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जल संरक्षण में महिलाओं की भूमिका

22/03/2020

विश्व जल दिवस 22 मार्च पर विशेष
डाॅ. नाज परवीन
जल संरक्षण एवं प्रबंधन में महिलाओं की सक्रिय सहभागिता से जल संरक्षण की समस्या काफी हद तक दूर की जा सकती है। इतिहास की ज्यादातर सभ्यताओं ने जल तथा महिलाओं को जीवन का स्रोत माना है। 14 मार्च को नदियों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस के रूप में मनाया गया, जिसकी थीम भी महिला, जल और जलवायु परिवर्तन पर केन्द्रित है। समय आ गया है कि एक बूंद जल की कीमत सोने से भी ज्यादा है, इसे गहराई से समझा जा सके और इसके लिए समाज व सरकार को युद्धस्तर पर काम करने की आवश्यकता है, जिसमें महिलाओं की भूमिका अहम् होगी।
2011 की जनगणना हमें बतलाती है कि देश की आबादी 121.019 करोड़ है, जिसमें महिलाओं की संख्या 58.647 करोड़ यानि लगभग आधी है। महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा खेती की जमीन तैयार करने, बीज छांटने, पौधे रोपने, खाद तैयार करने से लेकर कीटनाशक छिड़काव, कटाई, ओसाई, थ्रेसिंग में पुरुषों से भी अधिक समय देता है। जल, जमीन और जंगल से जुड़ी बुनियादी व्यवस्थाओं के संरक्षण में महिलाओं का अहम रोल है। महिलाओं की जल संरक्षण विधि तकनीकी ज्ञान पर नहीं अपितु सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित है। रियो में 1992 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन में माना गया कि महिलाओं का पर्यावरण क्षरण के साथ गहरा सम्बन्ध है। इस सम्मेलन में कहा गया कि ’पर्यावरण के रखरखाव एवं सतत् विकास में महिलाओं को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। सतत् विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये उनकी सर्वांगीण प्रतिभागिता आवश्यक है।’ संयुक्त राष्ट्र एजेण्डा 2030 के 17 सतत विकास लक्ष्यों में 6वां लक्ष्य ’सभी के लिए स्वच्छता और जल के सतत प्रबन्धन सुनिश्चित करने की बात करता है। 28 जुलाई 2010 को संयुक्त राष्ट्र ने जल को मानवाधिकार घोषित कर दिया था,
परन्तु आंकड़े बतलाते हैं कि स्वच्छ जल की अनुपलब्धता और दूषित जल को पीने से दुनिया भर में प्रतिदिन लगभग 2300 लोगों की मृत्यु हो जाती है। इसके अलावा दुनिया में 86 प्रतिशत से अधिक बीमारियां दूषित और असुरक्षित पानी पीने से ही होती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि 2025 तक दुनिया भर में 5.5 अरब लोग जो दुनिया की एक तिहाई जनसंख्या होगी, पानी की समस्या से जूझेगी। आज भी जल की गुणवत्ता में कमी और आपूर्ति की मांग के बीच खासा असंतुलन देखा जा सकता है। जिसका सीधा सम्बन्ध मानव के साथ-साथ जानवरों के अस्तित्व पर भी मंडराता संकट है।
महिलाएं रोजमर्रा की जिन्दगी में जल की प्रमुख उपयोग कर्ता हैं। उनके द्वारा खाना पकाने, कपड़े धोने, परिवार की साफ-सफाई एवं स्वच्छता का प्रबन्धन किया जाता है। जिसमें प्रतिदिन पानी का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है, इसलिए महिलाओं को जल-प्रबन्धन एवं स्वच्छता सम्बन्धी परियोजनाओं में शामिल किया जाना आवश्यक है। हालांकि भारत सरकार द्वारा इसकी पहल 2 अक्टूबर 2014 को प्रारम्भ किये गये ’स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत लक्ष्मी नायर नामक छात्रा को स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय अभियान का पहला अंबेसडर बनाकर की गयी है परन्तु अभी भी चुनौतियां कम नहीं हैं जिनका हल महिला सहभागिता से ही निकाला जा सकता है। जल प्रबन्धन, सिंचाई, कृषि, अर्थव्यवस्था और समाज
से जुड़े मुद्दे महिला और पुरुष के परस्पर सहयोग से योजनाओं का क्रियान्वयन करना एवं कानूनी तथा संस्थागत व्यवस्थाओं में नीतिगत बदलाव करना आवश्यक है।
इतिहास इस बात की तस्दीक करता है कि दुनिया की कई सभ्यताओं ने जल और महिला को जीवन का स्रोत माना है। जल ही जीवन है अर्थात जल जीवन की मूलभूत आवश्यकता है, इस विषय पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक जल रिपोर्ट 2006 में कहा था कि ’हमारी धरती पर हर किसी के लिये पर्याप्त पानी है लेकिन फिर भी जलसंकट बरकरार है। इसका मुख्य कारण कुप्रबन्धन, भ्रष्टाचार, उचित संस्थानों की कमी, नौकरशाही की जड़ता और मानव क्षमता एवं भौतिक बुनियादी ढांचे में निवेश की कमी है।’ जल संसाधनों के बेहतर प्रबन्धन और आवंटन से जल संकट से बचा जा सकता है। हाल ही में ’द जर्नल अर्थ फ्यूचर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार यदि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी लगातार जारी रहती है तो 2100 तक विश्व के लगभग आधे प्राकृतिक ग्लेशियर पिघल जाएंगे। जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिये पेयजल, कृषि आदि क्षेत्रों में भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। मानव जीवन के अस्तित्व के लिए इन ग्लेशियरों का बहुत महत्व है अतः इनको बचाना आज की पीढ़ी की बड़ी जिम्मेदारी है। तभी जल और जीवन को बचाना संभव हो पाएगा। मौजूदा सरकार द्वारा जल से जुडे़ सभी मुद्दों को हल करने के लिए ’जल शक्ति मंत्रालय’
का गठन एक भविष्यदर्शी कदम है।
कहने को तो पृथ्वी चारों ओर से पानी से घिरी हुई है लेकिन केवल 2.5 प्रतिशत पानी ही प्राकृतिक स्रोतों, नदियों, तालाबों, कुओं और बावड़ियों से प्राप्त होता है जबकि आधा प्रतिशत भूजल भण्डारण है। सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय यह है कि भारत जल संकट वाले देशों की कतार में आगे खड़ा है। हालांकि अभी भी बहुत देर नहीं हुई है, यदि हमारी प्राथमिकता युद्धस्तर पर जल प्रबन्धन और संरक्षण की है जिसमें महिलाओं और पुरुषों का समान प्रतिनिधित्व हो, जल संकट से बचाव संभव है। जल है तो जीवन है। महिलाएं न केवल परिवार, समाज अपितु दैनिक जीवन में भी गंगा पूजन, कुआं, तालाब, नल आदि की पूजा-अर्चना एवं साफ-सफाई के कामों को उत्सव के रूप में मनाती आयी हैं। वे राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जल संरक्षण में महती भूमिका का निर्वाह कर सकती हैं, इसीलिए जल, जमीन और जंगल से जुड़ी बुनियादी व्यवस्थाओं के संरक्षण में महिलाओं की भागीदारी अत्यन्त ही आवश्यक है।
(लेखिका एडवोकेट हैं।)


 
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