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सिताब दियारा में नहीं, सिकरौल में जन्मे थे जेपी

10/10/2019

(जयप्रकाश नारायण के जन्मदिवस, 11 अक्टूबर पर विशेष)

मुरली मनोहर श्रीवास्तव
'बा मुद्दत, बा मुलाहिजा होशियार! अपने घरों के दरवाजे बंद कर लो। बंद कर लो सारी खिड़कियां। दुबक जाओ कोने में, क्योंकि एक अस्सी साल का बूढ़ा अपनी कांपती लड़खड़ाती आवाज में, डगमगाते कदमों के साथ हिटलरी सरकार के खिलाफ निकल पड़ा है सड़कों पर।' धर्मवीर भारती की ये रचना ऐसे ही नहीं याद आई। अस्सी के दशक में इसे तब लिखा गया जब इन्दिरा गांधी का हिटलरी गुमान देश को एक और गुलामी की ओर ले जा रहा था और बूढ़े जयप्रकाश (जेपी) ने उसके खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका था। जी हां! 11 अक्टूबर को उसी जेपी की जयंती है। बिहार आंदोलन वाला जेपी, संपूर्ण क्रांति वाला जेपी, सरकार की चुलें हिला देने वाला जेपी, पूरे देश को आंदोलित करने वाला जेपी और सत्ता को धूल चटाने वाला जेपी। जयप्रकाश नारायण एक ऐसा नेता जिसने संपूर्ण क्रांति आंदोलन की न केवल कल्पना की बल्कि उसकी अगुवाई की और अंजाम तक पहुंचाया। संपूर्ण मतलब सामाजिक, राजनीतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक आंदोलन। 
बक्सर के सिकरौल में हुआ था जेपी का जन्म 
बहुत कम लोग जानते हैं कि जयप्रकाश नारायण (जेपी) का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव अनुमंडल के सिकरौल लख पर हुआ था। ब्रिटिश सरकार के अधीन सिंचाई विभाग में उनके पिता हरसु दयाल वहां पदास्थापित थे। साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने 'जयप्रकाश' नामक अपनी पुस्तक में जेपी की जीवनी लिखते हुए बताया है कि उनके दादा बाबू देवकी नंदन लाल अंग्रेजी राज में दारोगा थे। जेपी के पिता हरसु दलाल सिकरौल लख के नहर विभाग में जिलदार के पद पर कार्यरत थे। हरसु दयाल अपनी पत्नी के साथ सिकरौल लख स्थित हाई स्कूल के बगल में विभागीय क्वार्टर में परिवार के साथ रहते थे। ऐसा माना जाता है कि कैमूर के हरसु ब्रह्मधाम में माता-पिता की मन्नत के बाद जेपी का जन्म हुआ था और उनका शुरुआती बचपन अपने पिता के सरकारी क्वार्टर में ही गुजरा था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा-6 तक) सिकरौल में हुई। बाद में वे पढ़ाई के लिए पटना चले गए। वे मेधावी छात्र थे।
पैतृक गांव है सिताब दियारा 
बिहार के छपरा जिले के सिताब दियारा जयप्रकाश का पैतृक गांव है। वहां उनकी स्मृतियों को सहेजने की पूरी कोशिश की गई है। लेकिन उनकी जन्मस्थली को लेकर बिहार और यूपी के सिताब दियारा के बीच विवाद हमेशा से रहा है। हालांकि इन सभी से इतर अगर सही मायने में देखा जाए तो जेपी अपनी कार्यशैली से हमेशा सुर्खियों में बने रहे। सिकरौल लख में जन्मे, सिताब दियारा पैतृक भूमि से प्रसिद्ध हुए जय प्रकाश नारायण देश के लोकनायक बने।
सार्वजनिक जीवन 
अक्टूबर 1920 में जेपी की शादी प्रभावती से हुई। विवाहोपरांत 1922 में वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए। वहां पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए उन्हें रेस्तरां में काम भी करना पड़ा। अध्ययन के दौरान जयप्रकाश कार्ल मार्क्स के समाजवाद से प्रभावित हो गए। 1929 में मां की तबीयत खराब होने की सूचना मिलने पर वे स्वदेश लौट आए। इस बीच उनकी पत्नी प्रभावती कस्तुरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम में रहने लगी थीं। इसके बाद जेपी भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद और अनुग्रह नारायण सिंह द्वारा स्थापित बिहार विद्यापीठ में शामिल हो गए। 1929 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम परवान पर था। उसी वक्त जेपी गांधी-नेहरु के संपर्क में आए। 1932 में गांधी-नेहरु के जेल जाने के बाद जेपी ने कमान संभाल लिया। लेकिन उनको भी उसी वर्ष मद्रास से गिरफ्तार कर नासिक जेल भेज दिया गया। नासिक जेल में उनकी मुलाकात मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, एन. सी. गोरे, अशोक मेहता, एम. एच. दांतवाला, चार्ल्स मास्कारेन्हास और सी. के. नारायणस्वामी जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल में ही उन्होंने चर्चा कर कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सी.एस.पी.) बनाई।
दूरदृष्टि सोच वाले नेता थे जेपी 
राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ जेपी को अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की भी समझ थी। 1934 में चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के हिस्सा लेने का विरोध किया। लोकनायक 1939 में दूसरे विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों का विरोध करते हुए 1943 में गिरफ्तार हुए। तब गांधीजी ने कहा था कि जेपी छूटेंगे तभी फिरंगियों से कोई बात होगी। आखिरकार, 1946 में जेपी जेल से रिहा हुए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हथियारों के इस्तेमाल को अनिवार्य समझा। उसके बाद उन्होंने नेपाल जाकर 'आज़ाद दस्ता' का गठन किया और उन्हें प्रशिक्षण दिया। 19 अप्रैल 1954 में जयप्रकाश नारायण स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे से प्रोत्साहित होकर गया में सर्वोदय आंदोलन से जुड़ गए। 1957 में उन्होंने लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ने तक का मन बना लिया। लेकिन बिहार के छात्रों और युवकों ने भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ 18 मार्च, 1974 को पटना से पूरे देश में आंदोलन की शुरुआत की तो जेपी का आंदोलनकारी मन मचल उठा। वह न सिर्फ आगे आए बल्कि 05 जून 1975 को पटना के गांधी मैदान में विशाल जनसमूह को संबोधित किया। वहां उन्हें 'लोकनायक' की उपाधि दी गई। इसके कुछ दिनों बाद उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान में ऐतिहासिक भाषण देकर देश के विपक्षियों को एकजुट किया। जेपी समाजवादी, सर्वोदयी तथा लोकतान्त्रिक जीवन पद्धति के समर्थक थे। उनके अनुसार समाजवाद एक जीवन पद्धति है, जो मानव की स्वतन्त्रता, समानता, बन्धुत्व तथा सर्वोदय की समर्थक है। समाजवाद आर्थिक तथा सामाजिक पुनर्निर्माण की पूर्ण विचारधारा है। उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं, जिनमें से 'ह्वाई सोशियलिज्म' प्रमुख है।
जेपी आंदोलन का केंद्र में रहा बिहार
सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान हजारों राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उस समय के छात्र नेता के रुप में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, आर. के. सिन्हा, सुशील कुमार मोदी, रवि शंकर प्रसाद, शिवानंद तिवारी, वशिष्ठ नारायण सिंह, नरेंद्र कुमार सिंह, राम जतन सिन्हा और कृपानाथ पाठक प्रमुख थे। इनमें से कई लोगों को चोटें आईं। पुलिस द्वारा किये गए लाठीचार्ज से भीड़ में उत्तेजना फैल गई। भीड़ बेकाबू हो गई। भीड़ किसी नेता के कंट्रोल में नहीं रही। पटना शहर को सेना के हवाले कर दिया गया। आंदोलन के हिंसक होने पर जेपी ने कहा था कि हिंसा और आगजनी से क्रांति नहीं होगी। अपने आंदोलन की दुर्दशा देखकर कुछ छात्र नेताओं ने जेपी से मुलाकात की। जेपी ने कहा कि आंदोलन में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होगा। इस शर्त को आंदोलनकारियों ने माना। जेपी ने बिहार विधानसभा के सदस्यों से सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे देने की अपील की। इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी। उनके खिलाफ चुनाव लड़ चुके समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा के खिलाफ कदाचार का मुकदमा दर्ज कराया था। उधर जयप्रकाश का आंदोलन लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। नतीजतन 25 जून 1975 की आधी रात को इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। जेपी समेत विपक्ष के 600 से अधिक नेता मीसा में बंद कर दिए गए। हजारों लोगों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी। आंदोलन थमता नहीं देख 1977 की जनवरी में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी। इंदिरा गांधी ने यह ऐलान इमरजेंसी पूरी तरह खत्म किए बगैर कर दिया था। इस बीच चार गैर कांग्रेसी दलों जनसंघ, संगठन कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय लोकदल ने मिलकर जनता पार्टी बना ली थी। जेपी की अपील पर लोगों ने जनता पार्टी के लिए उदारतापूर्वक दान दिया जिससे चुनावी खर्च उठाने में सफलता मिली। उस चुनाव में मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ सीपीआई थी तो सीपीएम, अकाली दल और जगजीवन राम के नेतृत्व वाली कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी ने जनता पार्टी के साथ चुनावी तालमेल किया। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को लोकसभा की 295 और कांग्रेस को 154 सीटें मिलीं। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनता पार्टी के कुछ बड़े नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण मोरारजी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। 
जेल में बंद रहने के दौरान ही जयप्रकाश की किडनी खराब हो गई थी। उन्हें मुंबई के जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां वह डायलिसिस पर रहे। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण ने जेपी की चिकित्सा के लिए दिल्ली के लार्ड इरविन अस्पताल (अब लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल) में डायलिसिस की व्यवस्था कराई। बाद में जेपी की सलाह पर पटना के कदमकुआं स्थित उनके आवास पर डायलिसिस की व्यवस्था कराई गई थी जहां 8 अक्टूबर 1979 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। जयप्रकाश को वर्ष 1965 में समाजसेवा के लिए मैगसेसे पुरस्कार दिया गया था, जबकि 1998 में मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया। 
(लेखक पत्रकार हैं।) 


 
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