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वैचारिक त्रिशंकु बनी कांग्रेस

24/05/2020

वैचारिक त्रिशंकु बनी कांग्रेस

र्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जरूरी है कि सरकार आर्थिक पैकेज दे। दुनिया के तमाम देश अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाने और नागरिकों की समस्या को दूर करने के लिए आर्थिक पैकेज दे चुके हैं। लेकिन भारत सरकार ऐसा करने में टाल मटोल कर रही है। ऐसा राहुल गांधी कह रहे हैं। वे यही नहीं रुके। उन्होंने रघुराम राजन और अभिजीत बनर्जी से जो ज्ञान हासिल किया था, उसके आधार पर सरकार को सलाह भी दे डाली। हालांकि जब यह सलाह दे रहे थे तब उन्होंने सरकार की पहल या फिर यूं कहूं, आर्थिक पैकेज के बारे में जानकारी हासिल नहीं की। अगर की होती तो इस तरह का बयान नहीं देते। पर राहुल गांधी के साथ यही समस्या है। वे बिना देखे और समझे बोल जाते हैं।

राहुल गांधी, पंडित नेहरू के फिसड्डी वारिस साबित हुए हैं। पंडित नेहरू का हर विषय पर अपना एक नजरिया था। आप उससे असहमत हो सकते हैं। मगर इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि उन्हें देश-दुनिया की समझ थी। उन्होंने अपने अनुभव से बहुत कुछ सीखा था। उसी के आधार पर पंडित नेहरू ने अर्थव्यवस्था और राजव्यवस्था को एक आकार देने की पहल की थी। उसे लेकर बहस तब से चल रही है। जानकार उनके विचार को नेहरू की विरासत कहते हैं। कांग्रेस खुद को उसका वाहक मानती है। हालांकि यह कितना सही है, उसका अंदाजा राहुल गांधी को देखकर लगाया जा सकता है।

इसी वजह से उनको लेकर जनमानस में एक धारणा बन गई हैं। यह उनकी ही पार्टी के लोग कह रहे हैं। इसे उन लोगों ने जाहिर भी किया है। कांग्रेस के पूर्व सांसद गुफरान आजम ने तो बाकायदा सोनिया गांधी को इस पर पत्र लिखा था। वे लिखते हैं… हर मां-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने। लेकिन सबकी इच्छा पूरी नहीं होती क्योंकि सब में एक ही तरह की प्रतिभा नहीं होती। इसलिए माँ-बाप उन्हें मजबूर नहीं कर सकते। आपकी (सोनिया गांधी) इच्छा थी कि आप का बच्चा (राहुल गांधी) नेता बने और आप ने उसे दस साल का समय दिया। लेकिन आप उन्हें नेता बनाने में विफल रहीं। आप उन्हें अच्छा वक्ता बनाने में विफल रहीं। वे राजनीतिक शून्य को भरने में विफल रहे। इसलिए लोग उन्हें पप्पू और मुन्ना पुकारते हैं और हमें सुनना पड़ा। हम इससे शर्मिंदा हैं… जाहिर है वे राहुल गांधी की कार्यशैली से आहत थे। उनकी जो छवि बनी थी, उससे गुफरान शर्मिंदा थे।

हालांकि अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन जो कुछ उन्होंने लिखा था, उसमें ज्यादा फेरबदल हुआ नहीं है। लोगों का नजरिया बदला नहीं है। राहुल ने उसके लिए कोई कोशिश भी नहीं की है। वे खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मानते हैं, लेकिन देश और समाज की रत्ती भर समझ नहीं रखते। अगर रखते तो दूसरों पर निर्भर न रहते। उनका अपना कोई दृष्टिकोण नहीं है। इस लिहाज से देखा जाए तो राहुल गांधी, पंडित नेहरू के फिसड्डी वारिस साबित हुए हैं। पंडित नेहरू का हर विषय पर अपना एक नजरिया था। आप उससे असहमत हो सकते हैं। मगर इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि उन्हें देश-दुनिया की समझ थी। उन्होंने अपने अनुभव से बहुत कुछ सीखा था। उसी के आधार पर पंडित नेहरू ने अर्थव्यवस्था और राजव्यवस्था को एक आकार देने की पहल की थी। उसे लेकर बहस तब से चल रही है। जानकार उनके विचार को नेहरू की विरासत कहते हैं। कांग्रेस खुद को उसका वाहक मानती है। हालांकि यह कितना सही है, उसका अंदाजा राहुल गांधी को देखकर लगाया जा सकता है।

हर मां-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने। लेकिन सबकी इच्छा पूरी नहीं होती क्योंकि सब में एक ही तरह की प्रतिभा नहीं होती। इसलिए माँ-बाप उन्हें मजबूर नहीं कर सकते। आपकी (सोनिया गांधी) इच्छा थी कि आप का बच्चा (राहुल गांधी) नेता बने और आप ने उसे दस साल का समय दिया।

राहुल 50 पार कर चुके हैं। इस उम्र में पंडित नेहरू ने अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि गढ़ी थी। उनके पास देश के भविष्य की रूपरेखा थी। मगर राहुल गांधी के पास कुछ नहीं है। ऐसा तब है, जबकि वे तकरीबन डेढ़ दशक से सक्रिय राजनीति में हैं। वे 2004 में अमेठी से पहली बार सांसद चुने गए। पर उनकी काबिलियत देखिए, वह सीट भी नहीं बचा पाए। यह सीट, उनकी पार्टी की ही तरह थी। जैसे पार्टी परिवार की जागीर है, वैसे ही सीट भी हुआ करती थी। लेकिन उस विरासत को भी वे संभाल नहीं सके। जाहिर है, जो राजनीतिक सूझबूझ उनमें होनी चाहिए, वह नहीं है। अगर होती तो परिपक्व राजनेता की तरह व्यवहार करते। मगर डेढ़ दशक तक राजनीतिक जीवन में रहने के बाद भी, अपरिपक्व ही रहे। उनके सामने सबसे बड़ा संकट खुद को साबित करने का है।

वे इसकी कोशिश 2004 से कर रहे हैं। सोनिया गांधी, उनकी सहयोगी बनी हैं। मां भी हैं, इसलिए चाहती हैं कि विरासत राहुल को ही मिले। इसी वजह से उन्हें 2013 में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया। वह जयपुर का अधिवेशन था, जहाँ यह निर्णय हुआ था। लोगों में बड़ा कौतूहल था। राहुल गांधी से आशा जो थी। मगर, जब उन्होंने अधिवेशन में बोला तो वह एक राजनेता का भाषण नहीं, बल्कि उस बच्चे का था, जिसके परिवार ने एक त्रासदी देखी थी। वे अधिवेशन में बोले… कल रात मां मेरे कमरे में आई। मेरे पास बैठी और रोने लगी। वो इसलिए रोई क्योंकि जो ताकत बहुत लोग पाना चाहते हैं, वो जहर हैं… वे इतना ही कह कर नहीं रुके।

उन्होंने दादी की हत्या से लेकर पिता तक का किस्सा सुना डाला। कायदे से उन्हें यह सब बताने के बजाए, आगामी आम चुनाव पर बात करनी थी। लड़ने की रणनीति बनानी थी। वजह साफ थी। सोनिया गांधी उन्हें पार्टी की कमान देने की तरफ कदम बढ़ा रही थीं। उपाध्यक्ष उसकी पहली सीढ़ी थी। वे उस पर चढ़े जरूर थे, पर कुछ कर पाने की क्षमता से कोसों दूर थे। अधिवेशन के भाषण से साफ हो गया था। जो कसर थी वह 2014 के चुनाव परिणाम से स्पष्ट हो गई थी। कांग्रेस अपने सबसे निचले पायदान पर खड़ी थी। जनता ने राहुल गांधी वाली कांग्रेस को नकार दिया था। 2004-2014 तक उनके राजनीतिक जीवन का एक दशक बीत चुका था।

वे 2004 में अमेठी से पहली बार सांसद चुने गए। पर उनकी काबिलियत देखिए, वह सीट भी नहीं बचा पाए। यह सीट, उनकी पार्टी की ही तरह थी। जैसे पार्टी परिवार की जागीर है, वैसे ही सीट भी हुआ करती थी। लेकिन उस विरासत को भी वे संभाल नहीं सके। जाहिर है, जो राजनीतिक सूझबूझ उनमें होनी चाहिए, वह नहीं है।

मगर इस एक दशक में वे राजनीति का ककहरा तक नहीं सीख पाए थे। उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता कांग्रेस के कई नेताओं को खटकने लगी। लेकिन उसका कोई असर नहीं पड़ा। सोनिया गांधी जो दीवार की तरह खड़ी हैं, वे हर हाल में राहुल गांधी को बतौर राजनेता स्थापित करने में लगी हैं। उसी के तहत उन्हें पार्टी की कमान भी सौंपी गई। पर बतौर अध्यक्ष भी वे कुछ खास नहीं कर पाए। उनकी राजनीतिक सूझबूझ का अंदाजा चुनावी मुद्दों से सहज ही लगाया जा सकता है। 2019 के आम चुनाव में वे राफेल पर उड़ रहे थे। उनकी कोशिश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भ्रष्ट साबित करने की थी। लेकिन इसके पक्ष में कोई सबूत पेश नहीं कर पाए। हद तब हो गई, जब सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आया। उसने सरकार को राफेल मामले में क्लीन चिट दे दी।

मगर राहुल गांधी उसे भी मानने को तैयार नहीं थे। इसे उनकी राजनीतिक नासमझी ही कहा जाएगा। वह इसलिए क्योंकि न्यायालय पर ही आवाम का भरोसा है। उसने अगर किसी को निर्दोष मान लिया तो जनता उस पर अपनी मुहर लगा देती है। यह राहुल गांधी नहीं समझ पाए और राफेल पर सरकार को घेरते रहे। इससे उनकी छवि को गहरा नुकसान पहुंचा। हुआ यह कि वे ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देने लगे। यह प्रधानमंत्री पर सीधा हमला था। कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बाद भी वे नहीं माने। लिहाजा उन्हें कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी और कहना पड़ा ‘चौकीदार चोर है’, गलती से बोल दिया था। मगर फिर भी राहुल गांधी नहीं सुधरे और राजनीतिक नादानी करते रहे। मसलन 2019 में हुई हार की जिम्मेदारी उन्होंने ली और इस्तीफे भी दिया। यह बतौर राजनेता बड़ा कदम था। मगर जब कोई उनका इस्तीफा नहीं स्वीकार कर रहा था तो उन्हें वापस लेना चाहिए और नए जोश से पार्टी को खड़ा करना चाहिए था। पर वे तो मैदान छोड़कर भागने पर उतारू थे। एक राजनेता की तरह डटकर लड़ने को राजी नहीं थे।

इसलिए वे एक कुशल नेता की छवि नहीं बना पाए। इसके लिए जिम्मेदार वे खुद है। पर समझने को राजी नहीं। सलाहकारों की भी भूमिका इसमें कम नहीं है। सैम पित्रोदा जैसे राहुल के सलाहकार हैं, जिन्हें राजनीति की समझ है नहीं। ऐसे लोग राहुल को सलाह दे रहे हैं। जो राजनीति को समझते हैं, राहुल ने उनसे दूरी बना रखी है। शायद इसलिए कहा जाता है कि जब तक कांग्रेस में राहुल गांधी है, तब तक भाजपा को ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। क्या है कांग्रेस की विचारधारा कांग्रेस की कमी की वजह नेतृत्व क्षमता तो है ही, लेकिन सिर्फ यही है ऐसा नहीं है। विचारधारा भी बड़ा मसला है। कांग्रेस यह तय नहीं कर पा रही है कि उसे किस धारा में चलना है।

पंडित नेहरू के समय में कांग्रेस समाजवादी धारा में बह रही थी। लेकिन सोनिया गांधी के काल तक वैचारिक घालमेल हो गया। यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी का वाम रुझान रहा। लेकिन जिस के हाथ में सरकार की कमान थी, वे पूंजीवाद के सिरमौर थे। उन्हें भारत में बाजारवाद का वाहक माना जाता है। वहीं कांग्रेस का एक धड़ा है, जो समाजवादी धारा का है। लंबे समय तक कांग्रेस के संगठन महासचिव रहे जनार्दन द्विवेदी उसी धारा के हैं। हां, पी चिदंबरम समाजवादी से पूंजीवादी बन गए हैं। कांग्रेस की यही हालात है। उसकी अपनी कोई विचारधारा नहीं है। लेकिन एक राग है जो कांग्रेसी अलापते हैं, वह सेकुलरवाद है। हालांकि यह संविधान का हिस्सा कभी रहा ही नहीं। इसे इंदिरा गांधी लेकर आईं। इसी दरमियान कांग्रेस में एक और बदलाव आया। वह पार्टी से ‘फैमेली इंटरप्राइज’ बन गई।

सारे निर्णय घर में होने लगे। तो विचारधारा भी घर में ही तय होने लगी। नेहरू के समाजवाद पर चलने वाली कांग्रेस सेकुलरवादी हो गई। उस वाद में सोनिया गांधी का वाम भी चला और डॉ. मनमोहन सिंह का पूंजीवाद भी। लेकिन 2014 की हार के बाद पार्टी में मंथन शुरू हुआ। हार के कारणों का पता लगाने के लिए एके. एंटोनी समिति बनी। उसने रिपोर्ट दी कि तथाकथित सेकुलरवाद कांग्रेस को भारी पड़ गया। इसी के चक्कर में राजीव गांधी भी फंस गए थे और शाहबानो केस के फैसले को उलट दिया था। उसी दौर से सलाहकारों ने परिवार को तथाकथित सेकुलरवाद की सलाह दी। कांग्रेस उसमें आकंठ डूब गई। तुष्टिकरण की नीति उसे ले डूबी।

एंटनी समिति ने हार का यही कारण बताया। फिर परिवार ने तय किया कि अब मंदिर जाया जाए। सोनिया गांधी और राहुल गांधी मंदिर-मंदिर जाने लगे। जनेऊ पहनने लगे। अचानक वे धोती में नजर आने लगे। जाहिर तौर पर यह सब कवायद कांग्रेस को हिन्दुत्ववादी पार्टी के रूप स्थापित करने के लिए की जा रही है। पर समस्या यह है कि जो खुद को सेकुलरवादी मानता है, वे हिन्दुत्व की धारा में कैसे बह सकता है। यह सवाल इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि कांग्रेस तो हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक विचारधारा मानती है। कांग्रेस एक समय में या तो सेकुलर हो सकती है या साम्प्रदायिक। दोनों तो हो नहीं सकती। लेकिन वह कोशिश तो यही कर रही है।

इससे विरोधाभास पैदा हो गया है। न तो जनता समझ पा रही है और न खुद पार्टी के लोग। शशि थरूर ‘मैं हिन्दू क्यों हूं’ किताब लिख डालते हैं और राहुल गांधी हैं कि संयासियों की हत्या पर संवेदना भी नहीं व्यक्त करते। उनको इस तरह के द्वंद्व से निकलना होगा। तभी वे कांग्रेस को पुनर्जीवित कर पाएंगे। नहीं तो बस कहने के लिए बचेगा कि हम नेहरू की विरासत से आते हैं। 


 
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