यथावत

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समस्त सृष्टि है सेवा में कार्यरत

18/09/2019

समस्त सृष्टि है सेवा में कार्यरत

शिवादित्य पुरोहित

नंत काल से सौर मंडल में स्थित हमारा सूर्य पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाए हुए है। उसी की ऊर्जा से जीवन फल-फूल रहा है। इसी कारण बादल बन वर्षा होती है, जो धरा को सींचती है। उससे मनुष्य के लिए अनाज उत्पन्न करना संभव होता है। नदियां पहाड़ों से उतर कर हजारों मील की यात्रा करते हुए सभी जगह जल एवं बिजली उत्पन्न करा रही हैं। मैदानों में सब की प्यास इसी से बुझती है। सिर्फ इतना ही नहीं, वह धरती को उपजाऊ भी बना रही हैं। वृक्ष, पेड़-पौधे धरती की मिट्टी को संजोये हुए हैं और जीवनदायक वायु प्रदान करते हैं। सभी प्राणियों द्वारा छोड़ी गयी स्वास वृक्षों के लिए जीवन दायक है। यही वृक्ष हमारे लिए आॅक्सीजन और छत्र-छाया प्रदान करते हैं। इनसे हो रहे स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के लाभ तो अनगिनत हैं।

कोई भी सेवा निष्काम भाव से होती है और ईश्वर में भक्ति के बिना यह एक तरह से नीरस हो जाएगी। नाम कमाने के उद्देश्य से की हुई सेवा मात्र एक राजसिक कर्म बन कर रह जाती है।

आपके शरीर के अन्दर आपका हृदय चौबीसों घंटे, हर क्षण पूरे जीवन धड़क रहा है। इससे रक्त संचार की प्रणाली बनी रहती है। फेफड़े प्राण वायु को संचालित कर रहे हैं, जिसके बिना हृदय का स्पंदन संभव नहीं है। अगर हृदय न धड़के तो फेफड़ों का कार्य करना संभव नहीं। पाचन तंत्र खाना पचा कर ऊर्जा बना रहा है, तो निष्कासन प्रणाली शरीर को स्वच्छ बनाए हुए है। रक्त शारीर की प्रत्येक कोशिका तक उर्जा पंहुचा रहा है तो वहीं मांसपेशियां और हड्डियां शरीर को एक सुगठित ढांचा दिए हुए हैं। मस्तिष्क इन सभी प्रणालियों को संचालित और व्यवस्थित कर रहा है, पर उन पर निर्भर भी है। अगर आप सूक्ष्मता से गौर करें तो ये समझने में तनिक भी देर न लगेगी कि समस्त सृष्टि की संरचनाएं एक दूसरे की निष्काम सेवा में तल्लीन हैं। इसका प्रमाण आपको अपने ही शरीर के अन्दर प्रत्यक्ष रूप से मिल रहा है।

सेवा भाव से ही यह सारा जीवन संभव हो रहा है। अर्थात आपका स्वरूप निष्काम सेवा भाव की ही एक अभिव्यक्ति है। ये मनुष्य की सब से प्राकृतिक स्थिति भी है। भारतवर्ष की संस्कृति ने पुरातन काल से ही सेवा को प्राथमिकता दी है। यहां प्राणियों की सेवा को ईश्वर- सेवा का दर्जा दिया गया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन, ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है- यह उसका सौभाग्य है जिसे गरीबों एवं पीड़ितों की सेवा करने का सामर्थ्य प्राप्त है। जब आप दान- पुण्य करते हैं तो उस गरीब का नहीं,आपका भला होता है। झुक कर उसे प्रणाम करें कि उस गृहीता ने आपको अपना अन्त:करण शुद्ध करने का अवसर दिया। कोई भी सेवा निष्काम भाव से होती है और ईश्वर में भक्ति के बिना यह एक तरह से नीरस हो जाएगी। नाम कमाने के उद्देश्य से की हुई सेवा मात्र एक राजसिक कर्म बन कर रह जाती है।

हम सेवा तीन प्रकार से कर सकते हैं -तन से,मन से,धन से। तन से सेवा का अर्थ है कि आप अपने शारीरिक श्रम और समय किसी और के उद्धार में लगाते हैं। मन से सेवा आप अपने अच्छे भाव, शुभ कामना तथा सकारात्मक शब्दों द्वारा कर सकते हैं, किसी और को सेवा के लिए प्रेरित कर सकते हैं। तीसरा तरीका है आप अपनी मेहनत से कमाए हुए धन का कुछ हिस्सा किसी के जीवन में सुधार लाने में लगाएं। ध्यान रखें की सेवा करने के पीछे आपकी भावना पूर्णत: शुद्ध होनी चाहिए। फिर भी मन में प्रश्न आ सकता है कि मैं क्यों कोई सेवा करूं, मेरी सेवा तो कोई नहीं कर रहा! तो हमें यह समझना चाहिए कि जब हम निष्काम सेवा द्वारा कोई त्याग करते हैं, तब जीवन में एक नई जगह बनती है, जो आपके आस पास सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण करती है। इससे मन में एक संतुष्टि और विस्तार का भाव पैदा होता है व आत्मिक बल की वृद्धि भी होती है। इसी से आध्यात्मिक एवं भौतिक उन्नति के आयाम खुल जाते हैं।


 
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