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पवार की नजर फिर पॉवर पर!

11/12/2019

पवार की नजर फिर पॉवर पर!


ड़े पेच हैं शरद पवार के व्यक्तित्व में। इतने कि एक सुलझाने की कोशिश में कई और उलझ जाते हैं। इसे समझने के लिए आपातकाल की समाप्ति के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पर नजर डालनी होगी। साल 1978 में शरद पवार ने अपने नेता और तब के धुरंधर कांग्रेसी वसंत दादा पाटिल के साथ वही किया था, जो शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने उनके साथ किया। शरद पवार वसंत दादा का बहुत सम्मान करते थे। साल 1977 के लोकसभा चुनाव में हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शंकर राव चह्वाण ने इस्तीफा दिया और वसंत राव पाटिल मुख्यमंत्री बने। पवार ने पहले कांग्रेस (अर्स) और कुछ ही दिन बाद उसे भी छोड़ जनता पार्टी का हाथ थाम लिया था। इसका लाभ भी उन्हें मिला। शरद पवार देश के इतिहास में सबसे कम उम्र (34 साल) के मुख्यमंत्री बने। करीब 40 साल बाद उन्हीं के भतीजे ने ‘बगावत’ कर भाजपा का दामन थामा तो एकबारगी यही कहा गया कि आज मराठा राजनीति का यह छत्रप ‘अपने’ से ही हार गया। पवार के व्यक्तित्व के पेच यहीं नहीं सुलझ जाते। जब अजीत ने डिप्टी सीएम की शपथ ली, तो कांग्रेस के कुछ खेमों से उन पर शक किया गया। करीब एक महीने के घटनाक्रम में पवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिल आये। कहा गया कि उन्होंने किसानों के सवील पर पीएम को एक ज्ञापन दिया।

यह मराठा छत्रप पूरी तरह स्वस्थ नहीं है, फिर भी जरूरत पड़ने पर पार्टी और परिवार के लिए कई दिन बिना थके, बिना रुके लगा रह सकता है। सवाल है कि पार्टी और परिवार को बचाकर शरद पवार की नजर फिर से दिल्ली की ओर तो नहीं है।

दिल्ली के 6,जनपथ का यह निवासी दो बार सोनिया गांधी से मिलकर मुंबई के सिलवर ओक वाले बंगले पर आया ही था कि राजनीति तेजी से बदल गई। कांग्रेस-एनसीपी के साथ होने की बार-बार दुहाई दे रहे पवार पर आरोप लगे कि उनकी सहमति के बिना अजीत भाजपा के खेमे में नहीं जा सकते। ऐसा सोचने वालों के सामने तर्क भी था। किसी ने कहा कि लोगों के मुद्दे पर पीएम से मिलने पवार अकेले ही क्यों गये। यह काम तो प्रतिनिधिमंडल के साथ हुआ करता है। याद किया गया कि पवार का भाजपा प्रेम नया नहीं है। अभी पांच साल पहले ही तो उन्होंने उस समय भाजपा का साथ देने का एलान कर दिया था, जब शिवसेना ने अपने साथी दल के साथ सरकार बनाने में आनाकानी की थी। अलग बात है कि इसके बाद शिवसेना ने सरकार में आने का फैसला कर लिया था। लगा कि पवार एक बार उससे भी आगे जाकर भाजपा का साथ दे रहे हैं। पेच अभी उलझे ही हैं। अजीत जब ‘घर’ लौट आये हैं, आज भी इस पर चर्चा जारी है कि कहीं अजीत का फडणवीस का साथ जाना शरद पवार का ही गेम तो नहीं था। पवार ने अजीत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। उलटे शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि अजीत पवार ने बड़ा काम किया है। एनसीपी के नवाब मलिक ने भी जोड़ा कि अजीत ने अपने चाचा से माफी मांगी है और उन्हें बड़ा पद दिया जायेगा। बात चर्चा भर की भी हो सकती है।

शरद पवार ने पार्टी और परिवार को कैसे संभाल लिया, इस पर भी उनके रहस्यमयी व्यक्तित्व के हिसाब से ही चर्चा होती रहेगी। संक्षेप में यह देखना होगा कि पवार ने ‘पॉवर’ के लिए पहले भी बहुत कुछ किया है। जनता पार्टी के साथ जाकर सीएम की कुर्सी हासिल करने वाले इस नेता ने राजीव गांधी के समय कांग्रेस में वापसी कर ली।

यहां याद करना चाहिए कि फडणवीस की दो सदस्यीय नई सरकार में पवार ने डिप्टी सीएम की शपथ ली तो उनकी बहन और शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले ने कहा कि पार्टी और परिवार, दोनों टूट गये। बहरहाल, शरद पवार ने पार्टी और परिवार को कैसे संभाल लिया, इस पर भी उनके रहस्यमयी व्यक्तित्व के हिसाब से ही चर्चा होती रहेगी। संक्षेप में यह देखना होगा कि पवार ने ‘पॉवर’ के लिए पहले भी बहुत कुछ किया है। जनता पार्टी के साथ जाकर सीएम की कुर्सी हासिल करने वाले इस नेता ने राजीव गांधी के समय कांग्रेस में वापसी कर ली। फिर विदेशी मूल के सवाल पर जिस सोनिया गांधी का उन्होंने साथ छोड़ा था, उन्हीं के नेतृत्व में यूपीए वाली सरकार में वे शामिल भी हुए। इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनके शिकवे भी रहे। पवार ने अपनी पुस्तक ‘लाइफ आॅन माई टर्म्स: फ्रॉम ग्रासरूट्स एंड कॉरीडोर्स आॅफ पावर’ में बताया है कि 1991 में 10 जनपथ के ‘स्वयंभू वफादारों’ ने सोनिया गांधी को इसके लिए राजी कर लिया था कि उनकी (पवार) जगह पीवी नरसिंहराव को प्रधानमंत्री बनाया जाए। यहां सवाल यह भी बना रहेगा कि क्या इस मराठा छत्रप की नजर एक बार फिर दिल्ली की कुर्सी पर है।


 
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