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एससीओ में प्रभाव बढ़ाता भारत

10/07/2019

एससीओ में प्रभाव बढ़ाता भारत


विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड ऑर्डर) बदलाव की प्रक्रिया से गुजरता हुआ दिख रहा है। इस बदलाव में भारत सहित चीन और रूस अपना-अपना स्थान और अपनी भूमिका सुनिश्चित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस दिशा में जो एक सबसे महत्वपूर्ण बात देखी गयी है, वह यह कि क्षेत्रीय संगठन एक इकाई के रूप में देशों में मुकाबले कहीं अधिक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। कारण यह है कि क्षेत्रीय संगठन एक तरफ वैश्विक बहुध्रुवीयता को ताकत प्रदान कर रहे हैं और दूसरी तरह अर्थव्यवस्था का विकेन्द्रीकरण करते हुए क्षेत्रीय विकास का सशक्त प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यही वजह है कि दुनिया के छोटे- छोटे देशों से लेकर महाशक्तियों तक, सभी इन्हें उम्मीदों के मंच के रूप में देख रहे हैं। शंघाई सहयोग संगठन ऐसे क्षेत्रीय संगठनों में एक बेहद प्रभावशाली संगठन है और यूरेशिया में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हुआ दिख रहा है।

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) भारत के लिए केवल अवसरों का क्षेत्र है अथवा इसमें चुनौतियां भी मौजूद हैं? एक सवाल और है कि भारत एससीओ के मंच से एकलदिशीय प्रगतिपथ पर आगे बढ़ता जाएगा या फिर इसे संतुलन और पुनर्संतुलन (बैलेंसिंग एण्ड रिबैलेंसिंग) से भी गुजरना पड़ेगा?

यह आर्थिक शक्ति और राजनीतिक प्रभाव की दृष्टि से दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन तो है ही। कारण यह है कि लगभग आधी मानव पूंजी से सम्पन्न होने के कारण शक्ति और बाजार की दृष्टि से यह दुनिया में सर्वाधिक महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। इसके साथ ही भू-राजनीतिक स्थिति सिक्योरिटी की दृष्टि से इसे दुनिया का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ के रूप में स्थापित करती है। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि भारत इस संगठन में अपनी संभावनाओं को किस प्रकार से तलाशता है और उन्हें पूरा करने की रणनीति अपनाता है ? इस दिशा में आगे बढ़ते समय कुछ सवाल भी उत्पन्न होते हैं। अर्थात शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) भारत के लिए केवल अवसरों का क्षेत्र है अथवा इसमें चुनौतियां भी मौजूद हैं? एक सवाल और है कि भारत एससीओ के मंच से एकलदिशीय प्रगतिपथ पर आगे बढ़ता जाएगा या फिर इसे संतुलन और पुनर्संतुलन (बैलेंसिंग एण्ड रिबैलेंसिंग) से भी गुजरना पड़ेगा ? अप्रैल 1996 को कजाकिस्तान, चीन, किरगिस्तान, रूस और ताजिकिस्तान के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा सीमा क्षेत्रों में गहरे सैन्य भरोसे के लिए एक संधि की गयी थी, यही संधि इस संगठन के आरंभिक रूप यानी शंघाई 5 (शंघाई फाइव) की स्थापना का आधार थी।

24 अप्रैल 1997 को इन देशों द्वारा मॉस्को में एक बैठक में सीमा क्षेत्र में सैन्य बलों में कटौती संधि (ट्रीटी आॅन रिडक्शन आॅफ मिलिट्री इन बॉर्डर रीजन) पर हस्ताक्षर किए गये। मकसद यही था कि सदस्य देश आपसी रक्षा प्रतिस्पर्धा से निकलकर बाहर आ सकें। वर्ष 2001 में उज़बेकिस्तान को शंघाई 5 में शामिल करने के बाद जून 2001 में शंघाई 5 ‘शंघाई सहयोग संगठन’ में परिर्वितत हो गया। इस परिवर्तन के साथ ही सभी छ: सदस्यों ने शंघाई 5 की मैकेनिज्म को बेहतर बनाने हेतु प्रतिबद्धता प्रकट की और उच्च स्तरीय सहयोग के लिए कुछ उद्देश्य सुनिश्चित किये गये। इस अवधि के व्यतीत होने के साथ-साथ इस संगठन ने जहां एक ओर अन्तरराष्ट्रीय सम्बंधों को नये रूप में परिभाषित करने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय सहयोग व सुरक्षा सम्बंधी प्रयासों को नई दिशा भी प्रदान की।

शंघाई सहयोग संगठन और भारत

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ), चीन के नेतृत्व वाला आठ-सदस्यीय संगठन है, जो 2001 में गठित किया गया था। उस समय इसको शंघाई फाइव कहा जाता था, लेकिन उज्बेकिस्तान के शामिल होने के बाद इस समूह को शंघाई सहयोग संगठन कहा जाने लगा। जून 2001 में चीन, रूस और चार मध्य एशियाई देशों कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान के नेताओं ने शंघाई सहयोग संगठन शुरू किया. एससीओ में अब आठ सदस्य देश शामिल हैं – भारत, कजाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान। इन सदस्यों के अलावा, इसमें चार पर्यवेक्षक राज्य और छह संवाद सहयोगी हैं। भारत और पाकिस्तान 2017 में संगठन के पूर्णकालिक सदस्य बने। एससीओ के दर्शन को ‘शंघाई की आत्मा’ के रूप में जाना जाता है। यह सद्भाव पर बल देता है, सर्वसम्मति से काम करता है, एक-दूसरे की संस्कृति का सम्मान करता है, दूसरों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता है और गुटनिरपेक्षता पर बल देता है। एससीओ में वैश्विक आबादी का लगभग 40 प्रतिशत, वैश्विक जीडीपी का लगभग 20 प्रतिशत और दुनिया के भूमि क्षेत्र का 22 प्रतिशत हिस्सा है। एससीओ के तत्वावधान में 2002 में स्थापित क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (आरएटीएस) आतंकवाद-रोधी गतिविधियों के लिए अनिवार्य है, जो सैन्य खुफिया और एससीओ क्षेत्र की सुरक्षा को एकजुट करती है। संघाई सम्मलेन का महत्व केवल मध्य एशिया तक सीमित नहीं है। यह जद्दोजहद विश्व राजनीति में अपने हक को मजबूत करने की लड़ाई है। 20 वीं शताब्दी में ‘ग्रेट गेम थ्योरी’ ब्रिटेन और रूस के बीच एक जद्दोजहद की सामरिक कहानी किताबो में दर्ज है। 21 वीं शाताब्दी में भारत मध्य एशिया में अपनी पकड़ बनाने में बहुत पीछे है। लेकिन वैश्विक समीकरण के बदलाव भारत के लिए नए अवसर के दरवाजे खोल रहे हैं। रूस और चीन के बीच भी सबकुछ ठीक नहीं है। रूस अमेरिका की वजह से इंडो-पैसिफिक में चीन के साथ खड़ा दिखयी देता है, तो मध्य एशिया में रूसी समीकरण भारत के नजदीक हंै। एस .सी. ओ. में भारत की पूर्ण देश की सदस्यता भी रूस के कारण मिली थी। रूस का मकसद चीन की अनियंत्रित शक्ति को रोकने की ही थी, लेकिन चीन ने पाकिस्तान को साथ ले कर भारत को रोकने की कोशिश की है। रूस और भारत के बीच भी तल्खी बढ़ी है। रूस कई मुद्दों पर पाकिस्तान के साथ भी अपनी हमदर्दी दिखा चुका है। इसलिए बिश्केक की यह यात्रा प्रधानमंत्री मोदी के लिए अतयंत ही अहम थी। इस यात्रा का प्रभाव बाद में दिखेगा। भारत की विदेश नीति अब किसी एक देश के कंधो पर टिकी हुई नहीं है। हर मसले अलग अलग हैं। फिर भी चुनौतियां कई हैं। सबसे बड़ी चुनौती चीन की है। चीन भारत की सामरिक और आर्थिक क्षमता को बढ़ने से रोकना चाहता है। हर मुद्दे मसलन सयुंक्त राष्ट्र संघ में स्थायी सदयस्ता और एन. एस.जी. की स्वीकृति में अड़चने डाल रहा है। संकेत हैं कि वह ऐसा करता रहेगा। ऐसे हालत में भारत को रूस के साथ अपने नए सामरिक सोच के साथ चलना होगा। सामरिक सोच के साथ अमेरिकी सामंजस्य को भी ठीक रखना होगा। इसलिए मोदी की बिश्केक यात्रा का महत्व गहरा है। मध्य एशिया के तीन देशों के साथ भारत के सामरिक और सुरक्षा सम्बन्ध भी हैं। वर्ष 2012 मध्य एशिया को जोड़ने की नीति भी चल रही है। मध्य एशिया भारत के लिए एक नया बाजार भी बन सकता है, लेकिन आर्थिक तंत्र का विस्तार तभी होगा जब चीन-पाकिस्तान की जोड़ी को नये सामरिक सोच के द्वारा चुनौती दी जाये। प्रधानमंत्री मोदी इस सोच को लागू करने में कितना कामयाब होते हैं, यह समय बताएगा।

1998 में मॉस्को शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने एक समझौते के माध्यम से सीमा पर सैनिकों की तैनाती को कम करने, गैरआक्र मणकारी नीति का अनुपालन करने तथा सैन्य अभ्यास नहीं करने के सम्बंध में आम सहमति व्यक्त की है। हालांकि धार्मिक उन्माद एवं अन्तरराष्ट्रीय आतंकवाद के सम्बंध में विस्तृत चर्चा सबसे पहले अलमाटी शिखर सम्मेलन में हुयी। उसके साथ ही सदस्य देशों ने मादक द्रव्यों एवं हथियारों की तस्करी तथा संगठित अपराधों पर अंकुश रखने के प्रयासों पर भी गहन विचार विमर्श किया था और सहयोग की संकल्पना पर आधारित संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गये थे। शंघाई सहयोग संगठन ने इस दौरान सैन्य सहयोग, साझा खुफिया तंत्र और काउंटर टेरोरिज्म के मामले में अमेरिका, यूरोपीय संघ, आसियान, सीआईएस और ओआईसी तक अपनी गतिविधियों को विस्तार देने में भी सफलता अर्जित कर ली, जिसके यह संगठन एक न्यूक्लियस की हैसियत में आ गया।

तात्कालिक व दीर्घकालिक रक्षा व सुरक्षा सम्बंधी चुनौतियों से निपटा जा सके, इसके लिए संयुक्त युद्धाभ्यासों (ज्वाइंट ड्रिल्स) की शुरुआत हुई और चीन तथा रूस ने संयुक्त युद्धाभ्यासों को एक रणनीति के तहत विकसित करने की योजना बनायी, जिसे आप वार-गेम का हिस्सा मान सकते हैं। इन युद्धाभ्यासों को शंघाई सहयोग संगठन भले ही पीस मिशन नाम दे रहा हो, लेकिन नाटो इसे अपना प्रतिद्वंद्वी मानने लगा है और पश्चिमी विशेषज्ञ यह निष्कर्ष निकालने लगे हैं कि भविष्य में एससीओ शीतयुद्धकालीन वारसा पैक्ट का उत्तराधिकारी संगठन साबित हो सकता है। इन्हीं अंतर्विरोधों के दौर में अस्ताना (कजाकिस्तान) में भारत को अपने प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ स्थायी सदस्य के रूप में प्रवेश मिला। इस संगठन के साथ भारत की पारी कुछ उद्देश्यों के साथ शुरू हुयी। पहला यह कि भारत को आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी, साइबर सुरक्षा के खतरों और सार्वजनिक सूचनाओं की गतिविधि पर महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी साझा करने का अवसर हासिल होगा और भारत इसके विरुद्ध संयुक्त कार्रवाई को अंजाम दे सकेगा। चूंकि शंघाई सहयोग संगठन काउंटर-टेरेरिज्म और सिक्योरिटी के उद्देश्य से संयुक्त युद्धाभ्यासों का आयोजन करता है, इसलिए भारत को यह महसूस हुआ कि वह आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक फलक पर कार्रवाई करने का अवसर प्राप्त कर ले जाएगा।

भारत का प्रयास होगा कि शंघाई सहयोग संगठन में जब भी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर विमर्श या निर्णय लिए जाएंगे, तो भारत इस परिधि को बढ़ाकर पाकिस्तान और पाकिस्तान आधारित आंतकी संगठनों तक अवश्य ले जाएगा। बिश्केक (किर्गिस्तान) समिट में ऐसा हुआ भी, जब प्रधानमंत्री ने राष्ट्राध्यक्ष परिषद को आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त घोषणापत्र जारी करने के लिए विवश कर दिया। उल्लेखनीय है कि एससीओ की राष्ट्राध्यक्ष परिषद के बिश्केक घोषणा-पत्र में कहा गया है कि सदस्य देशों ने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवादी एवं चरमपंथी कृत्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसके साथ ही इस बात पर बल दिया गया है कि आतंकवाद, आतंकवादी एवं चरमपंथी विचारधारा का फैलाव, जनसंहार के हथियारों का प्रसार, हथियारों की होड़ जैसी चुनौतियां और सुरक्षा संबंधी खतरे सीमा पार प्रकृति के होते जा रहे हैं। इन पर वैश्विक समुदाय को ध्यान देने, बेहतर समन्वय और रचनात्मक सहयोग करने की जरूरत है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि बिश्केक समिट में भारत ने आतंकवाद की जद में पाकिस्तान को और उसके वित्त पोषक के रूप में चीन को लपेटने में कामयाबी हासिल कर ली।

भारत का प्रयास होगा कि शंघाई सहयोग संगठन में जब भी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर विमर्श या निर्णय लिए जाएंगे, तो भारत इस परिधि को बढ़ाकर पाकिस्तान और पाकिस्तान आधारित आंतकी संगठनों तक अवश्य ले जाएगा। बिश्केक (किर्गिस्तान) समिट में ऐसा हुआ भी, जब प्रधानमंत्री ने राष्ट्राध्यक्ष परिषद को आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त घोषणापत्र जारी करने के लिए विवश कर दिया। उल्लेखनीय है कि एससीओ की राष्ट्राध्यक्ष परिषद के बिश्केक घोषणा-पत्र में कहा गया है कि सदस्य देशों ने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवादी एवं चरमपंथी कृत्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता।

यहां यह भी तय हो गया कि अब अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद का राग नहीं चलेगा। अगले उद्देश्य के रूप में देखें तो भारत एशिया में बनने वाली किसी भी एलायंस का हिस्सा बनना चाहता है ताकि एशिया के भविष्य के लिए लिया जाने वाला निर्णय भारत के बिना अंतिम स्थिति तक न पहुंचे। चूंकि शंघाई सहयोग संगठन ‘एलायंस आॅफ एशिया’ के रूप में उभर कर सामने आ रहा है, इसलिए भारत की इसमें निर्णायक भूमिका अपेक्षित भी है और अनिवार्य भी। भारत का अगला उद्देश्य यूरेशियाई अर्थव्यवस्था को भारत की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना प्रतीत होता है। यही वजह है कि शंघाई सहयोग संगठन में स्थायी सदस्यता ग्रहण करने के बाद भारत ने कुछ कदम और भी उठाए। इस दिशा में भारत का पहला कदम रहा चाबहार बंदरगाह (ईरान) को एक्सेस करने का अधिकार प्राप्त करना। चूंकि यह यूरेशियाई आर्थिक क्षेत्र के लिए प्रवेश द्वार (गेट-वे) का काम करेगा, इसलिए भारत इसके जरिए इंटरनेशनल नार्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से जुड़कर यूरेशियाई क्षेत्र के साथ सीधा कनेक्ट हो जाएगा। इन अवसरों के बीच/सापेक्ष आर्थिक गतिविधियों के संरक्षण और आर्थिक लाभांशों को अर्जित करने के लिए शंघाई सहयोग संगठन महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

फिलहाल शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए संभावनाओं से सम्पन्न संगठन है लेकिन कुछ अंतर्विरोध और चुनौतियां भी हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को रणनीतिक ढंग से होमवर्क करने की जरूरत होगी। पहला बुनियादी अंतर्विरोध यह है कि चीन पाकिस्तान के समर्थन में किसी भी मसले पर खड़ा होता रहेगा और बार-बार एससीओ चार्टर के अनुच्छेद 1 में उल्लिखित ‘अच्छे पड़ोसी’ की भावना के आदर को ढाल की तरफ प्रयुक्त करने की कोशिश करेगा। दूसरा यह कि चीन पाकिस्तान को आॅल व्हेदर फ्रेंड बताकर अनक्वालीफाइड मदद देता रहा है और आगे भी इसे जारी रखने की कोशिश करेगा। तीसरा तथ्य यह है कि मॉस्को-बीजिंग की मंशा वांशिगटन को कमजोर करने की है और वे इस संगठन का प्रयोग इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए करना चाहते हैं, जबकि भारत का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है बल्कि भारत वाशिंगटन के साथ मैत्री सम्बंध रखता है और उसके साथ भारत के रणनीतिक रिश्ते हैं। इस स्थिति में भारत को फारवर्ड ट्रैक के साथसाथ् ा रिबैलेंसिंग एक्ट पर भी काम करना पड़ेगा।

सबसे बड़ा अंतर्विरोध यह है कि चीन के ‘बेल्ट रोड इनीशिएटिव’ (बीआरआई) प्रोजेक्ट सम्बंधी विचार के पीछे मुख्य प्रेरक एससीओ ही था और वह अभी भी इसका समर्थन करता है जबकि भारत सीपेक के कारण इसे अपनी सम्प्रभुता का अनादर करने वाला और औपनिवेशिक किस्म का मानता है। एक बात और, भारत एक तरफ मनीला में एक समझौते के जरिए अमेरिका, जापान और आॅस्ट्रेलिया के साथ चतुर्भुज (क्वैड) के रूप में एलायंस करता है जिसका मुख्य लेकिन छुपा हुआ उद्देश्य चीन को एशिया-प्रशांत (विशेषकर दक्षिण चीन सागर) में चीन को घेरना है। दूसरी तरफ शंघाई सहयोग संगठन का छद्म उद्देश्य अमेरिकी विस्तारवादी नीति को रोकना और मध्य-एशिया में उसके प्रभाव को समाप्त करना है। ऐसे में भारत दोनों के बीच सामंजस्य कैसे बिठा पाएगा? कुल मिलाकर एससीओ फोरम तमाम विरोधाभासी हितों (मल्टीपल कान्μिलंिक्टग इंटरेस्ट) का जमावड़ा है, जिसमें भारत को अपने रणनीतिक उद्देश्य सुनिर्धारित कर अपने हितों को तलाशना है। इसके लिए यह आवश्यक है कि पहले भारत अपने आप को महाद्वीपीय शक्ति (कांटिनेंट पावर) अथवा महासागरीय शक्ति (मैरीटाइम पावर) के रूप में स्थापित करे। लेकिन जिस तरह से ंिक्वगदाओ और बिश्केक में भारत का प्रभाव दिखा है, उससे लगता है कि आने वाले समय में लीडर आॅफ एशिया के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा।


 
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