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नहीं होता आरसेप से लाभ

04/12/2019

नहीं होता आरसेप से लाभ

डॉ. आशीष शुक्ल

भारत और आसियान देशों के संबंध राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं। भारत की विदेश नीति में पड़ोस (नेबरहुड) और विस्तारित पड़ोस (एक्सटेंडेड नेबरहुड) हमेशा से ही एक अलग स्थान और महत्त्व रखता रहा है। समय-समय पर बदलती हुई भू-राजनीतिक और भू-रणनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप होने वाले परिवर्तनों ने भारत-आसियान रिश्तों की डोर को मजबूत ही किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया तीन दिवसीय थाईलैण्ड यात्रा-जिसके दौरान उन्होंने आसियान-भारत सम्मेलन, पूर्वी एशिया सम्मलेन, और आर.सी.ई.पी. सम्मलेन में हिस्सा लिया-को इसी क्रम में देखा जाना चाहिए। 3 नवम्बर को 16वें भारत-आसियान सम्मलेन के उद्घाटन समारोह में दिए गए वक्तव्य में प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी उसके इंडो-पैसिफिक परिकल्पना का एक महत्वपूर्ण भाग है तथा आसियान हमेशा एक्ट ईस्ट पॉलिसी के केंद्र में रहा है और रहेगा। इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में भारत-आसियान संबंधों के विस्तार के लिए एक संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की और साथ ही आसियान-भारत मुक्त व्यापार समझौते के पुनरावलोकन के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह न केवल हमारे आर्थिक रिश्ते को और मजबूत करेगा, बल्कि हमारे व्यापार को भी संतुलित करेगा। जहां तक आसियान के सदस्य देशों का प्रश्न है, वह हमेशा से ही भारत की भागीदारी को बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। ऐसा इसलिए कि चीन के लगातार बढ़ते प्रभाव और दबदबे को कुछ हद तक संतुलित किया जा सके।

भारत की अर्थव्यवस्था कठिन दौर से गुजर रही है तथा इस समझौते में शामिल अन्य 15 देशों में कम से कम 11 देशों के साथ भारत का व्यापारिक घाटा काफी अधिक हैे। ऐसी स्थिति में यदि भारत इस समझौते का हिस्सा बनता तो उसकी आर्थिक चिंताओं में अभिवृद्धि ही होती।

भारत ने भी अपने वृहद् राष्ट्रीय हितों के आलोक में आसियान- भारत संबंधों की गतिशीलता को बनाए रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी और बदलती हुई परस्थितियों के अनुसार अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित कीें। यही वजह है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान भारत की लुक ईस्ट पॉलिसी को प्रधानमंत्री मोदी ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी करने का जरूरी फैसला लिया। इस तीन दिवसीय दौरे के दरम्यान भारत ने कुछ कड़े और महत्वपूर्ण फैसले भी किए। इनमें सर्वाधिक चर्चित उसका आर.सी.ई.पी. से अपने आप को अलग करना रहा। गौरतलब है कि आर.सी.ई.पी. समझौते की प्रक्रिया की शुरुआत 2012 में हुई थी और इस वर्ष इसके फलीभूत होने की प्रबल संभावना थी। आसियान के दस देशों के अतिरिक्त उसके छ: मुक्त व्यापार समझौते के साझीदार-चीन, भारत, दक्षिण कोरिया, जापान, न्यूजीलैंड और आॅस्ट्रेलिया-इस प्रक्रिया में शामिल थे, लेकिन भारत के द्वारा इसे अस्वीकृत किए जाने के कारण केवल 15 देशों ने इस पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया हैे। आर.सी.ई.पी. सम्मेलन में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत शुरू से ही इस प्रक्रिया का हिस्सा रहा है लेकिन वर्तमान समझौता उसकी मूल भावना और निर्देशक सिद्धांतों को न तो पूरी तरह से प्रतिविम्बित करता है और न ही भारत के मुद्दे और चिंताओं का समाधान करता है।

भारत द्वारा लिए गए इस कड़े फैसले के पीछे कई कारण हैें। वर्तमान समय में भारत की अर्थव्यवस्था एक कठिन दौर से गुजर रही है तथा इस समझौते में शामिल अन्य 15 देशों में कम से कम 11 देशों के साथ भारत का व्यापारिक घाटा काफी अधिक है। ऐसी स्थिति में यदि भारत इस समझौते का हिस्सा बनता तो उसकी आर्थिक चिंताओं में अभिवृद्धि ही होती। आंकड़ों के लिहाज से पिछले पांच-छ: सालों में भारत का इन देशों के साथ व्यापारिक घाटा 54 बिलियन डॉलर से बढ़कर 105 बिलियन डॉलर हो चुका है। इस 105 बिलियन डॉलर में अकेले चीन के साथ व्यापारिक घाटा 53 बिलियन डॉलर का है। भारत वर्तमान समय में अपने कुल निर्यात का 20 प्रतिशत इन्हीं देशों को करता है तथा अपने कुल आयात का 35 प्रतिशत इन्हीं देशों से प्राप्त करता है। इस तरह चीन आयात-निर्यात के इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। इस तरह समझौते के वर्तमान प्रारूप का हिस्सा बनने से भारत को लाभ की तुलना में हानि होने की अधिक संभावना थी। इसी वजह से भारत ने इस समझौते से अपने आपको बाहर रखने का फैसला किया है। यहां यह भी स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि भारत जैसे देश के लिए आर्थिक अकेलापन या एकाकीपन कत्तई कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए उसे भविष्य की नीतियों का निर्धारण करते समय सावधानी बरतनी पड़ेगी।


 
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