यथावत

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मैं भूलने लगा हूं

24/01/2020

मैं भूलने लगा हूं

राकेश कायस्थ

हते हैं, सुबह के सपने अक्सर सच होते हैं। आज मेरी नींद एक बहुत डरावने सपने के साथ टूटी। मेरे हिंदी के शिक्षक मुझसे पूछ रहे हैं— तुम्हें ‘ऋ’ लिखना क्यों नहीं आता है? गनीमत है कि वह एक सपना ही था। रोजमर्रा के कामकाज में लग गया लेकिन वह सपना रह-रहकर दिमाग पर दस्तक देता रहा। सोचने लगा कि ख्वाब में जो देखा वह कहीं हकीकत तो नहीं? कंप्यूटर इस्तेमाल करते हुए बरसो हो चुके हैं। उंगलियां अपने आप सही अक्षरों तक पहुंचा देती हैं। लेकिन अगर हाथ में कलम थामकर ‘ऋ’ लिखना पड़े तो क्या मैं लिख पाउंगा? ऋषि, ऋतु और ऋण इस अक्षर से बनने वाले तीन महत्वपूर्ण शब्द हमें बचपन में सिखाये गये थे। हिंदी की बहुत बड़ा ऋण है मुझपर। अगर ऋ लिखना नहीं आएगा तो कैसे उतार पाउंगा ये ऋण? इस ख्याल ने ही मुझे पसीना-पसीना कर दिया। आनन-फानन मैंने कलम उठाई और जब कागज पर ‘ऋ’ उतर गया तो महसूस हुआ कि अपनी मातृभाषा से रिश्ता सिर्फ शैक्षणिक नहीं बल्कि अनुवांशिक भी होता है। लगे हाथों मै एक से लेकर दस तक की गिनती भी हिंदी में लिखने लगा। आठ और नौ के बीच पल भर के लिए ठिठका लेकिन सारे अंक कागज पर सही-सही उतर गये। उन गुमशुदा अंकों को पन्ने पर उतारते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने पित्तरों का तर्पण कर रहा हूं।

अगर ऋ लिखना नहीं आएगा तो कैसे उतार पाउंगा ये ऋण? इस ख्याल ने ही मुझे पसीना-पसीना कर दिया। आनन-फानन मैंने कलम उठाई और जब कागज पर ‘ऋ’ उतर गया तो महसूस हुआ कि अपनी मातृभाषा से रिश्ता सिर्फ शैक्षणिक नहीं बल्कि अनुवांशिक भी होता है।

मैं सोचने लगा आखिर बचपन से संजोये बेशकीमती ज्ञान में से हम कितना कुछ भुला चुके हैं। लाख और करोड़ की गिनती पश्चिम में होती ही नहीं है। थाउजेंट के बाद वहां सीधे मिलियन, बिलियन और ट्रिलियन चलते हैं। टाट-पट्टी विद्यालय में पंडित जी से सीखी गणना अचानक कानों में गूंजने लगी। सौ, हजार, लाख, करोड़, अरब, खरब, नील, पद्य, शंख और महाशंख। इसके बाद मैं गिनने लगा हिंदी में महीनों के नाम। चैत, बैसाख, जेठ, आषाढ़, सावन, भादो, आश्विन कार्तिक। उसके बाद क्या.. हाँ याद आया। दादी कहती थीं माघ का महीना सबसे पवित्र महीना होता है। माघ के बाद आता है फागुन यानी होली वाला महीना। कितने रस, रंग और गंध हुआ करते थे, हमारे जीवन में। लेकिन वक्त के साथ पीछे छूटते चले गये। पलाश और टेसू अब भी वैसे ही खिलते होंगे, हरसिंगार के फूल उसी तरह ही झरते होंगे। पपीहा कहीं ना कहीं जरूर बोलता होगा। शहर ना सही लेकिन दूर-दराज बारिश होने पर दादुर जरूर टर्राते होंगे और झींगुर गीत गाते होंगे। जुगनू कहीं ना कहीं उसी तरह चमकते होंगे जिस तरह बचपन में हमारी आंखों में चमकते थे।

बच्चे कहीं ना कहीं तितलियों के पीछे जरूर भागते होंगे। सोचता हूं क्या सुनसान सड़क से कोई चूड़ी वाला या बांसुरी वाला उसी तरह गुजरता होगा, जिस तरह हमारे बचपन में गुजरता था? घूम-घूमकर दही बेचने वाले हवा मिठाई ले लो पुकारने वाले और कलई करने वाले अब भी कहीं होंगे या पूरी तरह गायब हो गये होंगे? जब हमारी स्मृतियों में भी मुश्किल से बचे हैं तो फिर असल में कहां बचे होंगे! बच्चों को कोई कहानी सुनाने बैठता हूं तो हर वाक्य पर रूकना पड़ता है। एक डाकिया था.. सीधे सवाल आता है, डाकिया कौन है? जवाब देता हूं, डाकिया वही होता है, जो घर-घर घूमकर चिट्ठियां पहुंचाता है। अगला सवाल आता है, चिट्टी क्या होती है? ई-मेल वाले जमाने के बच्चों को कोई किस तरह समझाये कि पोस्ट कार्ड मिलने के इंतजार का मतलब क्या होता था। वक्त कुछ ऐसा बदला है कि जो गधा हमारे जमाने में सड़क पर दिखाई देनेवाला एक जानवर हुआ करता था, अब महज एक विशेषण है। चीजें जो हमारे जीवन का हिस्सा हुआ करती थीं, वे बहुत तेजी से मिटती चली जा रही हैं और सिर्फ स्मृतियों में रह गई हैं। लेकिन स्मृतियों का भी क्या भरोसा? डर कहीं गूगल यादाश्त को भी छुट्टी पर ना भेज दे।


 
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