रेनों में खाली जगह है न शादी-ब्याहों में पंगत कम हो रही है। लिहाजा, समय बीतते ही एक और जांच, टीका हमारे डॉक्टर के पर्चे में जरूर जुड़ जाएगा।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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