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मप्र: 53 साल बाद इतिहास की पुनरावृत्ति

20/03/2020

डॉ. अजय खेमरिया
इतिहास के घटनाक्रम अक्सर दोहराए जाते हैं। मप्र की सियासत में फिलहाल यही हुआ। 53 वर्ष पहले नेहरू के सबसे विश्वसनीय और राजनीति के चाणक्य पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र के सियासी रुतबे और हनक को सिंधिया राजघराने ने जमींदोज किया था। 1967 पार्ट-2 मानो 2020 में दोहराया गया और इसबार भी नेहरू गांधी खानदान के सबसे चहेते कमलनाथ की कुर्सी चली गई है। कारण फिर से सिंधिया राजघराना ही बना है। बस पीढ़ीगत अंतर है। पचमढ़ी के अधिवेशन में तबके मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा ने राजमाता सिंधिया को अपमानित करने की कोशिश की थी, राजमाता ने संकल्प लेकर डीपी मिश्रा को सत्ता से बेदखल कर दिया था। राजमाता तब कांग्रेस में ही थीं। कमलनाथ की कुर्सी भी कमोबेश उसी अंदाज में चली गई, माध्यम बने राजमाता सिंधिया के प्रपौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया। संयोग से वे भी कांग्रेस में थे और उन्हें भी डीपी मिश्रा की तर्ज पर कमलनाथ ने सड़क पर उतरने की चुनौती दी थी।
इस सियासी घटनाक्रम को सिंधिया परिवार के इतिहास की उस पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है जो बुनियादी रूप से कांग्रेस वैचारिकी के विरुद्ध रहा है। यह जानना भी आवश्यक है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया ने अपनी राजनीति की शुरुआत जनसंघ के साथ की थी। 1971 में माधवराव सिंधिया जनसंघ के टिकट पर पहली बार गुना से लोकसभा पहुँचे थे। उसके बाद 1977 के आम चुनाव में भी वे जनसंघ की मदद से निर्दलीय जीतकर सांसद बने थे। इससे पहले उनकी मां 1967 में तबके चाणक्य कहे जाने वाले मप्र के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा की सरकार को चुनौती देकर जमींदोज कर चुकी थीं। इसलिये मप्र की सियासत में सिंधिया परिवार और बीजेपी के साथ रिश्ते की केमिस्ट्री पीढ़ीगत कही जा सकती है। यह भी तथ्य है कि बीजेपी ने कभी भी अलग पार्टी रहते हुए भी ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पिता माधवराव सिंधिया को बड़ी चुनावी चुनौती पेश नहीं की। 1996 में नरसिंहराव ने माधवराव सिंधिया को हवाला कांड को आधार बनाकर कांग्रेस का टिकट नहीं दिया था। तब बीजेपी ने विकास कांग्रेस बनाकर ग्वालियर से लड़े माधवराव सिंधिया के विरुद्ध अपना प्रत्याशी ही खड़ा नहीं किया। 1984 में सिंधिया से चुनाव हारने के बावजूद अटल जी ने कभी सिंधिया के प्रति राजनीतिक बैरभाव नहीं रखा। जबकि राजमाता सिंधिया ने बीजेपी और संघ के आधार को खड़ा करने में आर्थिक योगदान भी दिया।
इतिहास साक्षी है कि ग्वालियर राजघराने का आग्रह सदैव कांग्रेस की रीति-नीति से मेल नहीं खाता था। आजादी के बाद पूरे भारत में जब नेहरू और कांग्रेस का डंका बज रहा था तब ग्वालियर रियासत में हिन्दू महासभा की ताकत चरम पर थी। गुना, ग्वालियर, राजगढ़, उज्जैन, इंदौर, मन्दसौर, विदिशा तक हिन्दू महासभा के आगे कांग्रेस खड़ी नहीं हो पा रही थी। कांग्रेस आलाकमान खासकर नेहरू को ग्वालियर रियासत की हिन्दुत्वपरस्ती बहुत खटकती थी। राजमाता सिंधिया की जीवनी के अनुसार आजादी के बाद पंडित नेहरू और सरदार पटेल ग्वालियर आये। नेहरू जब भाषण देकर निबटे तो सभा में गिनती के लोगों ने तालियां बजाई पर जब जीवाजीराव खड़े हुए तो जनता गगनभेदी जिंदाबाद करने लगी। नेहरू इस वाकये से बेहद नाराज हो गए। नेहरू और सिंधिया के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हुए। बेशक नेहरूजी के कहने पर राजमाता सिंधिया ने 1957 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन यह केवल सिंधिया परिवार और नेहरू खानदान के मध्य रिश्तों के सामान्यीकरण का प्रयास भर था। जब इंदिरा गांधी ने राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त किये तो इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाने वालों में माधवराव सिंधिया सबसे आगे थे।
1967 अविभाजित मप्र में डीपी मिश्रा मुख्यमंत्री हुआ करते थे जो अपने अक्खड़ और सख्त मिजाज के लिए बदनाम थे। रजवाड़ों के विरुद्ध उनकी मानसिकता सार्वजनिक थी। तत्कालीन युवक कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन सिंह द्वारा पचमढ़ी में आयोजित युवा कांग्रेस अधिवेशन को मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे, राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी बैठी थीं। मिश्रा ने राजमाता को निशाने पर लेते हुए कहा कि ये राजा-रजवाड़े कभी कांग्रेस और जनता के हितैषी नहीं हो सकते हैं। डीपी मिश्रा बेलौस होकर बोल रहे थे और कुर्सियों पर बैठे दूसरे नेता मुड़-मुड़कर राजमाता सिंधिया को देखते रहे।अपनी आत्मकथा में राजमाता ने इस वाकये को खुद के अपमान की पराकाष्ठा के रूप रेखांकित किया है। इसी पचमढ़ी में डीपी मिश्रा की ताकतवर सरकार को उखाड़ने का संकल्प लेकर राजमाता ने 1967 में देश में पहली संविद सरकार बनाई थी।
53 साल बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लगभग वही कहानी मप्र में दोहरा दी। इसबार निशाने पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह हैं। मप्र देश का अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस में गुटबाजी और आत्मघाती प्रतिस्पर्धा रक्तबीज की तरह समाई हुई है। कमलनाथ सरकार का पतन मप्र और यहां की कांग्रेस को समझने वाले जानकारों के लिए कतई चौकाने वाला नहीं है। बस इतिहास और वर्तमान में अंतर इतना भर है कि आज की कांग्रेस आलाकमान विहीन है लेकिन जब आलाकमान शक्तिशाली भी हुआ करता था, तब भी यहां दलीय अनुशासन कभी नहीं रहा है। जितनी रियासतों और प्रदेशों को मिलाकर मप्र बनाया गया था उतनी ही इलाकाई कांग्रेस यहां जिंदा रही है।
सच्चाई यह है कि कमलनाथ सरकार का जाना तो इसके जन्म के साथ ही तय हो गया था। मंत्रिमंडल गठन राजनीतिक चातुर्य की जगह पट्ठावाद को आगे रखकर किया गया। अल्पमत के बावजूद निर्दलीय और सपा-बसपा विधायकों में से किसी को मंत्री नहीं बनाकर प्रदेश अध्यक्ष के पद पर भी कमलनाथ खुद बने रहे। हर रोज पार्टी लाइन से हटकर नेता बयानबाजी करते रहे और पार्टी अध्यक्ष होने के बावजूद कमलनाथ या आलाकमान ने कोई एक्शन नहीं लिया। जाहिर है मप्र में 15 साल बाद आई कांग्रेस सरकार हर रोज एक तमाशे का अहसास करा रही थी। 7 कैबिनेट मंत्रियों के साथ प्रदेश में दौरा करने ज्योतिरादित्य सिंधिया पहले दिन से ही सरकार के लिए चुनौती देते रहे। दीवारों पर लिखी "अबकी बार सिंधिया सरकार" की इबारत उन्हें लगातार चिढ़ाती रहती थी। जिस तरह पीसीसी चीफ के उनके दावे को दरकिनार किया जाता रहा, उन्हें सड़क पर उतरने की चुनौती दी गई उसने सिंधिया को बगावत पर विवश कर दिया। यानी इतिहास ने 53 साल बाद पुनः पलटी खाई और मप्र में कांग्रेस सरकार का पतन हो गया। दोनों घटनाक्रमों में देशकालिक समानताएं भी है। कमलनाथ भी नेहरू परिवार के विश्वसनीय हैं और 1967 में डीपी मिश्रा भी नेहरू के सबसे खास हुआ करते थे।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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