युगवार्ता

Blog single photo

सीएबी पर अशांत पूर्वोत्तर

02/01/2020

सीएबी पर अशांत पूर्वोत्तर

सुभाष चंद्र

सीएबी को लेकर संसद में सैकड़ों तर्क-वितर्क पेश किए गए, लेकिन जनता न तो केंद्रीय गृहमंत्री की बातों पर पूरा यकीन कर पा रही है और न ही विपक्षी नेताओं की बात से इतेफाक रख रही है।

असम से लेकर मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में लोग सड़क पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। कई जिलों में इंटरनेट आदि की सुविधा बंद कर दी गई है। सोशल मीडिया पर विशेष निगरानी की जा रही है। सुदूर पूर्वोत्तर की हर घटना पर दिल्ली खासकर नॉर्थ ब्लॉक की पैनी निगाह है। हालांकि, केंद्र सरकार और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की ओर से सदन में बार-बार कहा गया है कि पूर्वोत्तर के राज्यों को जो इनर लाइन परमिट सहित अन्य विशेष सुविधाएं प्राप्त हैं, उस पर इस बिल से कोई असर नहीं पडेÞगा। साथ ही, देश के मुसलमानों को इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है।
बावजूद इसके एक बड़े वर्ग का मानना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक लागू होने के बाद पूर्वोत्तर के मूल लोगों के सामने पहचान और आजीविका का संकट पैदा हो जाएगा। पूर्वोत्तर के लोग इस बिल को राज्यों की सांस्कृतिक, भाषाई और पारंपरिक विरासत से खिलवाड़ बता रहे हैं। लोगों का मानना है कि नागरिकता संशोधन बिल के बाद इलाके में अवैध प्रवासियों की संख्या बढ़ जाएगी और इससे क्षेत्र की स्थिरता पर खतरा बढ़ेगा। हालांकि भारतीय संविधान की छठीं अनुसूची में आने वाले पूर्वोत्तर भारत के कई इलाकों को नागरिकता संशोधन विधेयक में छूट दी गई है। छठीं अनूसूची में पूर्वोत्तर भारत के असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम आदि शामिल हैं, जहां संविधान के मुताबिक स्वायत्त जिला परिषद हैं जो स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 में इसका प्रावधान किया गया है। संविधान सभा ने 1949 में इसके जरिए स्वायत्त जिला परिषदों का गठन करके राज्य विधानसभाओं को संबंधित अधिकार प्रदान किए थे। छठीं अनुसूची में इसके अलावा क्षेत्रीय परिषदों का भी उल्लेख किया गया है। इन सभी का उद्देश्य स्थानीय आदिवासियों की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना है। पूर्वोत्तर के राज्यों का सच यही है कि वहां अशांति है। सड़कों पर आगजनी हो रही है। युवाओं का हुजुम विभिन्न राजनीतिक संगठनों के बैनर तले आक्रोशित है। केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहा है। आम जनजीवन पर इसका व्यापक असर पड़ा हैं।
लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई है। 12 दिसंबर को पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी सुभानन चंदा ने एक बयान जारी करके कहा है कि कम से कम 14 ट्रेनों को या तो रद्द कर दिया गया है या गंतव्य स्थान से पहले ही रोक दिया गया है या फिर ट्रेन परिचालन में बाधा को देखते हुए उनके रास्ते बदल दिए गए हैं। बयान में यह भी बताया गया है कि इनमें से आठ ट्रेनों को तो पूरी तरह से रद्द कर दिया गया है, जबकि अन्य को गंतव्य स्थान से पहले ही रोक दिया गया। बता दें, छात्र संघों और वाम-लोकतांत्रिक संगठनों ने 10 दिसंबर को पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किया था। इस दौरान सड़क मार्ग बाधित होने से अस्पताल ले जाते समय दो महीने के एक बीमार बच्चे की मौत हो गई। आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू), नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स आॅर्गेनाइजेशन, वामपंथी संगठनों- एसएफआई, डीवाईएफआई, एडवा, एआईएसएफ और आइसा ने अलग से एक बंद आहूत किया था।
गुवाहाटी के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जुलूस निकाले गए और प्रदर्शनकारियों ने इस विधेयक के खिलाफ नारेबाजी की थी। वहीं, त्रिपुरा में एनईएसओ द्वारा आयोजित बंद में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों ने त्रिपुरा के धलाई जिले के एक बाजार में आग लगा दी। इससे काफी क्षति हुई। गौर करने योग्य यह भी है कि इस बाजार में ज्यादातर दुकानों के मालिक गैर-आदिवासी हैं। हालांकि इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ। प्रशासन की ओर से कहा गया कि बाजार में सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं, लेकिन इस घटना से गैर-आदिवासी लोगों के मन में भय है, जो ज्यादातर दुकानों के मालिक हैं। एक आधिकारिक सूचना में कहा गया कि त्रिपुरा में शरारती तत्वों द्वारा अफवाहों को फैलाने से रोकने के लिए 10 दिसंबर दोपहर दो बजे से 48 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी गई।
जानकारों का कहना है कि अवैध प्रवासियों के लिये नागरिकता संबंधी ये प्रावधान संविधान की छठी अनुसूची में शामिल असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों पर लागू नहीं होंगे। इसके अलावा ये प्रावधान बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत अधिसूचित ‘इनर लाइन’ क्षेत्रों पर भी लागू नहीं होंगे। आपको बता दें कि इन क्षेत्रों में भारतीयों की यात्राओं को ‘इनर लाइन परमिट’ के माध्यम से विनियमित किया जाता है। मौजूदा समय में यह परमिट व्यवस्था अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड में लागू है। इस कानून के साथ यह परमिट व्यवस्था मणिपुर में लागू हो रही है। इस बिल के अंतिम पेज पर इस बिल को लाने की वजह लिखी है। इसमें मुख्य कारण के तौर पर धार्मिक प्रताड़ना को दर्ज किया गया है। यानी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में इस्लाम के अलावा अन्य धर्मों के लोग प्रताड़ित होते हैं तो भारत उन्हें संरक्षण देगा।
इस निष्कर्ष पर भारत कैसे पहुंचा? इस पर बहुत अधिक विवाद है। कुछ लोग तारीख पर भी सवाल उठा रहे हैं, आखिर 31 दिसंबर 2014 ही क्यों? पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को इसके दायरे से बाहर क्यों रखा जा रहा है? विभिन्न जगहों से आने वाले लोगों और पूर्वोत्तर राज्यों को दलदल में फंसाने का डर त्रिपुरा में वास्तविक लग रहा है, जहां आदिवासी आबादी 12 लाख है वहीं बंगाली प्रवासियों की संख्या 28 लाख है। उनका कहना है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो ने उल्लेख किया है कि केवल 31,313 गैर-मुस्लिमों ने अब तक 2015 के गजट नोटिफिकेशन के तहत दीर्घकालिक वीजा के लिए आवेदन किया है जो इन गैर-मुस्लिम प्रवासियों को वास्तविकता में एक मामूली मुद्दा सताए जाने को लेकर बनाता है। आईबी यह भी उल्लेख करता है कि भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने के लिए प्रवेश के समय के दौरान उत्पीड़न के कारणों को देना होगा। हालांकि सीएबी के तहत 31 दिसंबर 2014 की समय सीमा बड़ी हो गई है।
जिन लोगों को उस तारीख तक भारत में प्रवेश करना था वे पहले ही ऐसा कर चुके हैं। फिर इस कानून में इतने बड़े बदलाव पर जोर क्यों जो संविधान का उल्लंघन करता है? इसके अलावा यह स्पष्ट नहीं है कि उन सभी लोगों (अब मुख्य रूप से मुसलमानों) के साथ क्या होता है जिन्हें असम या अन्य जगहों पर नागरिकता से बाहर रखा जाता है या विदेशियों के रूप में पहचान की जाती है। क्या उन्हें तीन पड़ोसी देशों में भेजा जाएगा? कोई भी देश इसे स्वीकार नहीं करेगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को आश्वासन दिया है कि भारत इस तरह की नीति का सहारा नहीं लेगा। फिर क्या लोगों को शेष समाज से अलग रखा जा सकता है और उन्हें हिरासत शिविर में रखा जा सकता है? ऐसा भी नहीं है कि पूरा पूर्वोत्तर धधक उठा है। कई संगठन ऐसे भी हैं, जो शुरुआती समय में विरोध में रहे, लेकिन केंद्र सरकार के रूख के बाद नरम पड़ते गए।

ऐसा भी नहीं है कि पूरा पूर्वोत्तर धधक उठा है। कई संगठन ऐसे भी हैं, जो शुरुआती समय में विरोध में रहे, लेकिन केंद्र सरकार के रुख के बाद नरम पड़ते गए।

नगालैंड में चल रहे हॉर्नबिल महोत्सव की वजह से राज्य को बंद के दायरे से बाहर रखा गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मणिपुर को इनर लाइन परमिट (आईएलपी) के दायरे में लाने की बात कहने के बाद राज्य में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे द मणिपुर पीपल अगेंस्ट कैब (मैनपैक) ने अपने बंद को स्थगित करने की घोषणा कर दी थी। कांग्रेस, एआईयूडीएफ, आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन, कृषक मुक्ति संग्राम समिति, आॅल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन, खासी स्टूडेंट्स यूनियन और नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन जैसे संगठन बंद का समर्थन करने के लिए एनईएसओ के साथ रहा। गुवाहाटी विश्वविद्यालय और डिब्रुगढ़ विश्वविद्यालय ने कल होने वाली अपनी सभी परीक्षाएं टाल दी गई हैं। बता दें कि यह विधेयक अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम में लागू नहीं होगा जहां आईएलपी व्यवस्था है इसके साथ ही संविधान की छठी अनुसूची के तहत शासित होने वाले असम, मेघालय और त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्र भी इसके दायरे से बाहर होंगे।



 
Top