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अति स्वतंत्र कछु बंधन नाही

06/09/2019

वीरेन्द्र सिंह परिहार
अक्टूबर 2010 के एक प्रकरण में सर्वाेच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। इस सम्बन्ध में सर्वाेच्च न्यायालय ने आगे टिप्पणी करते हुये कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों के परिवार के सदस्य और नजदीकी रिश्तेदार वहीं वकालत कर रहे है और वकालत शुरू करने के कुछ वर्षाें में जजों के बेटे और रिश्तेदार वकील करोड़पति बन जाते हैं। हमें खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ जजों की निष्ठा पर सवाल खड़े हो रहे हैं और हमें उसकी शिकायतें मिल रही हैं। सर्वाेच्च न्यायालय इतना तो कह गया, पर ऐसे जजों के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्यवाही करने में वह भी अपने को असमर्थ पाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को ऐसे जजों का तबादला करने के लिये उपाय अपनाने का सुझाव दिया।
निश्चित रूप से तब से अबतक भारतीय न्यायिक क्षेत्र में बहुत पानी बह चुका है। न्यायपालिका में बुनियादी सुधार के लिये मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में सर्वसम्मति से ‘‘न्यायिक नियुक्ति आयोग’’ अधिनियम पारित किया लेकिन लम्बी सुनवाई के बाद सर्वाेच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2015 में उसे इस आधार पर निरस्त कर दिया कि इसमें संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होता है। इस अधिनियम के चलते न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का डर रहेगा, परिणामतः मामला जहाँ का तहाँ रह गया। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची कि केन्द्रीय विधि एवं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को कहना पड़ गया कि सरकार कोई पोस्ट ऑफिस नहीं है। उनके कहने का आशय यह था कि नियुक्तियों को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय के कालेजियम के प्रस्तावों की समीक्षा करने और उन्हें खुली आँखों से देखने का अधिकार सरकार को है। सरकार आँखें बन्द कर कालेजियम के प्रत्येक प्रस्ताव को क्रियान्वित करने को बाध्य नहीं है। कुल मिलाकर सर्वाेच्च न्यायालय और सरकार के बीच अब भी बहुत कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
इसी बीच 29 अगस्त को पटना हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कुमार ने अपने एक फैसले में यह लिखते हुये बवंडर खड़ा कर दिया कि भ्रष्ट जजों को हाईकोर्ट का संरक्षण प्राप्त है। राकेश कुमार एक पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी केपी रमैया जो भ्रष्टाचार के आरोपी हैं, उनके मामले की सुनवाई करते हुये यह बात कही। हाईकोर्ट ने रमैया की जमानत खारिज कर दी थी। सर्वाेच्च न्यायालय में जाने पर भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली थी। इसपर रमैया ने निचली अदालत में नए सिरे से जमानत की अर्जी डाली जो स्वीकार कर ली गई। हाईकोर्ट में इस बात की शिकायत होने पर उक्त एडीजे को मामूली सजा दी गई। जबकि एक स्टिंग ऑपरेशन में भी उनपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। इसी को लेकर राकेश कुमार ने लिखा कि जिस जज के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला साबित हुआ, उसे बर्खास्त न कर मामूली सजा क्यों दी गई? लगता है, हाईकोर्ट ही भ्रष्ट न्यायिक अधिकारियों को संरक्षण देता है। जस्टिस कुमार ने इसके अलावा इस बात को भी उठाया कि जजों के बंगलों के रखरखाव में सरकारी धन का दुरूपयोग क्यों ? यह बात अलग है कि राकेश कुमार की उपरोक्त टिप्पणियों के तत्काल बाद पटना हाईकोर्ट की 11 सदस्यीय फुल बेंच ने यह कहते हुये कि इससे न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिष्ठा गिरी है, यहाँ तक कि उनके आदेश से न्यायपालिका कलंकित हुई है, राकेश कुमार की टिप्पणियों को विलोपित कर दिया गया। इतना ही नहीं उन्हें न्यायिक कार्याें से भी पृथक कर दिया गया। अभीतक न्यायपालिका ऐसा कार्यपालिका या विधायिका के साथ करती थी, पर अब सच्चाई सामने आने पर न्यायपालिका के कार्याें पर ही कुठाराघात करने से नहीं झिझक रही है। सच्चाई यह है कि इस तरह से पटना हाईकोर्ट द्वारा एक ज्वलंत सच्चाई पर पर्दा डालने का प्रयास किया जा रहा है।
यह बहुत बड़ी बिडम्बना है कि मात्र भारत ही एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है, जहाँ कालेजियम प्रणाली में जज ही जजों की नियुक्ति, स्थानान्तरण और पदोन्नति करते हैं, जबकि मूलतः हमारा संविधान अमेरिकन संविधान की तर्ज पर चेक एण्ड बैलेंस अर्थात सन्तुलन और निरोध पर आधारित है। तात्पर्य यह कि शासन के किसी भी अंग को निर्बाध स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। जहाँ तक कार्यपालिका का सवाल है, उसका नियंत्रण व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका दोनों ही करते हैं। इसी तरह से व्यवस्थापिका अर्थात संसद के असंवैधानिक कानूनों एवं कृत्यों को विधि विरुद्ध घोषित करने का अधिकार न्यायपालिका के पास सुरक्षित है। सवाल यह कि यदि न्यायपालिका में बैठे लोग मनमानी करें, अन्याय एवं भ्रष्टाचार में लिप्त हों, तो उसका उपचार क्या है? उच्च न्यायपालिका यानी सर्वाेच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को मात्र संसद द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पारित कर ही हटाया जा सकता है, जो कि अत्यन्त दुरूह प्रक्रिया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभीतक किसी भी जज के विरूद्ध यह प्रस्ताव नहीं पारित हो सका है।
कहावत है ‘‘सम्पूर्ण सत्ता सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है।’’ न्यायपालिका के रवैये और कृत्यों को देखकर बेझिझक यह कहा जा सकता है कि न्यापालिका सम्पूर्ण शक्तियाँ अपने पास रखना चाहती है। जैसा कि तुलसीदास ने लिखा- ‘‘अजि स्वतंत्र कहु बंधन नाही; करहूं उहै जो तुम्हही सुहाई।’’ यही न्यायपालिका की स्थिति हो गई है। लोग न्यायालय अवमानना के डर से भले ही खुलकर न बोल पाएं, पर जजों की स्वेच्छाचारिता एवं भ्रष्ट कारनामों के किस्से आए दिन सुनने को मिलते रहते हैं। निचली अदालतें तो उतनी ही भ्रष्ट हैं, जितनी पुलिस, यह तथ्य कई बार अधिकृत सर्वे में बताई जा चुकी है। जिसकी ओर इशारा राकेश कुमार ने अभी हाल में किया है। ऐसा इसलिए कि उच्च न्यायालय में बैठे न्यायाधीशों का इन्हें संरक्षण प्राप्त रहता है। उच्च न्यायालय में जो जज नियुक्ति किए जाते हैं, वह जजों के रिश्तेदारों को वकालत में पूरा संरक्षण देते हैं और उन्हें जज नियुक्त कराने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इस तरह से न्यायपालिका में भी परिवारवाद एवं भाई-भतीजावाद का विषाक्त प्रभाव व्याप्त है।
अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि न्यायपालिका को ताकतवर तो होना चाहिए, पर उसे इसके साथ एकदम सही भी होना चाहिए। उन्होंने न्यायाधीशों से कहा था कि यदि आप गलती करते हैं तो कोई समाधान नहीं है, क्योंकि आपसे ऊपर कोई नहीं है। इसीलिए उन्होंने न्याय प्रणाली की खामियों और समस्याओं को दूर करने के लिये एक आंतरिक तंत्र विकसित करने पर जोर दिया था। पर विडम्बना यह कि न्यायपालिका स्वतः अपनी ही बातों पर गम्भीर नहीं है। न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक घोषित करते वक्त सर्वाेच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को जजों की नियुक्ति के सम्बन्ध में एम.ओ.पी. बनाने को कहा था, जिसे केन्द्र सरकार जुलाई 2016 में ही प्रस्तुत कर चुकी है। पर एम.ओ.पी. के प्रारूप पर बार-बार आपत्ति जताकर जजों की नियुक्तियों में सर्वाेच्च न्यायालय सारे अधिकार अपने पास रखना चाहती है। जैसा कि सरकार चाहती है कि किसी सेशन जज को हाईकोर्ट का जज बनाने के पहले हाईकोर्ट का कालेजियम उसके पन्द्रह साल के कामकाज का मूल्यांकन कर उसका ब्यौरा अपनी सिफारिश के साथ संलग्न करे। जबकि न्यायपालिका इस मामले में मात्र वरिष्ठता की जिद पकड़े हुये है। सरकार यह भी चाहती है कि जजों के विरुद्ध आनेवाली शिकायतों के निपटारे के लिये एक स्थायी, पारदर्शी और सक्षम सचिवालय बनाया जाय पर न्यायपालिका अपने को कहीं भी युक्ति-युक्त नियंत्रण में रखने को तैयार नहीं। जबकि तीन भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश भी स्पष्ट तौर पर कह चुके हैं कि जजों की नियुक्ति के समय उनके गुणों एवं दुर्गुणों पर स्वतंत्र एवं खुली बहस होनी चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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