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निर्भया के गुनाहगारों को फांसी तो हुई पर फंसे हुए कई पेंच

21/03/2020

आर.के. सिन्हा

निर्भया गैंगरेप केस में दोषियों को आख़िरकार फांसी तो हो ही गई। निर्भया के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या करने वाले मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय ठाकुर को पहली बार इस केस में साल 2013 में ही मौत की सजा सुनाई गई थी। उसके बाद यह केस विभिन्न अदालतों में अनावश्यक रूप से घूमता रहा। पर इतने बड़े और अहम केस में दोषियों को सजा मिलने में हुई देरी बहुत सारे सवाल न्यायपालिका और वकालती दाव-पेंच पर भी खड़े करती है। कोर्ट से इंसाफ मिलने में होने वाली देरी के चलते फांसी की सजा का इंतजार कर रहे मुजरिमों की दया याचिकाओं पर भी फैसले वक्त रहते नहीं हो पाये। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में फांसी की सजा का इंतजार कर रहे 15 दोषियों की फांसी की सजा उम्रकैद में भी बदली थी। उसने फांसी की सजा का इंतजार करने वाले कैदियों को लेकर अपने एक अहम फैसले में कहा था कि मृत्युदंड पाए अपराधियों की दया याचिका पर अनिश्चितकाल की देरी नहीं की जा सकती। देरी किए जाने की स्थिति में उनकी सजा को कम किया जा सकता है।

मौत से बुरा क्या हो सकता है? शायद मौत का इंतजार। खासतौर पर तब, जब इंतजार कुछ घंटों का नहीं, चंद दिनों या महीनों का नहीं, बल्कि वर्षों का हो। कुछ मामलों में तो इंतजार दशकों तक का भी हो जाता है। भारतीय जेलों में सड़ रहे कैदियों की बड़ी तादाद इसी इंतजार की घड़ी को गुजार रही है, क्योंकि यह तय नहीं हो पाता है कि ऐसे खूंखार गुनहगारों के साथ आखिर करना क्या है? उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए, जैसा कि देश की अदालतें कई-कई बार फैसला कर चुकी हैं या फिर संविधान में दिए गए माफी के प्रावधान के तहत जीवनदान दे दिया जाए। एक बात यह समझ ली जाए कि असली दिक्कत उन्हें फांसी देने या माफी देने से नहीं जुड़ी। दिक्कत है इन दोनों में से कुछ न करने की, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने की। इसके चलते ही विलंब होता रहता है।

बहरहाल, निर्भया कांड इतना दिल दहला देने वाला था कि तब सारा देश आंदोलित हो उठा था। उसकी दशा देख कर उसका इलाज करने वाले डॉक्टर और चिकित्सा दल के हाथ भी कांप गए थे। निर्भया के साथ दक्षिण दिल्ली के मुनिरका स्थित एक बस स्टॉप के पास क्रूर हादसा 16 दिसम्बर की सर्द भरी काली रात में साल 2012 में हुआ था। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने बस चालक सहित छह को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक नाबालिग भी था, उसे तीन साल तक सुधार गृह में रखने के बाद रिहा कर दिया गया था। एक आरोपी राम सिंह ने जेल में खुदकुशी भी कर ली थी।

निर्भया रेप केस के दोषियों को फांसी दिए जाने के साथ ही कुछ हलकों में यह भी सवाल उठ रहे है कि क्या भारत में फांसी की सजा पर रोक लगा देनी चाहिए? कुछ समय पहले मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन देशों की सूची जारी की थी, जहां फांसी की सजा दी जाती है। ऐसा करने वाले देशों में भारत भी शामिल है। दुनिया भर के देशों में कुल मिलाकर जितने लोगों को मौत की सजा दी गई, अकेले चीन में ही उससे ज्यादा को मौत की सजा दी जाती है। एमनेस्टी की रिपोर्ट के मुताबिक वहां हर साल हजारों लोगों को मौत की सजा सुनाई और दी जाती है। फांसी की सजा देने वाले अन्य प्रमुख देशों में ईरान, सऊदी अरब, अमेरिका, पाकिस्तान और बांग्लादेश भी है। कहने वाले कहते हैं कि जो देश अपराध से लड़ने के लिए मौत की सजा का रास्ता अपनाते हैं वे गलत सोचते हैं। इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिलते कि मौत की सजा के डर से अपराधी अपराध नहीं करता। यह बात निर्भया कांड से कुछ हद तक साबित होती है। उस जघन्य कांड के बाद भी देश में बलात्कार के मामले घट तो नहीं रहे। शायद ऐसा फांसी के फंदे को वर्षों तक अनिश्चितता की अवस्था में लटका कर रखने की वजह से ही है। 

इस बीच, आजाद भारत में सबसे अधिक फांसी की सजा उत्तर प्रदेश में दी गई है। इसके बाद हरियाणा और मध्य प्रदेश का स्थान आता है। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे स्वतंत्र भारत के पहले अपराधी थे, जिन्हें फांसी हुई थी। दोनों को 15 नवंबर, 1949 को अंबाला की सेंट्रल जेल में फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया। इन पर महात्मा गांधी की हत्या और हत्या के षड्यंत्र में लिप्त होने का आरोप था। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में हुई थी पर गोडसे और आप्टे को अंबाला में फांसी के लिए ले जाया गया था। इस बाबत फैसला शिखर स्तर पर हुआ था।

हम फिर से बात करेंगे कि किस तरह कई बार कोर्ट के फैसलों पर अमल नहीं हो पाता है। देवेंद्र सिंह भुल्लर का मामला ले लीजिए, दिल्ली में 1993 में हुए बम विस्फोट में 13 लोग मारे गए थे। इस मामले में भुल्लर को दोषी ठहराया गया था। फिर सालों तक सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, सभी ने उसे सजा-ए-मौत दी। उसने दया याचिका दाखिल की और मई, 2011 में जाकर राष्ट्रपति ने उसकी याचिका खारिज कर दी। लेकिन, इतने लंबे वक्त बाद भी मामले का अंत नहीं हुआ। सितंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भुल्लर की सजा घटाने पर विचार करने संबंधी वह याचिका स्वीकार कर ली, जिसमें उसने अपने जीने के अधिकार का हवाला दिया था। फिलहाल, यह किसी को नहीं पता कि भुल्लर का भविष्य क्या होगा? अगर फांसी का इंतजार कर रहे दोषी को लंबे समय तक जेल में रखा जाता है, तो इसका मतलब है दोहरी सजा। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो सभी नागरिकों को सुरक्षा का अधिकार देता है।

फांसी देने या न देने के संबंध में राष्ट्रपति का फैसला भी अंतिम नहीं माना जा सकता। जाने-माने वकील माजिद मेनन ने एकबार कहा था कि दया याचिकाओं के मामले में देरी कैबिनेट के लेटलतीफ रवैये की वजह से होती है। अगर वहां से राष्ट्रपति को सिफारिश जल्दी भेजी जाने लगे, तो इस स्तर पर होने वाली देरी दूर की जा सकती है। पर राष्ट्रपति दया यचिकाओं के मामले में अकेले फैसला नहीं कर सकते। संविधान के अनुच्छेद 74 के मुताबिक राष्ट्रपति को केंद्रीय मंत्रिमंडल दया याचिकाओं पर मशविरा देता है और महामहिम उसके हिसाब से फैसला करने के लिए बाध्य हैं।

हालांकि, अतीत खंगालने पर ऐसे भी कई मामले मिले, जिनमें सरकार की ओर से सलाह मिलने के बावजूद राष्ट्रपतियों ने कई साल तक अंतिम फैसले का एलान नहीं किया। निर्णय में देरी और बैकलॉग के मामले 1990 के दशक की शुरुआत से ज्यादा बढ़े। राष्ट्रपति या सरकार की ओर से दया याचिकाओं पर फैसला करने के लिए कोई समयसीमा तय नहीं है लेकिन 1980 के दशक के अंतिम वर्षों तक इस तरह के फैसलों में दो-तीन साल से ज्यादा वक्त नहीं लगता था। 1990 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया कि लंबित दया याचिकाओं पर दो साल के भीतर फैसला करने को लेकर राष्ट्रपति को बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि हर मामले में सबूत अलग-अलग होते हैं। तब से अबतक मौत या माफी के फैसले लगातार अटकते और लटकते रहे हैं। हालांकि निर्भया अब स्वर्ग में शांति से सो सकेगी पर अभी पृथ्वीलोक में फांसी से जुड़े मसलों पर कई पेंच फंसे ही हुए हैं।


 
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