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अयोध्या भूमि-विवाद फैसले के बाद शांति जरूरी

07/11/2019

प्रमोद भार्गव

योध्या के मंदिर-मस्जिद भूमि विवाद से जुड़े बड़े और बहुप्रतीक्षित फैसले के पहले सामाजिक व सांप्रदायिक सद्भाव बनाये रखने की कोशिशें तेज हो गई हैं। यह अच्छी बात है कि ये कोशिशें देशव्यापी एवं बड़े पैमाने पर शुरू हुई हैं। मंदिर और मस्जिदों से जुड़ी धार्मिक समितियां सभाएं कर शांति की अपील कर ही रही हैं। गुरूद्धारे और चर्चों से जुड़े संगठन भी शांति की मुहिम में जुट गए हैं। इस नाते भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम नेता व धर्मगुरू कह रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को हार और जीत की बजाय न्यायिक निर्णय के तौर पर देखा जाए। लिहाजा फैसला किसी के भी पक्ष में आए, तब न तो जीत का जश्न मनाने की जरूरत है और न ही हार पर हायतौबा मचाकर अदालत और सरकार को कठघरे में खड़ा करने की आवश्यकता है। दारूल उलूम, देवबंद उलेमा की संस्था आइमा ने भी लोगों से शीर्ष न्यायालय के फैसले का स्वागत करने की अपील की है। उत्तर-प्रदेश सरकार तो राज्य में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने में जुटी ही है। देश के अन्य राज्य भी धारा-144 लागू करके स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखने के उपाय करने लगे हैं। इसी क्रम में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकबी ने कई मुस्लिम विद्वान व धर्म गुरूओं के साथ बैठकर शांति व अमन पर कारगर चर्चा की है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने अदालत के प्रस्तावित फैसले का सम्मान करने की अपील करते हुए छात्रों से कहा है कि  सोशल मीडिया की अफवाहों से दूर रहें और संयम बरतें।
धार्मिक आस्थाओं के टकराव के बीच शांति की अपीलें जरूरी थीं। क्योंकि, हमारे यहां विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े आनुषांगिक संगठन और समाचार चैनलों की बहसें, लोगों की धार्मिक भावनाओं को उकसाने का काम अक्सर करते रहते हैं। दरअसल मुस्लिम शासक बाबर के समय से ही यह स्थल विवाद का बड़ा कारण बना हुआ है। इसीलिए हिन्दू पक्ष के संगठन जहां 'मंदिर वही बनाएंगे' नारा देकर यह प्रकट करते आ रहे हैं कि भगवान श्रीराम का जन्म इसी विवादित स्थल पर हुआ था और यह स्थल तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई थी। चूंकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम हिंदुओं के ही नहीं अन्य धर्मावलंबियों के लिए भी मर्यादा एवं आदर्श का प्रतीक हैं। इसलिए यह राम से जुड़ी आस्था का प्रमुख स्थल है। लिहाजा इस पर हिंदुओं का हक बनता है। दूसरी तरफ, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि इस स्थल का एक हिस्सा इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इबादत का माध्यम रहा है। वे दावा करते हैं कि 'एक बार जहां मस्जिद बना ली जाती है, जमीन का वह हिस्सा मुस्लिमों का ही नहीं अल्लाह का भी हो जाता है।' आस्थाओं व विश्वासों के इन्हीं टकरावों के चलते इस मसले को बातचीत के आधार पर सुलझाने की जितनी भी कोशिशें रही हैं, उनके कोई परिणाम नहीं निकले। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी निगरानी में मध्यस्थता की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। लिहाजा अदालत को इस मामले के निराकरण के लिए लगातार 40 दिन तक सुनवाई करनी पड़ी और अब यह फैसला 16 नवम्बर तक हर हाल में सुनाया जाना है, क्योंकि 17 नवम्बर को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
इस फैसले पर देश की ही नहीं दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। इसलिए जो भारत विरोधी देश व राष्ट्रविरोधी असामाजिक तत्व हैं, उनकी मंशा है कि आपसी सौहार्द्र में खलल पड़े और देश सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस जाए। इस तरह की कोशिशें तब और तेज हो गई हैं, जब जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35-ए को संसद में विधेयक लाकर खत्म कर दिया गया। इसके बाद से ही पाकिस्तान, चीन, इंडोनेशिया एवं तुर्की यह मंशा पाले हुए हैं कि भारत में आंतरिक स्तर पर कुछ ऐसा हो, जिससे हिन्दू-मुस्लिमों के बीच सद्भाव बिगाड़ने की तस्वीर सामने आए। जबकि, नरेन्द्र मोदी सरकार की यह कोशिश रही है कि देश की राजनीति किसी भी प्रकार के तुष्टीकरण से दूर रहे और महिलाओं समेत देश के हर वर्ग का सशक्तिकरण हो। लिहाजा, जनमानस को समझने की जरूरत है कि देश और देशभक्ति सर्वोपरि है। वैसे भी एक राजा के रूप में भगवान राम के जो आदर्श रहे हैं, वे न तो किसी दूसरे देश पर आक्रमण की प्रेरणा देते हैं और न ही हिंसा के जरिये किसी की संपत्ति हड़पने के पक्षधर रहे हैं। वे राम ही थे, जिन्होंने रावण द्वारा सीता हरण के बाद लंका पर चढ़ाई के लिए अयोध्या या जनकपुरी से सेना बुलाने की बजाय जो वनवासी पंचवटी से लेकर किष्किन्धा तक फैले हुए थे, उन्हें संगठित किया, सैन्य प्रशिक्षण दिया और लंका पर जीत हासिल कर ली। राम इन्हीं वनवासियों के कारण ही भगवान कहलाए। राम के इसी आदर्श की पालना अयोध्या में रामलला के मुख्य साधक आचार्य सत्येंद्रदास और बाबरी मस्जिद के पक्षकार मोहम्मद इकबाल अंसारी मठ और धर्मशालाओं में जाकर कर रहे हैं। ये दोनों नगर के रहवासियों से न्यायालय के फैसले को राम का ही फैसला मानने की अपील कर रहे हैं।
दरअसल, न्यायालय के आदेश का सम्मान ही संविधान का सम्मान है। हम इसी के अनुशासन से बंधे हैं। हमारा संविधान इतना उदार और व्यापक स्वरूप वाला है कि उसमें वैश्विक धर्मों के साथ सभी भारतीय धर्मों का आदर समाहित है। शायद इसीलिए मुस्लिम पक्षकारों और उनके वकीलों का हमेशा कहना रहा है कि देश की न्याय प्रक्रिया पर हमें पूरा भरोसा है। लिहाजा न्यायालय का जो भी निर्णय आएगा, उसका हम सम्मान करेंगे। बाबरी मस्जिद के पक्षकार मोहम्मद इकबाल अंसारी, हाजी महबूब, सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयार जिलानी एवं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारुकी ने भी फैसले का सम्मान करने का भरोसा जताया है। इनका कहना है कि यदि फैसला राम जन्म स्थल के पक्ष में आता है तो हमें मान लेना चाहिए कि अल्ला-ताला की यही इच्छा है। अब यही अपील आरएसएस कर रहा है। वैसे भी देश के सभी नागरिकों को यह मानकर चलना चाहिए कि कोई भी देश किसी एक नागरिक, एक संस्था, एक संगठन अथवा किसी एक धर्म के बूते प्रगति नहीं करता। आजादी की लड़ाई में भी हिन्दू-मुस्लिम कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। इसी के परिणामस्वरूप हमने स्वतंत्रता प्राप्त की थी। इसलिए जरूरी हो जाता है कि सभी धर्म और समाज अपने भेद और निजी हित भूलकर फैसले को स्वीकार करें। शायद संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसीलिए हमें चेतावनी देते हुए कहा था कि 'हमारी आपस की लड़ाई के कारण विदेशी हमलावर हमें पराजित करते रहे। नतीजतन हम एक लंबी अवधि तक गुलाम बने रहे।' इसीलिए जरूरी हो जाता है कि फैसला जो भी आए, अड़ियल रूख कोई धर्मावलंबी न दिखाए। फिलहाल इस मसले पर हिन्दू और मुस्लिमों के बीच जो एकजुटता और परस्पर सद्भावना दिखाई दे रही है, वह यह जताने वाली है कि निर्णायक घड़ी में सभी लोग धैर्य और विवेक से काम लेते हुए फैसले को उदार मन से स्वीकार करेंगे।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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