लेख

Blog single photo

विवादों का दूसरा नाम दिग्विजय

07/09/2019

बद्रीनाथ वर्मा
देश में हिंदू आतंकवाद की थ्योरी गढ़ने वालों में शामिल रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का विवादों से चोली दामन का साथ है। वह जब भी मुंह खोलते हैं, विवादों को ही न्योता देते हैं। विवाद भी ऐसे कि खुद उनकी पार्टी बगलें झांकने लगती है। आखिरकार शर्मसार होने से बचने के लिए उनके निजी बयान कहकर उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश करती है। बावजूद इसके दिग्विजय हैं कि मानते नहीं। अपनी आदत के मुताबिक उन्होंने एकबार फिर से एक ऐसा बयान दिया है, जिसने नये विवादों को जन्म दे दिया है। इसबार उन्होंने कहा कि पाकिस्‍तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए मुसलमानों से ज्‍यादा गैर-मुसलमान जासूसी कर रहे हैं। वह यहीं नहीं रुके बल्कि यहां तक कह दिया कि जो लोग आईएसआई से पैसा लेते हैं, वही बीजेपी और आरएसएस से भी पैसा लेते हैं। इसपर विवाद होना ही था। दिग्विजय के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के कद्दावर नेता शिवराज सिंह चौहान ने कहा, 'वह खबरों में बने रहने के लिए विवादित बयान देते हैं। वो और उनके नेता पाकिस्तान की भाषा बोलते हैं। पाकिस्तान राहुल गांधी के बयानों का हवाला देता है। जहां तक बात बीजेपी-आरएसएस की है, पूरा विश्व, पूरा देश उनकी देशभक्ति से परिचित है। खैर, विवाद बढ़ने पर यूटर्न लेते हुए दिग्विजय सिंह ने सफाई दी कि उन्होंने बीजेपी पर यह आरोप नहीं लगाया कि वह आईएसआई से पैसा लेकर पाकिस्तान के लिए जासूसी करती है।
बहरहाल, दिग्विजय सिंह ने भले ही सफाई दे दी लेकिन न तो उनका यह पहला वक्तव्य था और न ही अंतिम। वह लगातार इस तरह की बयानबाजी के लिए कुख्यात हैं। अभी पिछले साल उन्होंने हिंदू आतंकवाद को मुद्दा बनाते हुए कहा था कि हिंदू धर्म वाले सभी पकड़े गए आतंकी संघ (आरएसएस) से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू आतंकवादी संघ से आते हैं क्योंकि संघ की विचारधारा नफरत फैलाने वाली है। उन्होंने कहा था कि जितने भी हिंदू धर्म वाले आतंकवादी पकड़े गए हैं, सब संघ के कार्यकर्ता रहे हैं। नाथूराम गोडसे, जिसने महात्मा गांधी को मारा, वह भी आरएसएस का हिस्सा था।
उल्लेखनीय है कि मालेगांव विस्फोट को आधार बनाकर भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने के लिए दिग्विजय एंड कंपनी ने हिंदू आतंकवाद की थ्योरी गढ़ी थी। इस्लामी आतंकवाद के बरअक्स हिंदू आतंकवाद का प्रोपेगेंडा खड़ा करने का मूल उद्देश्य मुस्लिमों का पक्षधर बन वोटबैंक तैयार करना था, चाहे इसमें कुछ निरपराध हिंदुओं की बलि ही क्यों न चढ़ जाये। यह एक षड्यंत्र था। इस षड्यंत्र में दिग्विजय सिंह को तत्कालीन यूपीए सरकार के गृहमंत्री सुशील शिंदे व पी चिदंबरम का भरपूर साथ मिला। इस तिकड़ी ने मिलकर हिंदू आतंकवाद का हौव्वा खड़ा कर सहिष्णु सनातन धर्म पर आतंक का दाग लगाने की असफल कोशिश की। हालांकि कोर्ट ने हिंदू आतंकवाद की हवा निकाल दी।
हिंदूवादी संगठनों के खिलाफ दिग्विजय सिंह के मन में कितना जहर भरा हुआ है, वह 1998 में झाबुआ में ईसाई मठों में रह रही 4 ननों के साथ 24 लोगों द्वारा किये गये बलात्कार के आलोक में देखा जा सकता है। तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बिना किसी ठोस सबूत के ननों के बलात्कार के लिए हिंदूवादी संगठनों को दोषी ठहरा दिया था। इसके खिलाफ एक स्थानीय वकील द्वारा जन अवमानना का दावा करते हुए केस दायर कर देने पर दिग्विजय के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी निकला था। बाद में भोपाल कोर्ट में पेश होने पर उन्हें 5,000 रुपये के श्योरिटी बॉन्ड पर बरी कर दिया गया।
खुद को मीडिया की सुर्खियों में बनाये रखने के लिए दिग्विजय ने विवादित बयानों की शुरूआत मुख्यमंत्री के रूप में अंतिम दिनों में यह कहकर की कि मुझे कर्मचारियों के वोट नहीं चाहिए। इसपर बावेला मचना ही था, सो मचा। उसके बाद तो जैसे विवादित बयान देने में दिग्गी को मजा ही आने लगा। चाहे वह बटला हाउस कांड हो या 26/11 का मुंबई हमला। आश्चर्य ही है कि नाम राशि हिंदू होने के बाद भी उनके निशाने पर हिंदू ही रहे। भगवाधारी जहां उन्हें आतंकी नजर आये, वहीं ढाका हमले में शामिल आतंकियों की प्रेरणा रहा जाकिर नाइक शांतिदूत। 2012 में जाकिर नाइक के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दिग्विजय ने कहा था कि मैनें हुजूर जाकिर साहब का बहुत नाम सुना था। इतने ज्यादा लोगों के बीच बोलने का मौका मिला, इसके लिए मैं उनका आभारी हूं। इस बात की खुशी है कि वे शांति का संदेश पूरे विश्व में फैला रहे हैं। कई कारण ऐसे बने जिस वजह से हमारे मुसलमान भाई और बहनों में एक भाव पैदा हुआ है कि हमारे साथ न्याय नहीं हो रहा, जो सही है। इसकी सारी जिम्मेमदारी हमारी है।
मुस्लिम वोटबैंक को लक्षित कर दिये गये उनके विवादित बयानों की लंबी श्रृंखला है। उनके कुछ बयानों ने खुद कांग्रेस की भी फजीहत करा डाली है। मसलन यूपीए सरकार के दौरान दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर जिसमें दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन शर्मा शहीद हो गये थे, उनकी नजर में फर्जी एनकाउंटर था। लेकिन इसके ठीक उलट तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि वह असल मुठभेड़ थी। बावजूद इसके उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में राहुल गांधी की मौजूदगी में दिग्विजय सिंह ने एकबार फिर इस मुठभेड़ को फर्जी करार दिया था। मामले की सारी सच्चाई सामने आने के बाद भी वे यह मानने को तैयार नहीं थे मुठभेड़ फर्जी नहीं था। अपने बयान पर कायम रहते हुए यहां तक कहा था कि मैं सात जन्मों तक माफी नहीं मांगूंगा।
इसी तरह दिसंबर, 2010 में हेमंत करकरे को लेकर दिग्विजय सिंह के दिये गये एक बयान पर खूब बवाल मचा था। एक किताब के विमोचन के मौके पर उन्होंने मुंबई हमले से कुछ ही देर पहले हेमंत करकरे से फोन पर बात होने का दावा किया था। दिग्विजय के मुताबिक हेमंत करकरे ने फोन पर बताया था कि मालेगांव विस्फोट केस की जांच के कारण उन्हें हिंदूवादी संगठनों से धमकी मिली थी। उनके इस बयान को लेकर उसी तरह बावेला मचा था, जैसा कि साध्वी प्रज्ञा के बयान को लेकर कांग्रेस ने मचाया था। खुद हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने भी बयान पर आपत्ति जताते हुए इसे शहादत का मजाक उड़ाना बताया और कहा था कि ऐसे बयान लोगों को गुमराह करेंगे और इससे पाकिस्तान को फायदा होगा। नतीजतन दिग्विजय को पलटते हुए कहना पड़ा कि मैंने ऐसा कभी कहा ही नहीं कि हेमंत करकरे की मौत में हिंदू कट्टरपंथियों का हाथ है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की साप्ताहिक पत्रिका 'युगवार्ता' के सहायक संपादक हैं।)


 
Top