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गैर जरूरी सिजेरियन डिलीवरी का बढ़ता चलन घातक

13/08/2019

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा 
डॉक्टरों को आमतौर पर धरती का भगवान कहा जाता है। वह जीवन बचाने का काम करते हैं। वही डॉक्टर अगर धन कमाने के लिए गैरजरूरी सिजेरियन डिलीवरी कराने लगें तो इसे उचित नहीं माना जा सकता। 'टू मच केयर' अभियान के तहत आईआईएम अहमदाबाद द्वारा देशभर में प्रसूति पर किए गए अध्ययन ने इस तरफ ध्यान खींचा है। अध्ययन की रिपोर्ट बताती है कि सब कुछ ठीक (नार्मल) होने के बावजूद निजी अस्पतालों में प्रायः सी-सेक्शन (सिजेरियन डिलीवरी) को प्राथमिकता दी जाने लगी है। इसमें दुःखद बात यह कि सामान्य डिलीवरी का जो खर्चा होता है सिजेरियन में वह लगभग दोगुना हो जाता है। ऐसे में अधिक आय के लिए निजी चिकित्सालयों द्वारा सिजेरियन डिलीवरी को प्रमुखता दी जाने लगी है। यह सब तो तब है जब चिकित्सक इस बात को भलीभांति जानते हैं कि सी-सेक्शन के कारण मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। रिपोर्ट में यह तथ्य भी उभर कर आया है कि सरकारी चिकित्सा केन्द्रों की तुलना में निजी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी का आंकड़ा लगभग कई गुणा है। सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव का आंकड़ा काफी कम है। निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा सरकारी से कई गुणा अधिक है। मतलब साफ है निजी चिकित्सालयों में केवल पैसा कमाने के लिए सिजेरियन डिलीवरी को प्राथमिकता दी जाती है। खास बात यह है कि चिकित्सालयों द्वारा प्रेगनेंसी से लेकर डिलीवरी तक गर्भवती महिला को परीक्षण में रखा जाता है। सोनोग्राफी व अन्य जांचें होती रहती हैं। अधिकांश मामलों में डिलीवरी के ठीक पहले तक डॉक्टरों द्वारा यही कहा जाता है कि सब कुछ सामान्य है। फिर डिलीवरी के लिए चिकित्सालय में लेकर जाते ही पता नहीं कैसे सब कुछ असामान्य हो जाता है। पचास तरह के डर दिखाए जाते हैं। रिस्क नहीं लेने की बात कही जाती है। हो सकता है कुछ मामलों में यह सही भी हो पर जब आंकड़ा अधिक सामने आता है तो दाल में काला नजर आता है। क्या केवल और केवल पैसा कमाना ही निजी चिकित्सालयों का धर्म रह गया है? कहने को सरकार ने संस्थागत प्रसव के लिए जनचेतना जागृत की है। अच्छा माहौल बनाया है। सरकारी चिकित्सालयों में डिलीवरी कराने पर प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है। इस सबके बावजूद सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत के कारण लोगों का झुकाव निजी चिकित्सालयों की ओर अधिक होता जा रहा है। 
रिपोर्ट में बताया गया है कि इलाज महंगा होने में स्वास्थ्य बीमा का भी बड़ा योगदान है। बीमा के तहत कैशलेस सुविधाएं दी जाने लगी हैं। नतीजतन डॉक्टर महंगे इलाज को प्राथमिकता देने लगे हैं। उन्हें मरीज की भलाई अथवा सेहत से मतलब नहीं रह गया है लेकिन इलाज के नाम पर बेवजह पेट फाड़ देना भी बुद्धिमता नहीं है। उससे शरीर कमजोर हो जाता है। भविष्य में कई दूसरी बीमारियां होने लगती हैं। चिकित्सा को सेवा का दर्जा दिया गया है। सेवा को धंधा बनाना कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। आज समाज में नैतिकता की बात हर कोई करता रहता है। यह कौन-सी नैतिकता है कि चिकित्सा क्षेत्र को कारोबार बना लिया जाए? बेहतर इलाज के लिए लोग निजी अस्पतालों का रुख करते हैं पर वहां जाते ही जांच के नाम पर और एक-दूसरे डॉक्टरों की विशेषज्ञ राय के नाम पर लूट होने लगती है। जब डॉक्टर अच्छी तरह से जानते हैं कि सी-सेक्शन से होने वाले प्रसव से मां और बच्चे दोनों की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे स्तनपान कराने में देरी, शिशु का वजन कम होना और सांस लेने में भी तकलीफ आदि होती है। बावजूद बेवजह सिजेरियन को वरीयता देना कहां की समझदारी मानी जा सकती है। निजी अस्पतालों को भी अपनी आचार संहिता बनानी चाहिए और उसका कड़ाई से पालन करना चाहिए। सरकार और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को भी इस पर ध्यान देना चाहिए आखिर पैसा कमाना ही चिकित्सा का एकमात्र ध्येय उचित नहीं माना जा सकता। यह अपने आप में विचारणीय हो जाता है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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