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‘एप पुत्र’ के हाथ में ऐप्प

22/08/2019

‘एप पुत्र’ के हाथ में ऐप्प





विकास बहुत जरूरी चीज है। अगर अनुवांशिक विकास नहीं हुआ होता तो मैं बतरस नहीं लिख रहा होता, बल्कि किसी पेड़ की फुनगी से लटकता फल तोड़ रहा होता। आप भी पढ़ नहीं रहे होते बल्कि इस डाल से उस डाल तक कुंलाचे भर रहे होते। विकास नहीं होता तो हम सब इंसान बनते ही नहीं ‘एप’ के ‘एप’ ही रहते। चिंपैजी, गिब्बन, ओरेंगे उटन और गोरिा जैसे दुम रहित वानरों के समुदाय को ‘एप’ कहते हैं। धारणा है कि कालक्रम में उन्ही से विकसित होकर मानव जाति बनी। मानव यानी इस धरती की सबसे बुद्धिमान प्रजाति। अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके मानव ने कई अनोखे काम किये जिनमें एक-दूसरे को मिटाने के लिए परमाणु बम का आविष्कार भी शामिल है।

अब ‘एप पुत्र’ के हाथों में एक नया और अनूठा हथियार लग गया है, जिसे ‘ऐप्प’ के नाम से जाना जाता है। ‘एप’ और ‘ऐप्प’ दोनों शब्द सुनने में एक जैसे लगते हैं लेकिन दोनों में अंतर है। ऐप्प दरअसल ‘एप पुत्रों’ का वह आविष्कार है, जिसके बिना उनका जीवन चल नहीं सकता। व्यापारिक लेन-देन से लेकर लगाई-बुझाई तक का सारा काम आजकल ऐप्स के जरिये ही होता है। उठते-बैठते, सोते और जागते आजकल एक ही बात सुनने को मिलती है- ‘‘एक नया ऐप्प मार्केट में आया है, बहुत कमाल का है, तुमने डाउनलोड किया या नहीं।’’ ऐप्प की दुनिया अब व्हाट्स ऐप्प से बहुत आगे निकल चुकी है। फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम को भी भूल जाइये। अब ऐस-ऐसे ऐप्प आ चुके हैं, जो ‘एप पुत्रों’ के दिमाग पर राज कर रहे हैं। मानव निर्मित ऐप्प इंसानों को नचाते हैं, हंसाते हैं- रूलाते हैं और कई बार तो आत्महत्या तक के लिए मजबूर कर देते हैं। पोकोमैन एप्प आया तो देश की आधी आबादी पागलों की तरह उसके पीछे भागने लगी। ब्लू व्हेल जैसे गेमिंग ऐप्प के उकसावे में आकर कई किशोरों ने अपनी जिंदगी तक खत्म कर ली।

भारत सरकार ने एक दो नहीं बल्कि 42 ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है। लेकिन मजाल है कि ‘एप पुत्रों’ का ‘ऐप्प प्रेम’ कम हो जाये। बाजÞार में जो नया वाला ऐप आया है, वह सचमुच कमाल का है। यह किसी भी जवान को पलभर में बूढ़ा बना देता है। बूढ़ा इस संसार में कोई नहीं होना चाहता। प्राचीन काल के राजा चिर-यौवन की कामना के लिए तप करते थे। मृत्यु और बुढ़ापे के दुख ने युवा सिद्धार्थ को इस तरह विचलित कर दिया था कि वे राजपाट छोड़कर ज्ञान की खोज में निकले और बुद्ध हो गये। बुढ़ापा इंसान का सबसे बड़ा डर है और जवानी सबसे बड़ी कामना। इसलिए बूढ़े को जवान बनाने वाली इंडस्ट्री सदियों से फलती-फूलती आई है।

हर सड़क, गली और नुक्कड़ पर खोई हुई जवानी लौटाने वाले विज्ञापन देखे जा सकते हैं। जिस समाज में असली उम्र पूछने पर रिश्ते हमेशा के लिए खत्म हो जाते हों, वहां जवान को बूढ़ा बनाने वाले किसी ऐप्प का क्या काम? मैं भी यही सोच रहा था लेकिन पता चला कि लांच होने के कुछ ही समय के भीतर फेस चेंजर एप्प करोड़ों की तादाद में डाउनलोड हो गया। हर आदमी में यह बताने की होड़ लग गई कि वह बुढ़ापे में कैसा दिखेगा। काल के कपाल पर अपना भविष्य छापने की होड़ साठ साल के नौजवानों में भी दिखी। उन्होने भी ऐप्प का इस्तेमाल करके बताया कि वे बुढ़ापे में कैसे दिखेंगे। सचमुच ऐप्प की दुनिया बड़ी मायावी है। ऐप्प सब कुछ कर सकते हैं। आपको भूत और भविष्य दिखा सकते हैं। आपकी बड़ी से बड़ी फैंटेसी पूरी कर सकते हैं।

सोचता हूं कि जंगल में मौजूद हमारे ‘पूर्वजों’ तक यह ऐप्प गाथा पहुंची होगी या नहीं। अगर पहुंची होगी तो उन्होने किस तरह रियेक्ट किया होगा। सिर खुजाते हुए किसी सबसे बुजुर्ग चिंपैजी ने पूछा होगा- क्या फेस चेेंजर एप दुनिया का फेस भी बदल सकता है? क्या वह जंगलों की पहले की तरह हरा-भरा कर सकता है? जहां बड़ी तादाद में फलदार पेड़ हुआ करते थे। क्या कोई ऐप्प सूखती हुई असंख्य नदियों को कलकल धाराओं में बदल सकता है? या फिर हवा को सांस लेने लायक बना सकता है? अगर नहीं तो फिर हे ‘एप पुत्रों!’ तुमने क्या किया? विकसित होकर कौन सा तीर मार लिया? मुमकिन है मंकी किंगडम में ‘एप पुत्र के हाथ में ऐप्प’ मुहावरा चल पड़ा हो, जिस तरह हमारे समाज में ‘बंदर के हाथ में नारियल’ चलता है। ‘एप’ और ‘ऐप्प’ दोनों शब्द सुनने में एक जैसे लगते हैं लेकिन दोनों में अंतर है। ऐप्प दरअसल ‘एप पुत्रों’ का वह आविष्कार है, जिसके बिना उनका जीवन चल नहीं सकता।


 
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