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युवाओं का विरोध और बदलाव

13/11/2019

युवाओं का विरोध और बदलाव

गुंजन कुमार


विरोध की अवधारणा नई नहीं है। विरोध ही आंदोलन का रूप लेता है। पूरी दुनिया की युवा पीढ़ी ने विरोध को देखा है। सुना है। और समझा भी है। कुछ विरोध के अगवा भी बने। महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला 20 वीं सदी के सबसे अच्छे उदाहरण हैं। सदियों तक वे रहेंगे भी। भारत का इतिहास विरोध कथा से भरा हुआ है। भूमंडलीकरण के दौर में विरोध के मायने साजिशन नकारात्मक बना दिए गए हैं। मगर युवा नहीं रूके। आज वे विरोध भी कर रहे हैं और बदलाव के लिए काम भी। भारतीय युवाओं के इस रंग को देखने, समझने से पहले वर्तमान समय में दुनिया के ऐसे दो युवा ब्रिगेड को समझते हैं। एक हांगकांग में अपने अधिकार के लिए लड़ रहा है। दूसरा, पर्यावरण की रक्षा के लिए अपने देश (स्वीडन) से लड़ाई शुरू की। संयुक्त राष्ट्र संघ में आवाज बनी। उनके नक्शे कदम पर दुनिया भर के स्कूली छात्र पर्यावरण बचाने घर से बाहर निकल आए। हांगकांग में लंबे समय से लोकतंत्र समर्थकों का आंदोलन चल रहा है। पिछले कुछ महीनों से लाखों युवा हांगकांग के सड़कों पर सप्ताहांत विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस आंदोलन का चेहरा 22 वर्षीय जोशुआ वोंग हैं। वे 2014 में ही लोकतंत्र के लिए हुए प्रदर्शन के दौरान वहां बड़ा चेहरा बनकर उभरे थे। उस समय आंदोलन के दौरान 79 दिन तक हांगकांग के कई क्षेत्रों में स्थिति खराब हो गई थी।

विरोध की अवधारणा नई नहीं है। पूरी दुनिया की युवा पीढ़ी ने विरोध को देखा है। सुना है। भूमंडलीकरण के दौर में विरोध के मायने साजिशन नकारात्मक बना दिए गए हैं। और समझा भी है। कुछ विरोध के अगुवा भी बने। भारत का इतिहास विरोध कथा से भरा हुआ है। मगर युवा नहीं रूके। आज वे विरोध भी कर रहे हैं और बदलाव के लिए काम भी।

वोंग कहते हैं, ‘हम प्रदर्शन ना करें, यह सांस ना लेने जैसा है। मुझे लगता है कि लोकतंत्र के लिए लड़ना मेरा कर्तव्य है। शायद हम जीत जाएं, शायद हम हार जाएं, लेकिन हम लड़ेंगे।’ इस समय वहां लोकतंत्र समर्थक आंदोलन अपने चरम पर है। इसकी अगुवाई डेमोसिस्टो नाम का एक संगठन कर रहा है। यह संगठन पूरी तरह युवाओं का है। इनका प्रदर्शन रोजाना नहीं होता। ये अपने युवा समर्थकों के साथ वीकंड में प्रदर्शन करता है। जोशुआ वोंग, एग्निस चो और नाथन लॉ इस प्रदर्शन के प्रमुख नेता हैं। जोशुआ वोंग और एग्निस चो की उम्र महज 22 साल है। नाथन लॉ 26 साल के हैं। एग्निस चो एक लड़की है। इनकी लड़ाई चीन सरकार से है। चीन ने हांगकांगवासियों के अधिकार को सीमित कर रखा। इसलिए यहां के युवा अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। जोशुला वोंग 2014 में अंब्रेला मूवमेंट चलाया था। उस वक्त भी इन्हें गिरμतार किया गया था। उसके अंब्रेला मूवमेंट में कॉलेज के छात्रों ने हिस्सा लिया। वांग का नाम अंब्रेला मूवमेंट के लिए शामिल होने पर 2018 में नोबल के शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। 2014 के आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए उन्हें 100 दिन से ज्यादा जेल में रहना पड़ा। वांग को इस साल 17 जून को जेल से रिहा किया गया। मगर पिछले महीने उन्हें फिर से गिरμतार कर लिया गया है। वोंग अपनी और अगली पीढ़ी को पूरी आजादी दिलाने के लिए लड़ रहे हैं। हांगकांग ब्रिटेन का उपनिवेश रहा है।

स्मोक फ्री अस्सी घाट

नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने स्वच्छता भारत अभियान की शुरूआत की। उन्होंने अस्सी घाट पर स्वच्छता अभियान चलाया था। अस्सी घाट बनारस का ऐतिहासिक घाट है। वहां देश-विदेश के पर्यटक रोजाना बड़ी संख्या में आते हैं। इसलिए उस घाट पर स्वच्छता अभियान बेहद जरूरी था। अब उस घाट को स्मोक फ्री बनाने के लिए कुछ युवा सामने आए हैं। इन युवाओं ने कोशियाना डॉट कॉम नाम से एक वेबसाइट बनाकर इस पर अभियान चला रहे हैं। इस अभियान को युवा ही अपने कंधों पर चला रहे हैं। नशा युवा पीढ़ी को धीरे-धीरे खत्म करती जा रही है। एक शोध के मुताबिक सिर्फ भारत में ही पांच लाख से ज्यादा लोग नशे से अपनी जान गंवा रहे हैं। युवा पीढ़ी को बचाने के लिए जरूरी है कि उन्हें नशे से दूर रखा जाए। कोशियाना डॉट कॉम के सुदीप मणि त्रिपाठी कहते हैं कि घाटों पर युवा नशा करते हमेशा दिख जाते थे। हम इसे बदलना चाहते थे। हम चार मित्र मिलकर अस्सी घाट पर स्मोक के खिलाफ अभियान चलाने लगे। लोगों को जागरूक करने लगे। आज अस्सी घाट स्मोक फ्री हो गया है।

साल 1997 में ब्रिटेन ने एक तरह से चीन को हांगकांग से लीज पर दिया है। यहां ‘एक देश दो सरकार’ जैसी व्यवस्था है। इसलिए यहां के युवा एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना चाहते हैं। अभी चीन द्वारा नियुक्त कार्यकारी सरकार यहां की शासन व्यवस्था देखता है। मई में यहां की चीन समर्थित सरकार ने एक प्रत्यर्पण बिल लेकर आई। जिसके तहत यहां के लोगों पर मुकदमा दर्ज कर उसे चीन प्रत्यर्पण किया जा सके। हांगकांगवासी इस बिल का विरोध कर रहे हैं। यहां की आबादी 74 लाख है। मई से शुरू हुए युवाओं के इस आंदोलन में 20 लाख से ज्यादा लोग जुट रहे हैं। युवाओं का यह अभूतपूर्व शक्ति प्रदर्शन है। कहा जाता है कि नया विचार, पुराने के विरोध पर ही खड़ा होता है। बदलाव विरोध से ही शुरू होता है। बदलाव चाहे वैचारिक हो, राजनीतिक हो या फिर सामाजिक। हांगकांग के युवा अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, जबकि स्वीडन की एक स्कूली छात्रा स्वेद ग्रेटा थनबर्ग पर्यावरण की रक्षा के लिए आवाज उठा रही है। उसने न्यूयॉर्क में जलवायु परिवर्तन पर शिखर सम्मेलन में एक भावुक भाषण में कहा, ‘यह पूरी तरह से गलत है। मुझे यहां नहीं होना चाहिए था। मुझे महासागर पार स्कूल में होना चाहिए था। आपने अपने खोखले बयानबाजी से मेरे सपनों और मेरा बचपन छीन लिया।’ सम्मेलन में ही उसने विश्व के नेताओं से तत्काल इस पर कार्रवाई करने का अनुरोध करते हुए कहा, ‘हम आप पर नजर रखेंगे।’

वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर यह सम्मेलन युवाओं की अगुवाई में कई लाख लोगों के प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद ही हुआ। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने एक रिपोर्ट में कहा है कि पिछले पांच साल की तुलना में कार्बन उत्सर्जन 20 प्रतिशत बढ़ा है। अब तक रिकॉर्ड में दर्ज सबसे गर्म साल 2014 से 2019 के बीच रहा। दुनिया के नेतृत्वकर्ताओ को इसकी चिंता नहीं है। इस मामले को लेकर विकसित देश, विकासशील देशों को आंख दिखाती है। जबकि इसके लिए विकासशील देश विकसित देशों को ही जिम्मेदार मानते हैं। जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर थनबर्ग की मुहिम ‘फ्राइडे फॉर μयूचर’अगस्त 2018 से शुरू हुई है। तब उन्होंने स्वीडन की संसद के सामने ‘जलवायु के लिए स्कूल हड़ताल’ के बोर्ड के साथ अकेले बैठकर विरोध प्रदर्शन किया था। विरोध प्रदर्शन का उनका तरीका नया था। दुनिया भर के युवाओं और स्कूली छात्रों के साथ वयस्क लोगों ने भी सराहा। न केवल सराहा बल्कि उनके इस प्रदर्शन ने दुनियाभर के युवाओं को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ घर से बाहर निकलने को मजबूर कर दिया। उनसे प्रेरित होकर 150 से अधिक देशों के करीब 40 लाख से अधिक लोगों ने ‘वैश्विक जलवायु हड़ताल’में भाग लिया। इन लोगों ने अपने देश की सरकार के साथ विश्व नेताओं से जलवायु आपदा से निपटने के लिए कार्रवाई की मांग की। पर्यावरण संरक्षण पर आज पूरा विश्व चिंतित है। मगर यह चिंता जमीन पर नहीं दिखती। सम्मेलनों और बैठकों में भाषणों के शब्दों से आज तक यह बाहर नहीं निकल पाया है। वैज्ञानिक बहुत पहले से लगातार चेतावनी दे रहे हैं।

नशामुक्त गांव

एक तरफ जहां सरकार ने ई-सिगरेट को बैन करने का फैसला किया वहीं दूसरी तरफ सहारनपुर में कुछ युवाओं ने मिलकर अपने गांव को नशा मुक्त बनाया है। नशा मुक्ति के लिए देशभर में तरह-तरह की योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन ये योजनाएं कभी सफल नहीं हुई हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के कुछ युवाओं ने मिलकर नशा मुक्ति के लिए मुहिम छेड़ी और वह उसमें कामयाब भी रहे। देवबंद क्षेत्र के गांव मिरगपुर को नशा मुक्त बनाने के नायाब मिसाल पेश की गई है। मिरगपुर के अलावा यहां का एक और गांव भायला भी अब इसी राह पर आगे बढ़ रहा है। इस गांव को नशा मुक्त बनाने के लिए कुछ युवाओं ने मिलकर बीड़ा उठाया। इन युवाओं ने अभियान चलाया कि गांव की किसी भी दुकान पर धूम्रपान का सामान नहीं बिकेगा। अपनी इस नेक पहल में वह कामयाब भी रहे। अब गांव की किसी भी दुकान पर नशे का सामान नहीं बिकता। इन युवाओं को गांववालों का भी साथ मिला।

चेतावनी में भविष्य का संकट है। वैज्ञानिक चेतवानी देते हुए कहते हैं, ‘यदि मनुष्य अभी नहीं सुधरा तो भविष्य में होने वाले नुकसान के लिए उसे तैयार रहना पड़ेगा। वह नुकसान किसी भी रूप में हो सकता है।’ 16 वर्षीय थनबर्ग को इसी वैश्विक आपदा की चिंता है। तभी तो जलवायु पर्यावरण का विरोध करने के लिए उसने साथी की तलाश नहीं की। उन्हें इसकी चिंता थी। वह अकेले निकल पड़ी। हाथ से लिखा बोर्ड लिया। घर से साइकिल ली। साइकिल से स्वीडिश संसद निकल गईं। वहां हाथ का बना बोर्ड लेकर विरोध प्रदर्शन पर अकेले बैठ गई। उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन पर उठाए कदम पर्यावरण को बचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। अधिकतर लोग अब यह जानना चाहते हैं कि आखिर एक नाबालिग बच्ची की सोच को इतना विस्तार कैसे मिला? इसका जवाब यही है कि थनबर्ग अब सिर्फ एक छात्रा नहीं रह गई हैं। बल्कि उनके विचारों ने उन्हें समाज में बहुत प्रतिष्ठित बना दिया है। थनबर्ग का मानना है कि विश्व नेताओं को पर्यावरण बचाने के लिए उस घोड़े की तरह बर्ताव करना चाहिए जो आग में घिरा हो और बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा हो। वह अपने वक्तव्यों में यही कहती हैं कि उस तरह की छटपटाहट किसी में नहीं दिखती। इतनी छोटी उम्र की बच्ची यदि सम्मेलन में खुले तौर पर ऐसी बात करती है तो स्वभाविक है अपने को दुनिया का दिग्गज कहने वालों की नजरें इधर-उधर देखने लगेगी।

पर्यावरण संरक्षण पर आज पूरा विश्व चिंतित है। मगर यह चिंता जमीन पर नहीं दिखती। सम्मेलनों और बैठकों में भाषणों के शब्दों से आज तक यह बाहर नहीं निकल पाया है। वैज्ञानिक बहुत पहले से लगातार चेतावनी दे रहे हैं। चेतावनी में भविष्य का संकट है। वैज्ञानिक चेतवानी देते हुए कहते हैं, ‘यदि मनुष्य अभी नहीं सुधरा तो भविष्य में होने वाले नुकसान के लिए उसे तैयार रहना पड़ेगा।’

थनबर्ग ने बड़े-बड़े दिग्गजों के सामने कहा कि मेरी जैसी बच्चियां और बच्चें पर्यावरण को लेकर आपको आश्वस्त नहीं बल्कि परेशान देखना चाहती है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सिर्फ रैलियां करने भर से कुछ नहीं होने वाला है। पूरे विश्व में अपनी पहचान बना लेने वाली थनबर्ग को नार्वे के 3 सांसदों द्वारा नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया। पिछले वर्ष 2018 में थनबर्ग को पर्यावरण के मुद्दे पर बोलने के लिए स्टॉकहोम में वक्ता के रूप में भी बुलाया गया था। उसी साल दिसंबर में उन्हें संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में भी बुलाया गया। थनबर्ग के विचारों से प्रभावित होकर ही उन्हें 2019 में दावोस में हुई वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम में भी आमंत्रित किया गया था। जहां पर उनके भाषण को सुनकर लोग हैरान रह गए थे। थनबर्ग को इन्हीं कारणों से टाइम मैग्जीन ने वर्ष 2018 की सबसे प्रभावशाली किशोरी के तौर पर शामिल किया था। 105 देशों के स्कूली छात्रों की सहायता से हुई हड़ताल पर उन्होंने कहा कि उन्हें इस हड़ताल से काफी उम्मीदें हैं। वह कहती हैं कि वह और उनके साथ के बच्चे अब ऐसा करने के लिए युवा हो चुके हैं, लेकिन फिर भी सत्ता में बैठे लोगों को इसके लिए गंभीर रूप से काफी कुछ करना चाहिए। थनबर्ग ने अपना मुहिम ‘फ्राईडेज फॉर μयूचर’ और ‘स्कूल स्ट्राइक फॉर क्लाइमेट’ नाम से शुरू किया। थनबर्ग का यह मुहिम एक आंदोलन की तरह है। यह सम्पूर्ण मानव जाति के भविष्य के लिए किया जा रहा है।

हाल ही वैज्ञानिकों ने खबरदार किया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण न केवल विश्व के औसत तापमान में वृद्धि हुई है बल्कि लू की गर्माहट में भी काफी वृद्धि हुई। इस गर्मी को वैज्ञानिकों ने वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा बताया। इन बातों को हल्के में लेने का मतलब है, अपने भविष्य को अंधकार में ढकेलना। क्योंकि शोधकतार्ओं के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण लू से जितनी मौतें 2003 में यूरोप में हुई थीं, 21 वीं सदी के आखिर तक इस लू का तापमान पहले से 4 गुना बढ़कर अधिक हो जाएगा। इससे होने वाली मौतों के आंकड़ों का अंदाज आप खुद ही लगा सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम भी पर्यावरण को बचाने में अपना योगदान दें और थनबर्ग की तरह लोगों को जागरूक करें। दुनिया के इस दो युवा बिग्रेड के तर्ज पर ही भारत में कई युवा सत्ता और अपनी सरकार की नकारापन से आहत होकर खुद ही बदलाव को घर से बाहर निकल पड़े हैं। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद युवाओं का आंदोलन स्वत: स्फूद था। हालांकि वह आंदोलन सड़कों पर विरोध के रूप में हुआ था। लेकिन कुछ युवा बदलाव के लिए खुद आगे आए हैं।


 
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